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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

ऊंचाई का दर्द

            ऊंचाई का दर्द

मेरे मस्तक के हिम किरीट पर ,जब पड़ती है सूर्य किरण
पहले स्वर्णिम आभा देता ,फिर चांदी सा चमके चम चम
फिर ढक लेते मुझको बादल ,मै लुप्त प्राय सा हो जाता
खो जाता है व्यक्तित्व मेरा ,आँखों से ओझल  हो जाता
फिर ग्रीष्म ऋतू का तीक्ष्ण ताप,पिघलाता  मेरा तन पल पल
मै फिर हिम आच्छादित हो जाता ,जब फिर से आती शीत लहर
यह  ऊंचाई , यह  कद मेरा  ,सब करते है  मुझको  आभूषित
वह स्वर्ण मुकुट ,वह रजत मुकुट ,होते मस्तक पर आलोकित 
पर  सर पर हिम की शीतलता ,देती मुझको कितनी सिहरन
मेरा व्यक्तित्व लुप्त करते ,जब मुझे घेरते  मेघ सघन
यह ऊंचाई की पीड़ा है ,यह है ऊंचे कद का प्रसाद
ऊंचे हो,देखो, जानोगे ,तुम ऊंचाई से जनित त्रास
मै दिखता बहुत भव्य तुमको ,पर जाने मेरा अंतरमन
कितनी पीड़ा दायक होती ,है ऊंचाई की वो ठिठुरन 
मेरे मस्तक का हिम किरीट ,दिखता तो बड़ा सुहाना है
पर मुझ पर क्या गुजरा करती ,क्या कभी किसी ने जाना है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सखी री ,सुन साजन बुढियाये

  घोटू के पद

सखी री ,सुन साजन बुढियाये
सर पर चाँद आन बैठा है ,और गाल पिचकाये
गयी लुनाई सब चेहरे की ,हाथ पाँव झुर्राये
ना तो मीठी बात करत है , और ना मीठा खाये
घुटन और घुटने की पीड़ा ,अब उनको तडफाये
रात न सोये,करवट बदले ,तकिया बांह दबाये
कितने ही दिन बीत गए है ,दाड़ी मुझे गड़ाये
घोटू याद आत है वो दिन,जब हम मौज उडाये

घोटू

सोमवार, 16 सितंबर 2013

दर्द और दवा

         दर्द और दवा

कभी तुम नाराज़ होते ,कभी हो उल्फत दिखाते
दर्द भी देते तुम्ही हो,और तुम्ही मलहम लगाते
कभी खुशियों में डुबोते ,कभी करते गमजदा हो
कभी दिखती बेरुखी है ,कभी हो जाते फ़िदा हो
बताओ ना ,इस तरह तुम,क्यों भला हमको सताते
दर्द भी देते तुम्ही हो ,और तुम्ही मलहम लगाते
कभी तुम नज़रें चुराते ,कभी लेते हो चुरा दिल
और कभी तुम सज संवर के ,दिखाते हो अदा कातिल
कभी तो हो तुम लजाते,और कभी आँचल गिराते
दर्द भी देते तुम्ही हो,और तुम्ही मलहम लगाते
बाँध कर बाहों के बंधन में,हमें जब प्यार करते
जी में जो आये करें हम,इस तरह आजाद करते
हमें पिघला ,खुद पिघलते ,आग हो इतनी लगाते
दर्द भी देते तुम्ही हो ,और तुम्ही मलहम लगाते

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पत्नी जी की किट्टी पार्टी

          पत्नी जी की किट्टी पार्टी

पति जी घर में खा रहे ,रोटी,सब्जी ,दाल
पत्नी फाइव स्टार में ,उड़ा  रही है  माल
उड़ा रही है माल ,सखी संग ,गप्पे मारे
पति जी घर में टी वी देखे,वक़्त गुजारे
कह घोटू ,पत्नी की हुई ,पार्टी किट्टी
खर्च पति का ,पर पलीत है उसकी मिटटी

घोटू

सृजन और विसर्जन

  सृजन और विसर्जन

गणपति बप्पा को ,
बड़े चाव और उत्साह के साथ ,
घर लाया जाता है
श्रद्धा  के साथ पूजा की जाती है ,
प्रसाद  चढ़ाया जाता है
फिर कभी डेड़ दिन,कभी सात दिन ,
कभी दस दिन बाद ,
विसर्जित कर दिया जाता है 
देवी दुर्गा का  भी ,इसी तरह,
वर्ष में दो बार ,नौ दिन तक,
होता है पूजन
और फिर वही नियति,विसर्जन
सृजन और विसर्जन
यही तो है जीवन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

दर्द अपना किसे बांटे

        दर्द अपना किसे बांटे

बढ़ रही दिन ब दिन मुश्किल .दर्द अपना किसे बांटे
किस तरह से दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें
उम्र की इन सीढ़ियों पर चढ़ बहुत इतरा रहे थे
जहाँ रुकते ,यही लगता ,लक्ष्य अपना पा रहे थे
किन्तु अब इस ऊंचाई पर ,शून्य सब कुछ नज़र आता
किस तरह के खेल हमसे ,खेलता है ,ये विधाता
कभी सहला प्यार करता ,मारता है कभी चांटे
किस तरह से दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें
धूप देकर जो लुभाता ,सूर्य गोला आग का है           
चाँद देता चाँदनी पर पुंज केवल राख का है
टिमटिमा कर मोहते मन ,दूर मीलों वो सितारे
सच कहा है ,दूर के पर्वत सभी को लगे प्यारे
बहुत मुश्किल,स्वर्ग का पथ ,हर जगह है ,बिछे कांटे
किस तरह से दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें
लोभ में जीवन गुजारा ,क्षोभ में अब जी रहे है
सुधा हित था किया मंथन,पर गरल अब पी रहे है
जिन्हें अपना समझते थे ,कर लिया सबने किनारा 
डूबते को राम का ही नाम  है अंतिम सहारा
किस तरह हम ,पार भवसागर करेंगे ,छटपटाते
किस तरह हम दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिंदी को प्रणाम

आता है साल में एक बार
कहते जिसे 'हिंदी दिवस'
क्यों इसे मनाने के लिए
हम सभी होते हैं विवश

हिन्द की बदकिस्मती
हिंदी यहाँ लाचार है
पाती कोई दूजी ज़बां
यहाँ प्यार बेशुमार है

काश! हिंदी भी यहाँ
बिंदी बनकर चमकती
सूर्य की भाँती दमकती
अँधेरे में ना सिसकती

आओ मिलकर लें अहद
हिंदी को आगे लायेंगे
अपनी मातृभाषा को हम
माता समझ अपनाएंगे

शर्म न आये किसी को
अब हिंदी के उपयोग में
मान अब सब मिल करें
हिंदी के सदुपयोग में

हाथ जोड़े करता वंदन
'निर्जन' हिंदी भाषा को
अर्जी है हम आगे बढ़ाएं
राष्ट्रभाषा, मातृभाषा को

र्फ एक दिन नहीं साल का हर दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाएं | हिंदी को सर्वोच्च स्थान देने में सहायता करें | हिन्द में हिंदी की गरिमा बनायें रखें | अपनी मातृभाषा का सम्मान करें | उससे प्रेम करें | अत्यधिक प्रयोग में लायें | हिंदी भाषी बनें | हिंदी में लिखें पढ़ें अच्छा लगता है | सम्मानित और गौरवान्वित महसूस होता है | हिंदी जिंदाबाद | हिन्द जिंदाबाद | भारत माता की जय | जय हो मंगलमय हो |

निशब्द

       निशब्द

जब सामनेवाले की बात का ,आपके पास ,न हो जबाब
या किसी अपने ख़ास से,बहुत दिनों बाद,मिले हो आप
मन में अचानक ही ,बहुत ज्यादा खुशी छा जाए
या किसी अनचाही घटना से ,आपको सदमा लग जाए
किसी सुन्दर ,अलोकिक ,प्रकृती की रचना को देख कर
या अपरिमित सौन्दर्य से लदी ,किसी ललना को देख कर
कोई अजूबा सा हो,आप सहम  कर,हो जाए भोंचक्के
या कोई सुमुखी सुन्दर महिला ,प्रेम का प्रस्ताव रखे
या फिर कोई आपके मुंह में ,पूरा लड्डू ही भर जाए
या  आपका मुख ,किसीके साथ,चुम्बन में लिप्त हो जाए
या फिर आपके मुख में भरा  हो ,तम्बाखू वाला  पान
या छाले ,दांत का दर्द या टोंसिल बढ़ कर करे परेशान
या आपको  मोटी  लाटरी खुलने का समाचार हो मिला  
या ज्यादा सर्दी जुकाम से बैठ गया हो आपका गला
जब ऐसी स्थिति आती या घटना घट  जाती है
कि अचानक ,आपकी सिट्टी पिट्टी गुम  हो जाती है
चाहते हुए भी आप कुछ भी नहीं बोल पाते है
तब,आप अवाक रह जाते,निशब्द हो जाते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

मै गलत हूँ या सही ?

            मै गलत हूँ या सही ?

मै जानता हूँ ,
श्री गणेश जी को है ये आशीर्वाद
कि हर शुभ काम आरम्भ होता है,
उनके प्रथम पूजन के बाद
फिर भी ,मै जब भी पूजन करता हूँ
पहले शिवजी को चन्दन चढ़ाता हूँ,
फिर गणेशजी का वंदन करता हूँ
क्योकि मेरा मानना है ,
कि पिता प्रथम पूजनीय है ,होते है बड़े
और हर पिता  ये चाहता है,
कि उसका पुत्र ,उससे भी आगे बढे
तरक्की की सीढी चढ़े
उसके बेटे का उससे भी ऊंचा हो स्थान
इसीलिए शिवजी ने दिया होगा ,
गणेशजी को प्रथम पूजा का वरदान
ये उस पिता की महानता थी ,
और इसी महानता के कारण
मै शिव रूपी पिता का पहले करता हूँ पूजन  
इसलिए मै जानना चाहता हूँ यही
कोई मुझे बताये,मै गलत हूँ या सही ?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कस लो कमर हे हिंद वासियों !!

कस लो कमर हे हिंद वासियों, हिंदी को चमकाना है,
भारत माँ के माथे की बिंदी में इसे सजाना है । 

अब बेड़ियों से आज़ादी इसको हमें दिलाना है,
जो अधिकार मिला नहीं है, हम सबको दिलवाना है । 

हर कोने में हिन्द देश के हिंदी को पहुँचाना है,
हर हिंदी भाषी को दिल से बीड़ा ये उठाना है । 

संस्कृत की इस दिव्या सुता को जन-जन से मिलवाना है,
भारत को अपनी भाषा में, विकसित करके दिखाना है । 

कमतर नहीं किसी भाषा से, दुनिया को दिखलाना है,
अपने हर आचार, विचार, हर व्यवहार में लाना है । 

अपने दर से दिल्ली तक, सर्वत्र इसे अपनाना है,
कस लो कमर हे हिंद वासियों, हिंदी को चमकाना । 


सभी को हिंदी दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं । 

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

माँ की ममता

    माँ की ममता

ये ममता भी अजब चीज होती है
माँ,अपनी औलाद के लिए हरदम क्यों रोती है
औलाद ,लायक हो या नालायक
बूढी धुंधली आँखों से ,प्रतीक्षा करती रहती है,
वो जब तक ना आये,तब तक
वो बेटा ,जो अपने व्यसन के चक्कर में ,
ले गया था ,उसका मंगलसूत्र छीन कर
उसने कुछ खाया पीया या भूखा होगा ,
इसी चिंता में खोयी रहती है हरपल
उसकी सुख शान्ति की दुआ करती है
रोज जीती है,रोज मरती है
वो बेटा ,जो उसके पति की अंतिम निशानी ,
उसकी चूड़ी,जिस पर सोने का पतरा जडा  था
जिसके लिए वो बहुत दिनों से पीछे पडा था
एक दिन मारपीट कर के छीन ले गया था
और घर को छोड़ कर भाग गया था
वो बेटा ,जिसकी हर हरकत में हैवानी है
जिस का खून हो गया पानी है
उसकी याद में आंसू बहाती है
उसके  लौटने की दुआ मनाती है
इसलिए जब खाना बनाती है
ये सोच कर कि वो कहीं अचानक ,
लौट कर ना आ जाए ,
उसके लिए दो रोटी बचाती है
उसकी याद में दिनरात रोती  है
ये ममता भी अजब चीज होती है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

स्कर्ट अवतरण

         {आज राधा अष्ठमी है -राधाजी के और आज के
          फेशन से जुडी एक कल्पना प्रस्तुत है }
                       स्कर्ट अवतरण

          राधारानी भोलीभाली
          बरसाना की रहने वाली
         और दूसरी और कन्हैया
          नटखट थे अति चोर कन्हैया
          फोड़ी हंडिया ,माखन खाते
          चीर हरण करते,छुप जाते
           सब गोपी डरती थी उनसे
           मगर प्यार करती थी उनसे 
          चली होड़ उनमे आपस में
          कौन करे कान्हा को बस में    
           मगर किसी को लिफ्ट नहीं दी
           कान्हा की आदत अजीब थी
           राधाजी का हुआ बर्थडे
           पहने नए नए सब कपडे
           रंगबिरंगी चुनरी अंगिया 
           ऊंची ऊंची पहन घघरिया
           सहम सहम कर धीरे धीरे
            चली खेलने ,जमुना तीरे
             नहां रही  जमुना में सखियाँ
            मगर पडी कान्हा पर अँखियाँ
           बस फिर तो घबराई  राधा
            चीर हरण का डर  था ज्यादा
            नए वस्त्र का ख्याल छोड़ कर
            जमुना में घुस गयी दौड़ कर
            ऊंची घघरी  नयी नयी थी
             'सेन्फ्राइज्ड' की छाप नहीं थी
             जल से बाहर निकली रधिया
              सिकुड़ गयी थी नयी घघरिया
              घुटनों तक ऊंची चढ़  आयी
              पर कान्हा मन इतनी भायी
              कि राधा पर रीझ गए वो
              और प्रेम रस भीज गए वो
              उन दोनों का प्यार छुपा ना
              राज गोपियों ने जब जाना
              शुरू हो गया कम्पीटीशन
              ऊंची घघरी वाला फेशन
              फैला ,अपरम्पार हो गया
              और स्कर्ट  अवतार हो गया   
 
 मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अखिंया ,चंचल शोख बड़ी

              घोटू के पद
अखिंया ,चंचल शोख बड़ी
बेसुध,बेकल दीवानी है,साजन संग लड़ी
देखा करती पिया मिलन के ,सपने घडी घडी
कभी हवा का झोंका बन कर ,आँचल को लहराती
तितली सी जाती उड़ उड़ कर ,आसपास मंडराती
कभी भ्रमर सी गुंजन करती ,चुम्बन कर रस पीती
मधु मख्खी सी,मधु संचित कर ,मिलन आस में जीती
घर और द्वारे,राह निहारे .पिय  की  खड़ी खड़ी
देखा करती ,मधुर  मिलन के,सपने घड़ी घड़ी
अँखियाँ ,चंचल ,शोख  बड़ी

घोटू 

क्रीम ही क्रीम

    क्रीम ही क्रीम

आजकल जिधर देखो ,उधर ही क्रीम है
क्रीम सबसे बढ़ कर सुप्रीम है
दूध को तेजी से मथने पर ,
एक लेयर ऊपर आती है
जो बजन में हल्की होती है ,
क्रीम कहलाती है
हमारे देश में भी एक लेयर ,
जो रहती है सबसे ऊपर ,
क्रीमीलेयर  कहलाती है
उसकी मानसिकता भी अक्सर ,
हल्की ही पायी जाती है
मिनिस्टरी में कुछ क्रीमी पोर्टफोलियो होते है
ऑफिस में कुछ क्रीमी पोस्टिंग होती है
जहाँ पर क्रीम ही क्रीम है और मिलते मोती है
आजकल क्रीम खूब  लगाई भी जाती है
 और चाव से  खायी भी जाती है
इस श्रेणी में ,फ्रूट क्रीम है ,आइसक्रीम है
केक हो या पेस्ट्री ,क्रीम ही क्रीम है
क्रीम खाने का स्वाद बढ़ा  देती है
काली दाल को ,माखनी दाल बना देती है
क्रीम,पूरा करती है आपकी सुन्दरता का ड्रीम
बस चेहरे पर लगालो ,व्हाइटनिग  क्रीम
बालों को रंगने के लिए क्रीम है ,
तो ब्लीच करने के लिए भी क्रीम
बालों को सजाने को बिलक्रीम है ,
तो हटाने को हेयर रिमूविंग क्रीम 
क्रीम काले रंग को गोरा बना देता है
गालों पर गुलाबी रंगत ला देता  है
 आपके होंठों पर मुलामियत लाता है
आपके रूप को कमल सा खिलाता है
सीने के उभार के लिए क्रीम है
देर तक प्यार के लिए क्रीम है
आपको मोटापा बढ़ाना है,क्रीम खाइए
आपको मोटापा घटाना है ,क्रीम लगाइए
विवाई फटे तो क्रीम
चोंट लगे तो क्रीम
सर या बदन में दर्द हो तो क्रीम
मौसम ज्यादा सर्द हो  तो क्रीम
शेविंग करने के लिए ,शेविंग क्रीम
दांतों की सफाई के लिए ,डेंटल क्रीम
एंटी रिंकल क्रीम लगा कर ,चेहरे की झुर्री हटाइए
ताजगी और सुन्दरता के लिए,
ब्यूटीक्रीम मिले हुए साबुन से नहाइए
तन के दागों को मिटाने के 'नो मार्क 'क्रीम आता है
चेहरे पर मोती सी चमक या स्वर्णिम आभा के लिए ,
भी स्पेशियल क्रीम लगाया जाता है
कहीं क्रीम में नीम है ,कहीं हर्बल क्रीम है
कहीं बोरोप्लस है,कहीं बोरोलीन है
हर जगह,हर जरुरत के लिए ,क्रीम ही क्रीम है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'



 

सत्संगी दोहे

    सत्संगी दोहे
           १ 
स्वर्णपात्र में उबाला ,आओ पीयो दुग्ध
फिर हमतुम सत्संग करें,तनमन दोनों शुद्ध
               २
खाकर गोंद पलाश का,आता ऐसा  जोश
लगे दहाड़े मारने ,शेर बने  खरगोश
                ३
लाज शरम सब छोड़ दो ,अब इसका क्या काम
तुम कोमल खिलती कली ,मै हूँ  आसाराम

घोटू 

दिनचर्या - बुढ़ापे की

    दिनचर्या - बुढ़ापे की

रात बिस्तर पर पड़े ,जागे सुबह,
                      सिलसिला अब ये रोजाना हो गया है
आती है,आ आ के जाती है  चली ,
                       नींद का यूं  आना  जाना  हो गया  है
     हो गए कुछ इस  तरह हालात है
                            मुश्किलों से कटा करती रात  है
 देखते ही रहते ,टाइम क्या हुआ ,   
                             चैन से सोये  ज़माना हो गया है   
आती ही रहती पुरानी याद है,
                               कभी खांसी तो कभी पेशाब है ,
कभी इस करवट तो उस करवट कभी,
                                 रात भर यूं तडफडाना हो गया है
सुबह उठ कर चहलकदमी कुछ करी ,
                                 फिर लिया अखबार ,ख़बरें सब पढ़ी ,
बैठे ,लेटे , टी .वी देखा बस यूं ही,
                                 अब तो मुश्किल ,दिन बिताना हो गया है

मदन मोहन बाहेती'घोटू '

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

मै लम्बोदर हूँ,नेता हूँ

   मै  लम्बोदर हूँ,नेता हूँ

मै इस गणतंत्र में ,प्रथम पूजनीय हूँ ,
विनायक नहीं,नायक हूँ
रिद्धि सिद्धि ,मेरे आसपास,
 करती है वास ,इतना लायक हूँ
मेरे खाने के और दिखाने के दांत अलग है 
ये बात जानता सारा जग है
करोडो के घोटालों के बाद भी ,
नहीं भरता है मेरा उदर
इसीलिये मै हूँ  लम्बोदर
दिखावे को ,मुझ पर पत्र,पुष्प चढ़ाया जाता है
मुझे    डायिबिटीज है,पर मोदक मुझे भाता  है
मै सूंड से नहीं उठाता ,
चमचों  के जरिये खाता हूँ
भारत भाग्य विधाता हूँ,रोज पूजा जाता हूँ
मेरे वाहन चूहे ,दिखने में छोटे नज़र आते  है
पर मौक़ा पड़ने पर ,
घोटालों से जुडी  फाइलों को,
कुतर कुतर कर खा जाते है
मै विध्नहर हूँ,देश का नेता हूँ
मेरी पूजा करो,प्रशाद चढ़ावो ,
आपके सारे विघ्न हर लेता हूँ
आपके हर काम सिद्ध कर सकता हूँ,
मै वो महारथी हूँ
मै  इस गणराज्य का नेता हूँ,गणपति हूँ

  मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

सोमवार, 9 सितंबर 2013

अपने-सपने

      अपने-सपने

कौन कहता है कि सपने
नहीं होते है अपने
सपने इतने अपने होते है कि ,
आपसे मिलने रात को आते है
जैसे आपके के ख़ास अपने ,
आपसे मिलने ,रात को आते है
सपने देखना ,एक अच्छी बात है ,
इससे मन की चाह अभिव्यक्त होती है
प्रगती की राह ,प्रशस्त होती है
हमने आजादी के सपने नहीं देखे होते,
तो क्या देश आजाद हो पाता
हम चाँद पर नहीं पहुँच पाते,
अगर चाँद पर जाने का सपना ना देखा जाता
क्योंकि जब तक सपने नहीं होते,
तब तक उन्हें पूरा करने के प्रयत्न भी नहीं होते
सपने साकार करने के लिए ,
करनी पड़ती है मेहनत 
तभी सपने बनते है हकीकत
सपना तब टूटता है
जब प्रयास करते करते ,हमारा धीरज टूटता है
जिसे अच्छी नींद आती है,सपने आते है 
अच्छी नींद,चिंतामुक्त व्यक्ति  को आती है
जो मेहनत  करके ,थक कर सोता है
सपने उसी को आते है
और मेहनती आदमी  के ,सारे सपने सच हो जाते है
क्योंकि मेहनत और लगन से किया गया प्रयास
हमेशा सफलता देता है,नहीं करता निराश
मेरी ही बात ले लो,
मैंने जब पहली बार प्यार किया
तो उस हसीं नाजनीन के सपने देखना शुरू किया
और फिर उसे पाने का भरसक प्रयास किया
औए ये मेरी खुशनसीबी है
कि वो आज मेरी बीबी है
अगर मन में हो सच्ची लगन
तो पूरे होते है सपन
मै इसीलिये कहता हूँ,खूब सपने देखो
और उनको पूरा करने के प्रयास में जुट जाओ
और अपना जीवन उन्नत बनाओ

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पत्नी जी का व्रत

         पत्नी जी का व्रत

पत्नी जी है सहचरी , पति सहचर कहलाय
पत्नीजी जब व्रत करे ,तो पति कैसे खाय
तो पति कैसे खाय ,कवि 'घोटू' बतलाते
संग संग चरते ,इसीलिये सहचर कहलाते
पत्नी करवा चौथ करे ,पति खावे  पीज़ा
करके देखो,इसका होगा ,बुरा नतीजा
घोटू 

मीठा ही मीठा

           मीठा ही मीठा

ना मइके की धोंस है ,ना झगडा ,तकरार 
ऐसी भी क्या जिन्दगी ,सिर्फ प्यार ही प्यार
सिर्फ प्यार ही प्यार ,रूठना नहीं मनाना
दिन भर केवल मीठा ही मीठा हो खाना
 'घोटू' बिन नमकीन,नहीं   मीठा है  भाता
 हो  षट व्यंजन साथ ,स्वाद खाने में आता

घोटू 

शनिवार, 7 सितंबर 2013

प्यार कुछ ऐसा दिखाया आपने

 प्यार कुछ ऐसा दिखाया आपने

प्यार कुछ ऐसा दिखाया आपने
जगाया भी,और सुलाया ,आपने
           देख कर हुस्नो अदा हम मर मिटे
            प्यार तुम्हारा मिला,फिर जी उठे
मारा  भी और फिर जिलाया आपने
प्यार कुछ एसा दिखाया  आपने
             इस तरह बांधा हमें आगोश में
             रह नहीं पाये हम अपने होंश में
लबों से अमृत पिलाया आपने
प्यार कुछ एसा दिखाया आपने
            दिल की महफ़िल,सूनी थी,वीरान थी
             आप आये,आयी उसमे  जान थी
रंग कुछ  एसा जमाया आपने
प्यार कुछ एसा दिखाया आपने
              बावरे हम हो गए ,अब क्या कहे
               नाचते ही इशारों पर हम रहे
जादू  कुछ एसा चलाया आपने
प्यार कुछ एसा दिखाया  आपने

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जीवन लता

          जीवन  लता

लताएँ और बेलें
नहीं बढ़ती है अकेले
जब थोड़ी पनपती है
कुछ आगे बढ़ती है
उन्हें आगे बढ़ने को
और ऊपर चढ़ने को
होती है जरूरत ,किसी सहारे की
जिससे लिपट कर के ,वो आगे बढ़ जाए
जीवन की लताओं को
आगे बढाने को
ऊंचा उठाने को
सुख दुःख बाटने को
जीवन काटने को
होती है जरूरत ,किसी प्यारे की,
जिसके संग खुशी खुशी ,ये जीवन कट जाए

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मूंछें -साजन की

            मूंछें -साजन की

मर्दाने चेहरे पर  लगती तो है प्यारी
साजन ,मुझको नहीं सुहाती मूंछ तुम्हारी
        जब होता है मिलन,शूल से मुझे चुभोती
         सच तो ये है ,मुझको बड़ी गुदगुदी होती
लब मिलने के पहले रहती खडी अगाडी
साजन ,मुझको नहीं सुहाती मूंछ तुम्हारी
           बाल तुम्हारी मूंछों के कुछ लम्बे ,तीखे
           कभी नाक में घुस जाते  तो आती छींके
होती दूर ,प्यार करने की इच्छा सारी
साजन मुझको नहीं सुहाती मूंछ तुम्हारी

मदन मोहन बाहेती;घोटू'     

प्यार और जिन्दगी

     प्यार और जिन्दगी

नज़र जब तुमसे मिली
प्यार की कलियाँ खिली
मन मचलने  लग गया
हुआ था कुछ  कुछ नया
प्यार में   यूं  गम  हुए
बावरे हम तुम  हुए
       प्रीत के थे बीज बोये
        तुम भी खोये,हम भी खोये
रात कुछ ऐसी कटी
सुहानी पर अटपटी
ख्वाब में तुम आई ना
नींद हमको  आई ना
और तुमसे क्या कहें
बदलते करवट रहे
           मिलन के सपने संजोये
            जगे हम, तुम भी न सोये
ये हमारी जिन्दगी
थोडा गम,थोड़ी खुशी
आई कितनी दिक्कतें
रहे चलते,ना थके
बस यूं ही बढ़ते रहे
गमो से  लड़ते  रहे
           आस की माला  पिरोये
           हम हँसे भी और रोये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

नेताओं से

         नेताओं से

आप में आया अहम् है
इस तरह जो गए तन है
जिस जगह पर ,आप पहुंचे ,
हमारा  रहमो करम  है
भूल हमको ही गए है ,
आप कितने  बेशरम है
आदमी तो आम है हम,
मगर हम में बहुत दम है
कमाए तुमने करोड़ों,
और हमको दिए गम है
दिक्कतों से जूझते सब ,
आँख सबकी हुई नम है
हुई थी गलती हमी से ,
आ रही ,हमको शरम  है
सुनो ,जाओ सुधर अब भी ,
अब तुम्हारा समय कम है
उठा जन सैलाब जब भी ,
मुश्किलों से सका थम है
वादे कर फुसलाओगे फिर,
आपके मन का बहम है
पाठ सिखला तुम्हे देंगे ,
खायी हमने ये कसम है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

आज की वर्ण व्यवस्था

       आज की वर्ण व्यवस्था

ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य ,शुद्र ये,चारों वर्ण हुआ करते थे
अलग अलग सारे वर्णों के ,अपने कर्म  हुआ करते  थे
ब्राह्मण ,पूजा ,शिक्षण करते ,क्षत्रिय वीर लड़ाई लड़ते
वैश्य ,वणिक व्यापारी होते,बाकी काम शुद्र थे  करते
आज शुद्र सब शुद्ध हो गए ,बचा न  कोई शुद्र वर्ण है
सभी मिल गए अन्य वर्ण में,अब बस केवल तीन वर्ण है
तन मन और जमीर बेचते ,वैश्य न,वैश्या बने कमाते
अलग क्षेत्र हित लड़ते रहते ,क्षत्रिय ना,क्षेत्रीय  कहाते
धर्म कर्म को छोड़ आजकल ,ब्राह्मण ना ,हो गए भ्रष्ट मन
पर सत्ता के गलियारे में ,अब भी होता इनका पूजन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जी हाँ भ्रष्टाचार हूँ मै

        जी हाँ  भ्रष्टाचार हूँ मै

भले कानूनी किताबों में  बड़ा अपराध हूँ
हर जगह मौजूद हूँ मै ,हर जगह आबाद हूँ
रोजमर्रा जिन्दगी का ,एक हिस्सा बन गया ,
हो रहा खुल्लम खुला ,स्वच्छंद हूँ,आज़ाद हूँ
कोई भी सरकारी दफ्तर में मुझे तुम पाओगे ,
चपरासी से साहब तक के ,लगा  मुंह का स्वाद हूँ
घूमता मंत्रालयों में ,सर उठाये शान से ,
मंत्री से संतरी तक के लिए आल्हाद  हूँ
फाइलों को मै चलाता ,गति देता काम को ,
गांधीजी के चित्र वाला ,पत्र ,पुष्प,प्रसाद हूँ
अमर बेलों की तरह,हर वृक्ष पर फैला हुआ ,
खुद पनपता ,वृक्ष को ,करता रहा बर्बाद हूँ 
प्रवचनों में ज्ञान देते ,जो चरित्र निर्माण का ,
ध्यान की उनकी कुटी में ,वासना उन्माद हूँ
मिटाने जो मुझे आये वो स्वयं ही मिट गए ,
होलिका जल गयी मै जीवित बचा प्रहलाद हूँ
जी हाँ,भ्रष्टाचार हूँ मै ,खा रहा हूँ देश को ,
व्यवस्था में लगा घुन सा ,कर रहा बरबाद हूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

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जब भी मै विज्ञापन देखता हूँ,सोचता हूँ,
जब सफोला नहीं होता था ,
लोग अपने दिल का ख्याल कैसे रखते थे
जब हिट नहीं होता था,
मलेरिया के मच्छर से कैसे बचते थे
जब होर्लिक्स या बोर्नविटा नहीं होता था ,
बिना विटामिन डी के ,
दूध का केल्शियम कैसे मिलता होगा
बिना लक्स या ब्यूटी क्रीमों  के,
औरतों का रूप कैसे खिलता होगा
बिना शेम्पू के ,बाल कैसे धोये जाते होंगे
बिना टी वी के लोग वक़्त कैसे बिताते होंगे
बिना मोबाईल के ,बात कैसे होती होगी
बिना बिजली की रोशनी के,रात कैसी होती होगी
घर में ढेर सारे बच्चे और संयुक्त परिवार सारा
इतनी भीड़ में कैसे करते होंगे गुजारा
पर ये सच है ,बिना इन सुविधाओं के भी,
खुशी खुशी जीते थे  ,लोग सारे
हाँ,वो थे ,पुरखे हमारे
घोटू 


हमारा धर्म-हमारे संस्कार

            हमारा धर्म-हमारे संस्कार

हम जब भी गुजरते है ,किसी मंदिर,मस्जिद ,
या  किसी अन्य  धार्मिक स्थल के आगे से ,
सर नमाते  है 
क्योंकि हमारे संस्कार ,हमें ,
सभी धर्मो का आदर करना सिखलाते है
बचपन से ही हमारे मन में भर दी जाती,
यह आस्था और विश्वास है
कि हर चर अचर में,इश्वर का वास है
भगवान ने भी जब अवतार लिया
तो सबसे पहले जलचर मत्स्य याने मछली ,
और फिर  कश्यप याने कछुवे का रूप लिया
फिर वराह बन प्रकटे ,पशु रूप धर
फिर नरसिंह बने,याने आधे पशु ,आधे नर
गणेश जी ,जिनकी हर शुभ  कार्य में,
पहले पूजा की जाती है
नीचे से नर है,ऊपर से हाथी है
हम आज भी गाय को गौ माता कहते है
और वानर रुपी हनुमानजी का
 पूजन करते रहते है
अरे पशु क्या ,हम तो वृक्ष और पौधों में भी ,
करते है भगवान का दर्शन
इसीलिए करते है ,वट,पीपल,
आंवला और तुलसी का पूजन 
हम पर्वतों को भी देवता स्वरूप मानते है ,
कैलाश पर्वत हो या गोवर्धन
पत्थर की पिंडी या मूर्ती को भी ,
देव स्वरूप मान कर करते है आराधन
पूजते है सरोवर
अमृतसर हो या पुष्कर
नदियों को  देवी का रूप मान कर ,
स्नान, पूजा, ध्यान करते रहते है
गंगा को गंगा मैया और,
 यमुना को यमुना मैया कहते है 
नाग को भी देवता मान कर दूध पिलाते है
कितने ही पशु पक्षियों को ,
देवी देवता का वाहन बतला कर ,
उनकी महिमा बढाते है
प्रकृति की हर कृति का करते सत्कार है
ये हमारा धर्म है,हमारे संस्कार है

मदन मोहन बाहेती'घोटू '

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

आँख का क्या ,लड़ गयी सो लड़ गयी

      आँख का क्या ,लड़  गयी सो लड़ गयी

इधर दिल धड़का ,उधर धड़कन बढ़ी ,
हुआ कुछ कुछ,बात आगे  बढ़ गयी
नहीं इस पर बस कभी भी ,किसीका ,
आँख का क्या,लड़ गयी सो लड़ गयी
बहुत हसरत थी कि उनसे हम मिलें
बढ़ें आगे,प्यार के फिर सिलसिले
ललक उनसे मिलने की मन में लगी ,
चाह का क्या, जग गयी सो जग गयी
लालसा थी लबों की मदिरा  पियें
जिन्दगी भर झूम मस्ती से जियें
इस तरह आगोश में उनके बंधे,
प्यास का क्या ,बढ़ गयी सो बढ़ गयी
भावनाएं,आई,ठहरी ,बह गयी,
चाह मन की ,कुछ अधूरी रह गयी
सुहानी  यादें मधुर के भरोसे,
उम्र का क्या ,कट गयी सो कट गयी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

बुढापे की झपकियाँ

            बुढापे की झपकियाँ

बचपन में ऊंघा करते थे जब हम क्लास में,
टीचर जगाता था हमें तब चाक  मार  कर
यौवन में  कभी दफ्तरों में  आती झपकियाँ ,
देता था उड़ा नींद ,बॉस ,डाट  मार कर
लेकिन बुढ़ापा आया,जबसे रिटायर हुए ,
रहते है बैठे घर में कभी ऊंघते है हम,
कहती है बीबी ,लगता है डीयर तुम थक गए,
कह कर के सुलाती हमें ,वो हमसे प्यार कर

घोटू

दावतों का खाना

        दावतों का खाना

हालत हमारी होती है कैसी क्या बताये,
                    जब भी बुलाये जाते बड़ी  दावतों में हम 
खाने का शौक है बहुत ,पर हाजमा नहीं,
                   मुश्किल से काबू पाते ,दिल की चाहतों पे हम
टेबल पर बिछे सामने ,पकवान  सैकड़ों ,
                     मीठा है कोई चटपटा  ,लगते  लज़ीज़ है
जी चाहे जितना खाओ तुम,ये छूट है खुली,
                       पर खा न पाते,मन में होती बड़ी खीज है
मनभाती चाट सामने ,ललचाती है हमें,
                      जब देशी घी में सिकती है ,आलू की टिक्कियाँ
 गरमागरम जलेबियाँ,हलवा बादाम का,
                        मुंह में है आता पानी भर ,दिखती जब कुल्फियां
ढेरों लुभाती सब्जियां,पूरी है ,नान है,
                            पुलाव,दाल माखनी ,और बीसियों सलाद
भर लेते चीजें ढेर सारी ,अपनी प्लेट में,
                          मिल जाती सारी इस तरह,आता अजीब स्वाद   
होती है कुफ्त ,ढंग से ,खा पाते कुछ नहीं,
                            चख चख के भरता पेट,होता बुरे  हाल में 
पर मन नहीं भरता है मगर सत्य है यही ,
                                मिलती है सच्ची तृप्ती घर की रोटी दाल में
दावत में मज़ा ले न पाते ,किसी चीज का,
                                ये खाएं या वो खाएं ,इसी पेशोपश में हम
हालत हमारी होती है,ऐसी क्या बताएं,
                                 जब भी बुलाये जाते बड़ी दावतों में हम

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

आइटम नंबर

        आइटम नंबर

ये आइटम नंबर वाले गाने भी गजब ढाते है
कभी इश्क को कमबख्त ,कभी कमीना बताते है
किसी जुबान पर जब नमक इश्क का चढ़ता
जिगर की आग से वो बीडी जलाया करता
इसी चक्कर में तो मुन्नी बदनाम होती है
अपने डार्लिंग के लिए,वो झंडू बाम होती है
जवानी हलकट है और क्या क्या कहा जाता है
यूं पी ,बिहार भी सब लूट लिया जाता है
कभी अनारकली ,डिस्को चली जाती है
कभी जलेबी बाई ,जलवे सब दिखाती है
कभी फेविकोल सा होता है मन चिपकने का
कभी चिकनी चमेली ,होता मन फिसलने का
कभी छम्मा छम्मा करके खनकती पायल है
कभी कजरारे नयना ,करते सब को घायल है
कभी लैला को ढूंढा करते ,फाड़   कुरता  है
ढूंढते है कभी के चोली के पीछे क्या है
कभी दिल मुफ्त का ,यूं ही लुटाया जाता है
कैसे भी ,फिल्म को बस ,हिट  बनाया जाता है

घोटू

सोमवार, 2 सितंबर 2013

माँ !...ओ माँ !!...ओ माँ !!!


अब तक नहीं आयी
कहां तू लुकाई
भूख ने पेट में
हलचल मचाई
माँ !...ओ माँ !!...ओ माँ !!!

गयी जिस ओर
निगाह उस ओर
घर में तो जैसे
सन्नाटे का शोर
माँ !...ओ माँ !!...ओ माँ !!!
ये हरे भरे पत्ते
बैरी हैं लगते
कहते हैं मां गई
तेरी कलकत्ते
माँ !...ओ माँ !!...ओ माँ !!!

जल्दी से आओ
दाना ले आओ
इन सबके मुंह पे
ताला लगाओ
माँ !...ओ माँ !!...ओ माँ !!!

अब हम न मानेंगे
उड़ना भी जानेंगे
तेरे पीछे-पीछे हम
आसमान छानेंगे
माँ !...ओ माँ !!...ओ माँ !!!

- विशाल चर्चित

रविवार, 1 सितंबर 2013

खजूर

खजूर

खुरदरा सा तना, पत्ते नुकीले,
छाँव देते नहीं , फल भी दूर है
भूल जड़ को , इतने ऊंचे बढ गए,
नहीं नेता, मंत्री ,हम तो खजूर है
घोटू

लड़ाई

  लड़ाई

लड़ाई ,एक ऐसी मानवीय प्रवृत्ति है
जो युगों युगों से आई चलती है
यूं तो देवता दानव हमेशा आपस में लड़ते है
पर अमृत प्राप्ति के लोभ में,
साथ साथसाथ मिलकर ,समुद्र मंथन भी करते है
कभी राज्य और सत्ता के चक्कर में,
कौरव पांडव ,महाभारत कर लेते है
कभी पत्नी के चक्कर में ,समन्दर पर पुल बना,
राम लंका को ध्वंस कर देते है
अक्सर लड़ाई के कारण होते है तीन
जर याने पैसा ,जोरू याने औरत और जमीन
आजकल एक चौथी वजह भी नज़र आती है
मज़हब के नाम पर भी ,खूब लड़ाई लड़ी जाती है
कभी लड़ाई ,सरहदें बनाती है ,
कभी सरहदें लड़ाई कराती है
कभी मूंछों की शान ऊंची रखने के लिए भी ,
लड़ाई की जाती है
कभी बच्चों की लड़ाई ,
बड़ों की लड़ाई में बदल जाती है
बच्चे  तो थोड़ी देर में दोस्त बन जाते है ,
पर बड़ों में तलवारें खिंच जाती है
कई आपसी और व्यक्तिगत लड़ाइयाँ,
अदालत में लड़ी  जाती है
जो मुकदमा कहलाती है
पर एक बात जो मेरी समझ में नहीं आती है
जो बिना फ़ौज के लड़ा जाय,वो मुकदमा फौजदारी ,
और जो बिना दीवानगी के लड़ा जाए ,
वो मुकदमा दीवानी क्यों कहलाता है
पर ऐसी लड़ाइयों में ,लड़नेवाले तो बर्बाद हो जाते है,
पर वकील कमाता है
नेता लोग सत्ता में आने के लिए ,चुनाव लड़ते है
और चुनाव में जीतने के बाद,संसद में लड़ते है
लोकसभा में इनका दंगल ,दर्शनीय होता है
हक की लड़ाई लड़ने वालो को ,
लड़ाई का भी हक होता है
वक़्त काटने के लिए ,गप्पें लड़ाई जाती है
और प्यार करने के लिए चोंचें लड़ाई जाती  है
यूं तो सारी लड़ाइयाँ,
खून खराबा और नफरत फैलाती है 
पर एक लड़ाई ऐसी है,जो प्यार बरसाती  है
जी हाँ ,जब नज़रें लड़ाई जाती है ,
तो फिर  पनपता प्यार है
ऐसी लड़ाई लड़ने के लिए,
ये बन्दा हरदम तैयार है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बच्चा नहीं चच्चा !!!!


जच्चा के पेट का जब
हुआ अल्ट्रासाउन्ड,
नर्स हिल गयी 
अस्पताल हिल गया
देखा जब पेट के
अन्दर का बैकग्राउन्ड...
मां खुद देख रही थी
स्क्रीन पर आंखें फाड़,
जिसको समझी थी तिल
वो तो दिख रहा ताड़...
बच्चा नहीं ये चच्चा
दुनिया में आने से पहले ही
फेसबुक से यारी कर रहा,
अपने आने की खबर वाली
पोस्ट वाल पर जारी कर रहा...
सोचो और समझो बालक
क्या संकेत दे रहा है,
एक नये युग का सूत्रपात
किये दे रहा है...
मां बाप इस उम्र तक
जितना भी सीख पाये हैं,
लाल पेट में ही
वहां से आगे कदम बढ़ाये है...
सुनी होगी आप सबने 
अभिमन्यु वाली कहानी,
मां की पेट में ही सीखा
चक्रव्यूह तोड़ डालना
अपने बाप की जुबानी...
ये किस्सा बहुत पुराना है
अब आया नया जमाना है
बच्चों के जरिये मां बाप को
अब अपना ज्ञान बढ़ाना है...
बच्चे स्कूल जाते हैं
न जाने क्या - क्या
सीख के आते हैं
और होम वर्क के जरिये
अपने मां बाप को सिखाते हैं,
लेकिन बात यहीं तक होती
तो कोई बात नहीं थी,
पर बात - बात पे अक्सर
अब तो उल्लू भी बनाते हैं...
इसलिये आंख खोल कर
होशो हवास में रहिये,
मां बाप बने रहना है तो
नया - नया सीखते रहिये,
वर्ना तो कल को केवल
पछताना रह जायेगा,
देखते ही देखते आपका बच्चा
आपका मां बाप बन जायेगा...

- विशान चर्चित 

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

है डालरों से हम

               है डालरों से हम

बचपन से जवानी  तलक ,पाबंदी थी लगी ,
                ना स्कूलों में ऊँघे और ना दफ्तरों में हम
पर जबसे आया बुढ़ापा ,हम रिटायर हुए,
                 जी भर के ऊंघा  करते है ,अपने घरों में हम
बीबी को मगर इस तरह  ,आलस में ऊंघना ,
                  बिलकुल नहीं पसंद है ,रहती  है डाटती ,
कहती है दिन में सोने से  ,जगते है  रात को,
                    सोने न देते ,सताते,है बिस्तरों में  हम
अब ये ज़माना आ गया ,घर के घाट के,
                     अंकल जी कहके लड़कियां ना घास डालती,
कितने ही रंग लें बाल  और हम फेशियल  करें,
                      उड़ने का जोश ला नहीं ,सकते परों में हम
टी वी से या अखबार से अब कटता वक़्त है,
                        घर का कोई भी मेंबर ,हमको न पूछता ,
पावों को छुलाने की बन के चीज रह गए,
                         त्यौहार,शादी ब्याह के ,अब अवसरों में हम
हम दस के थे,डालर की भी ,कीमत थी दस रूपये ,
                          छांछट का है डालर हुआ ,छांछट के हुए हम,
फिर भी  हमारे बच्चे है  ,इतना न समझते ,
                             होते ही जाते कीमती, है डालरों से  हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू;  

त्रिदेव

                      त्रिदेव

हिन्दू संस्कृति में सदैव
पूजे जाते है तीन देव
जिनका स्थान होता है विशेष
वो है ब्रम्हा ,विष्णू और महेश
सबसे पहले ब्रह्माजी ,जो है सृष्टी के कर्ता ,
जिन्होंने दुनिया को,हमको,आपको बनाया है
पर हमने अपने निर्माणकर्ता को ही भुलाया है
हम कितने संगदिल है
पूरे देश में ,ब्रह्मा जी के, बस एक या दो मंदिर है
और पूरे साल में ,कोई भी नहीं एसा दिन है  विशेष
जिस दिन इनकी होती है पूजा या  अभिषेक
वे परमपिता है
पर आज के युग में पिता को कौन पूछता है ?
दूसरे विष्णू जी ,जो पालन कर्ता है
इन्ही की मेहरबानी से ,सबका पेट भरता है
 जब भी धरती पर अत्याचार बढ़ता है
तो उसे मिटाने,इन्हें अवतार लेना  पड़ता है
बाकी समय ,समुन्दर में,शेषशैया पर,आराम फरमाते है
और अपनी पत्नी लक्ष्मी जी से ,पैर दबवाते है
अकेले मंदिरों में कम नज़र आते है
और अक्सर लक्ष्मी जी के साथ ,
लक्ष्मी नारायण रूप में पूजे जाते है
या फिर अपने राम और कृष्ण के रूप की पूजा करवाते है
इनसे ज्यादा ,इनकी पत्नी के  भक्त है
सारी दुनिया ,लक्ष्मी जी की सेवा में अनुरक्त है
 पर दीपावली को ,सिर्फ लक्ष्मी जी की पूजा होती है ,
विष्णुजी का नाम नदारद रहता है ,ये बात सालती है
पर ये भी  सच  है की पालनकर्ता तो विष्णू है ,
पर असल में लक्ष्मी जी सबको पालती है
तीसरे देवता ,शंकर जी है ,जो हर्ता है ,महादेव कहलाते है
पर कर्ता ,याने लिंग रूप में ज्यादा पूजे जाते है
कहते है ये भोले भंडारी है ,
थोड़ी सी भक्ती में ,जल्दी पिधल जाते है
पूरे देश में,बारह ज्योतिर्लिंगों के रूप में होता है इनका पूजन
अन्य  देवताओं की पूजा के लिए साल में एक दिन,
और इनकी पूजा के लिए पूरा सावन
और तो और ,इनकी 'मेरेज एन्नीवर्सरी 'भी ,
शिव रात्री के रूप में मनाई जाती है
दूर दूर से गंगाजल लाकर ,इन्हें कावड़ चढ़ाई जाती है
ये ही नहीं ,इनके संग  पूजा जाता है इनका पूरा परिवार
और इनके पुत्र गणेशजी ,हर शुभ काम में,
हमेशा प्रथम पूजन के है हक़दार
देश में  सबसे ज्यादा मंदिर इनके
इनकी पत्नी और बेटे गणेश के है
इनके परिवार के लोग ,
सबसे ज्यादा पूजनीय इस देश के है 
ये संहारक है ,इसलिए लोग इनसे डरते है
और इनका मूड गरम न हो जाए  ,
इसलिए जल चढ़ा कर ठंडा रखते है
ये सच है ,भय के बिना होती नहीं प्रीत है
इसीलिए तीन देवों में ये महादेव है ,और इनकी जीत है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सोमवार, 26 अगस्त 2013

मोर,कबूतर और आदमी

      मोर,कबूतर और आदमी

झिलमिलाते सात रंग है ,मोर के पंखों में सब,
नाचता है जब ठुमुक कर ,मोरनी को लुभाता
गौर से गर्दन कबूतर की अगर देखोगे तुम,
जब कबूतरनी को पटाने ,है वो गरदन हिलाता
रंग तब मोरों के पंखों के है सारे उभरते ,
गुटरगूं कर मटकाता है कबूतर गर्दन है जब
कबूतरनी मुग्ध होकर ,फडफडाती पंख है ,
प्यार का ये निमंत्रण मंजूर होता उसको तब
पंछियों के प्यार से ये सीखता है आदमी ,
पत्नीजी के इशारों पर ,नाचता है मोर सा
पत्नीजी को पटाने को वो कबूतर की तरह ,
हिलाता रहता है गर्दन ,हो बड़ा कमजोर सा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

संत

          संत

एक आदमी जो प्रवचन में सीटी बजाता है
नौटंकी करता है ,नाचता गाता है
लोगों को मर्दानगी की दवा बतलाता है
लोगो की जमीनो को  हड़पता है
मासूम बच्ची से  बलात्कार करता है
काले जादू के चक्कर में बच्चों की बलि चढ़ाता है
आज के युग में वो संत कहलाता है
घोटू

जवानी सलामत- बुढ़ापा कोसों दूर है

जवानी सलामत- बुढ़ापा कोसों दूर है

हम तो है ,कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू ,
जब भी जरुरत पड़े,लो काम में,हम ताज़े है
ज़रा सी फूंक जो मारोगे ,लगेगे बजने ,
हम तो है बांसुरी ,या बिगुल,बेन्ड बाजे है
पुरानी चीज को रखते संभाल कर हम है ,
चीज 'एंटिक 'जितनी,उतना दाम बढ़ता है
बीबियाँ वैसे कभी पुरानी नहीं पड़ती ,
ज्यों ज्यों बढ़ती है उमर ,वैसे  प्यार बढ़ता है
वैसे भी दिल हमारा एक रेफ्रिजेटर  है ,
उसमे जो चीज रखी ,सदा फ्रेश  रहती है
हमारी बीबी सदा दिल में हमारे रहती ,
प्यार में ताजगी जो हो तो ऐश रहती  है
समय के साथ,जब बढ़ती है  उमर तो अक्सर,
लोग जाने क्यों ,खुद को बूढा समझने लगते
आदमी सोचता है जैसा,वैसा हो जाता ,
सोच कर बूढा खुद को बूढ़े  वो लगने लगते
सोच में अपने न आने दो उमर का साया,
जब तलक ज़िंदा हो तुम और जिंदगानी है
जब तलक है जवान मन और सोच तुम्हारा,
समझ लो ,तब तलक ही ,सलामत जवानी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

प्यार का गणित

          प्यार का गणित

प्यार करने में दर्जा माँ का ,है सबसे अधिक ऊपर ,
गर्भ से जब तलक ज़िंदा ,तुम्हारा ख्याल रखती है
पिताजी भी है करते प्यार ,पर थोड़े कड़क होते ,
मगर उतना नहीं,जितना कि माता प्यार करती है
प्यार करते है ,भाई बहन भी,जब तक न हो शादी,
मगर उपरान्त शादी के ,बदल जाता गणित सब है
और फिर जबसे आजाती है बीबी ,जिंदगानी  में,
टॉप पर प्यार करने की ,बीबियाँ जाती चढ़ अब है
बाद में ,बच्चे होते,वो भी तुमको प्यार करते है,
मगर जब शादी करके ,जाता है बस,उनका अपना घर
प्यार में अपनी बीबी के ,तुम्हे देते भुला बेटे,
मगर देखा गया है ,ख्याल रखती,बेटियां अक्सर
प्यार करते है बाकी और भी ,पर औपचारिक है,
लिमिट में ही करते प्यार तुमसे,दोस्त जो सारे
बुढापे में,तुम्हारा ख्याल रखती ,सिर्फ बीबी है ,
यही होता गणित है प्यार का  ,संसार में प्यारे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जंगल का कानून

    जंगल का कानून

आजकल तो हो गया जंगल का ये कानून है ,
की यहाँ पर कोई भी ,चलता नहीं क़ानून है
आम जनता सांस भी ले ,तो है ये उसका कसूर ,
और दबंगों के लिए तो,माफ़ सारे खून है  ,
रुपय्ये की साख गिरती जा रही है दिन ब दिन,
और चढ़ते आसमां पर ,जा रहे सब दाम है
आजकल बेख़ौफ़ होकर घूमते  है  दरिन्दे ,
औरतों की अस्मतों को ,लूटना अब आम है
जेल भरने के जो काबिल ,जेब भरते नेता बन,
करते खुल के गुंडा गर्दी , छूट है उनको  खुली
हो गयी है बड़ी गंदी ,राजनीति  इस तरह ,
माफिया को बचाने ,मासूम चढ़ते है सुली
शेर ने तो बाँध रख्खी ,अपने मुंह पर पट्टियाँ ,
रंगे सियारों के हाथों ,चल रही सरकार है
खाने के अधिकार का भी ,बन रहा क़ानून है ,
खूब खाओ,खाने का अब ,कानूनी अधिकार है
राजनीति ,आजकल ,पुश्तेनी धंधा बन गया ,
जिधर भी तुम हाथ डालोगे,उधर ही पोल है
गोलमालों का यहाँ पर ,सिलसिला थमता नहीं ,
इसका कारण ,ये भी है ,संसद भवन ही गोल है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 25 अगस्त 2013

ये हमें क्या हो गया है

        ये हमें क्या हो गया है

हम पहले ,लूटपाट और गुंडागिर्दी करने वाले ,
दबंगों को चुनाव में वोट देकर ,सत्ता में बैठाते है
और फिर उनके अत्याचार और भ्रष्टाचार से ,
परेशान भी बहुत हो जाते है
हम पहले,प्रवचन में मर्दानगी की दवाइयां ,
परोसने वाले ,नाटकीय बहुरूपियों को ,
महान संत बतलाते है
और फिर उनके  जमीन हडपने,कालाजादू करने,
और मासूम बच्चियों पर बलात्कार के किस्से सुन ,
उन पर अपनी नाराजगी भी जतलाते है
क्या हममे पात्र और कुपात्र की,
 परख करने का विवेक ही खो गया है  
खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते है ,
और फिर रोते है,
ये हमें क्या हो गया है ?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

बरसात और शादी

                बरसात और शादी

तपिश से गर्मियों की तंग आ हम प्रार्थना करते ,
कि जल्दी आये मौसम बारिशों का और जल बरसे
अकेलेपन से आकर तंग ज्यों क्वांरा करे विनती ,
जल्द से जल्द बीबी जाए मिल,वो शादी को तरसे
शुरू में बारिशें जब आती है ,मन को सुहाती है,
बाद शादी के जैसे कुछ दिनों आनंद  आता है
मगर जब रोज बारिश की झड़ी लगती ,नहीं रुकती ,
पति भी रोज की फरमाइशों से  तंग आता है
कहीं गड्ढे ,कहीं कीचड,कहीं  पानी,कहीं सीलन ,
न जाने कब बरस जाए ,संग छाता रखो हरदम
मारे खर्चों के होता गीला आटा ,मुफलिसी में भी ,
बाद शादी के ,घर के बजट का ,होता यही आलम
बाद  बारिश के जैसे होती है पैदा नयी  फसलें,
बाद शादी के ऐसे अधिकतर ,परिवार बढ़ता है
बारिशें और शादी ,एक सी,खुशियाँ कभी आफत ,
बचो तुम लाख लेकिन भीगना सबको ही पड़ता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

हुस्न का जादू

         हुस्न का जादू

तुम्हारे हुस्न का जादू ,चला है मेरे सर चढ़ कर
नहीं दुनिया में कोई भी,हसीं है तेरे से बढ़ कर
दिखा कर नाज़ और नखरे,हमारा दिल जलाती हो
कभी जाती लिपट और फिर छिटक के भाग जाती हो
बड़ी मादक  सी अंगडाई ,सवेरे उठ के जब लेती
कई छुरियां चलाती हो ,कलेजा चीर तुम देती
हमें बाहों में भर कर के ,नशा ,उन्माद भरती हो
और फिर छोडिये जी की,खुद  फ़रियाद करती हो
 बड़ी ही स्वाद ,प्यारी और मीठी ,चाकलेटी  हो
लगी हो जबसे होठों से,उतर की दिल में बैठी हो
अदाएं और जलवों से ,हमें बेबस भी करती हो
मज़ा भी पूरा लेती हो,और बस बस भी करती हो
ये सब अंदाज़ तुम्हारे,गजब के है,अजब से है
तुम्हारे इश्क में  पागल,दीवाने हम तो कब से है

मदन मोहन बाहेती'घोटू;

जन्म दिवस पर

  जन्म दिवस पर

उम्र सारी बेखुदी में कट गयी
उस सदी से इस सदी में कट गयी
जमाने ने ,ढाये कितने ही सितम ,
छाई गम की बदलियाँ और छट गयी
कौन अपना और पराया कौन है,
गलतफहमी थी,बहुत,अब हट गयी
मुस्करा कर सभी से ऐसे मिले ,
दूरियां और खाइयाँ सब पट गयी
बचपने में ,जवानी में और कुछ ,
उम्र अपनी बुढ़ापे में बंट  गयी
लोग कहते एक बरस हम बढ़ गए ,
जिन्दगी पर एक बरस है घट गयी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ना है या हाँ है

        ना है या हाँ है

मै तुमसे चाहता  जब कुछ,तुम टालमटोल करती हो,
समझ में ये नहीं आता ,तुम्हारे मन का सच क्या है
कभी गर्दन हिलाती हो,कभी नज़रें झुकाती हो,
पता ही लग नहीं पाता ,तुम्हारी हाँ है या ना है
मैंने ये देखा है अक्सर,इस तरह ना नुकुर कर कर ,
मज़ा लेती हो तुम जी भर,हमेशा का ये किस्सा है
हुआ करता सदा ये है,हसीनो की अदा ये है ,
कि उनकी ना ना का मतलब ,अधिकतर होता ही हाँ है

घोटू 

उल्फत का भूत

          उल्फत का भूत

गया था पूछने इतना ,की मुझको तुझसे उल्फत है,
वो इक तरफ़ा या दो तरफ़ा ,बतादे अपने उत्तर से
न तूने घास कुछ डाली,न पूछा तेरी  अम्मा ने ,
बड़ा बेरंग लिफ़ाफ़े सा ,मै लौटा हूँ ,तेरे घर से
रहा अच्छा ये कि तेरे ,नहीं अब्बा जी थे घर पर ,
नहीं बच नहीं पाते कोई भी बाल ,इस सर पे
कहा कुछ भी किसी ने ना ,मुझे पर मिल गया उत्तर ,
चढ़ा था भूत उल्फत का ,उतर अब है गया सर से
घोटू

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