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रविवार, 28 फ़रवरी 2016

सब चलता है

                 सब चलता है

आँखे चलती,पलकें चलती ,इधर उधर नज़रें चलती है
मुंह चलता ,हम दांत चलाते ,कैंची सी जिव्हा चलती है
चलते हाथ,उँगलियाँ चलती,पैरों से मानव चलता  है
जब तक चलती सांस हमारी ,तब तक ही जीवन चलता है
सूरज चलता रहता दिन भर ,और रात चंदा चलता  है ,
मुश्किल से ही घर चल पाता ,अगर नहीं धंधा चलता है
जल भर कर बादल चलते है,शीतल मंद हवा  चलती है
चंचल सागर लहरें चलती,इठला कर नदिया  चलती है
सरे राह चलते चलते भी ,कोई हमसफ़र मिल जाता है
चक्र समय का जब चलता है,कोई नहीं रोक पाता   है
कुत्ते भोंका ही करते जब मस्ती से हाथी चलता  है
टेढ़ी मेढ़ी चाल ग्रह चलें ,नियती  का  चक्कर चलता है
चालबाज जो चालू होता ,चलता पुर्जा कहलाता  है
जिसका चालचलन अच्छा है,वो सबसे इज्जत पाता है
चलती को गाडी कहते है,जूते,लाठी ,गोली चलती
लेकिन एक शाश्वत सच है,हर घर में  बीबी की चलती
कई बार ,किस्मत अच्छी हो,खोटा सिक्का चल जाता है
भैया हमको सब चलता है,जो फ़ोकट में मिल जाता  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

हुस्नवालों से

         हुस्नवालों से 
                 १
तुम्हारे हुस्न का चर्चा ,यहां हर बार होता है
वो दिन अच्छा गुजरता जब ,तेरा दीदार होता है
न जिस दिन तुम नज़र आते ,बड़ा बेचैन रहता हूँ,
मुस्करा देते हो जिस दिन,मेरा त्योंहार  होता है 
                   २  
अदाएं ,नाज़ और नखरे ,दिखा हमको सताते हो
संवरते और सजते हो ,हमारा दिल  लुभाते हो
देख कर हुस्न का जलवा ,छेड़ते तार हो मन के ,
जरा सा छेड़ हम देते ,तो तुम तोहमत  लगाते  हो

 घोटू 
                                               
 

तू देख किसी का अच्छा कर

             तू देख किसी का अच्छा कर

मत सोच बुरा तू औरों का ,तेरा न भला वरना होगा
तुझको मुआवजा अपनी सब ,करतूतों का भरना होगा
औरों हित ,तूने निज मन में ,नफरत के बीज ,रखे बो है
रहता है दुखी ,यूं ही हरदम ,यह देख देख वो खुश क्यों है
है तेरे  घर में राज तेरा , अपने  घर  में वो राज करें
तेरे जलने और कुढ़ने का ,कैसे क्या कोई इलाज करे
जो हंसी ख़ुशी सबसे मिलता ,आते दुःख कभी करीब नहीं
तू कुढ़ कुढ़ कर बीमार पड़ा , दो रोटी,चैन  ,नसीब नहीं
तू झाँक जरा अपने मन में ,निज कर्मो का विश्लेषण कर
तू देख किसी का अच्छा कर ,तुझमे खुशियाँ जायेगी भर

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मैं तो हूँ अलबेला साबुन

           मैं तो हूँ अलबेला साबुन



मैं तो हूँ अलबेला साबुन
है यही दास्ताँ छोटी सी,
क्षणभंगुर है मेरा जीवन
मेरे तन  में भी सौष्ठव था ,मेरा भी अपना वैभव था
चिकने चमकीले रेपर में ,मैं बंद  कली जैसा नव था
उनने मुझको ले हाथों में ,जब निज कंचन तन सहलाया
इस तरह प्रेम रस डूबा मैं ,मुश्किल से बड़ी ,संभल पाया
मैं ,शरमा शरमा ,सकुचा कर ,हो गया बिचारा झाग झाग
उनके तन आयी  शीतलता ,पर मेरे तनमन  लगी आग
मिलता था प्यार चंद पल का,पर लगती थी वो प्राणप्रिया
बस  उन्हें ताजगी देने को ,मैंने  खुद को  कुरबान  किया
उनके हाथों से फिसल फिसल ,लूटे है मैंने  बहुत  मज़े
हो गई क्षीण अब,जब काया ,अवशेष  मात्र ही सिर्फ बचे
तन मन से की उनकी सेवा ,रह गया आज एक चीपट बन
अब हुआ तिरस्कृत ,पिघल पिघल ,कट जाएगा यूं ही जीवन
परिणिती प्यार की यही मिली ,या वो था  मेरा  पागलपन
मैं तो हूँ अलबेला साबुन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

दावतनामा

           दावतनामा

तुम भी चाहो ,मैं ना आऊँ ,
     यूं भी मुश्किल मेरा आना
फिर भी दस्तूर निभाने को,
       तुमने भेजा दावतनामा
कह सकते अब तुम दुनिया से ,
कि तुमने तो भेजा था न्योता
पर दगाबाज मैं  ही निकला,
मैंने  ही मार  दिया  गोता
यूं बीच  राह में खतम हुआ,
          मेरा तुम्हारा,  अफ़साना 
फिर भी दस्तूर  निभाने को,
           तुमने भेजा  दावतनामा
यदि गलती से मैं आ जाता ,
तुमसे मिलती नज़रें मेरी
कर याद पुरानी बातों को,
यदि पनियाती ,आँखें तेरी
मैं आंसूं पोंछ नहीं पाता ,
         और दिल को पड़ता तड़फ़ाना
फिर भी दस्तूर निभाने को,
          तुमने भेजा  दावतनामा
नादान उमर में देख लिए ,
हमने जाने क्या क्या सपने
मासूम हृदय क्या जाने था ,
हम एक दूजे हित ,नहीं बने
 तुम्हारा है  अभिजात्य वर्ग , 
            मैं अदना ,पगला,दीवाना
  फिर भी दस्तूर निभाने को  ,
             तुमने भेजा दावतनामा
हो रही पराई हो अब तुम, 
यूं भी मेरी अपनी ,कब थी
संग जीने मरने की कसमे ,
बचपन वाली हरकत ,सब थी
दुनियादारी की रस्मो से ,
         तुम भी,मैं भी था अनजाना
फिर भी दस्तूर निभाने को ,
             तुमने भेजा दावतनामा
 
मदन मोहन बाहेती'घोटू'                      
 
              

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