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शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

बढती उमर की ग़ज़ल

मेरा प्यार लगता तुझे चोंचला है
मेरी जान तुझको ये क्या हो चला है
किये होंसले पस्त तुने अभी से
बुलंदी पे अब भी मेरा होंसला है
 
बढा प्यार मेरा है संग संग उमर के
उमर ही ढली है न यौवन ढला है
मचलते हैं जोशे जवानी में सब ही
मोहब्बत का असली पता अब चला है
उड़े सब परिंदे बसा अपनी दुनिया
अब हम दो बचे हैं और ये घोंसला है
मोहब्बत भरी ये मेरी धुंधली आँखें
तेरी झुर्रियों का पता कब चला है
चलो फिर से जी ले जवानी के वो दिन
यही सोच कर के नया सिलसिला है

अग़ज़ल-- दिलबाग विर्क


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तेरे लाज के घूँघट से


                                            

उमड़ आयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
द्वार पर  खड़ी तू 
बेतस बाट जोहती 
झलक गये तेरे केशू
तेरे आँखों के अर्पण से |

पनघट पे तेरा आना 
भेष बदल गगरी छलकाना 
छलक गयी गगरी तेरी 
तेरे लाज के घूँघट से |

सजीले पंख सजाना 
प्रतिध्वनित  वेग से 
झरकर गिर आयी 
तेरे पाजेब की रुनझुन से |

रागों को त्याग 
निष्प्राण तन में उज्जवल 
उस अनछुई छुअन में 
बरस गयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
उमड़ आयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
- दीप्ति शर्मा 


www.deepti09sharma.blogspot.com

                                                   

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

महाभारत-आठ दोहे

महाभारत-आठ दोहे
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मै हूँ प्यासा युधिष्ठिर,तुम जल भरा तलाब
यक्ष प्रश्न का तुम्हारे,दूंगा सभी जबाब

तुम हो मछली घूमती,रहा तुम्हे मै ताक
प्रेम तीर एसा चले,कि बिंध जाए  आँख

मुझ पर रीझी उर्वशी,मांगे प्रेम प्रसाद
श्राप मिले ,पर ना रमण,करूं और के साथ

कुरुक्षेत्र कि तरह है,घर,गृहस्थ,मैदान
तुम कहती सब से लड़ो,ये गीता का ज्ञान

इस विराट के महल में,सबके अपने कृत्य
अर्जुन जैसे योद्धा,सिखलाते हैं नृत्य

चक्रव्यूह तुमने रचा,पहन आवरण  सात
सातों वाधाएं हटे, अभिमन्यु के हाथ

राह दिखाओ पति को,यदि पति है जन्मांध
गांधारी सी मत रहो,आँख पट्टियां  बाँध

प्रेम गली सकड़ी नहीं,कृष्ण कहे मुसकाय
आठ
लेन की सड़क है,आठ रानियाँ आय

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

हारहूर से तेज है, हार हूर अभिसार

पति  की  अनुनय  को  धता, कुपित होय तत्काल |
बरछी - बोल  कटार - गम,  सहे  चोट  मन - ढाल ||

पत्नी  पग-पग  पर  परे, पल-पल  पति  पतियाय |
श्रीमन का मन मन्मथा, श्रीमति मति मटियाय ||


हार गले की फांस है, किया विरह-आहार |
हारहूर  से  तेज  है,  हार   हूर  अभिसार ||
हारहूर=मद्य
आहार-विरह=रोटी के लाले

 चमकी चपला-चंचला , छींटा छेड़ छपाक |
 तेज तड़ित तन तोड़ती,  तददिन तमक तड़ाक |

मुमुक्षता मुँहबाय के, माया मोह मिटाय |
मृत्यु-लोक से जाय के, महबूबा चिल्लाय ||

 मुमुक्षता=मुक्ति की अभिलाषा का भाव 

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