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सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

बारात में

       बारात  में 

 शादी में उनकी क्या बताएं ,कैसे ठाठ थे
थे ढेर सारे स्नेक्स और स्टाल   चाट  के 
क्या खायें और क्या चखें,मुश्किल में पड़े थे ,
वेटर बुलाते एक, तो आ जाते   आठ थे

व्यंजन हजारों खाने की टेबल की शान थे
एक एक से बढ़ ,एक हसीं ,मेहमान थे  
खाने पे जोर दे कि खानेवालों को देखें,
  दुविधा फंसे ,हम तो यूं ही परेशान थे 

 फंक्शन में उनके रौनकें कुछ ऐसी रही थी
खाना था लाजबाब और शराब बही थी 
चटखारे लेके बोला एक बूढा सा बराती ,
दुल्हन तो दुल्हन ,उसकी माँ भी ,कम तो नहीं थी    

घोटू             

कोई लड़की नहीं पटती

               कोई लड़की नहीं पटती

समा जाती है आआ कर,न जाने कितनी ही नदियां ,
              है हम गहरे समंदर वो,कोई तो बात है  हम में
भले ही पानी खारा है ,बुझा ना प्यास भी पाते,
              मगर विस्तृत बड़े है हम ,कशिश कुछ ख़ास है हम में
नहीं,छिछले,छिछोरे है ,बड़े गंभीर ,गहरे है,
                      भरे है मोती,रत्नो से ,रईसी खानदानी है
तरंगे मन में उठती है ,जो सबको खींच लेती है ,
                       उमंगें जोश तूफानी,भरी हम में जवानी है
किस समय रखना 'लो टाइड'किस समय ज्वार ले आना,
                          पुराने ये तजुर्बे है,जो हरदम काम आते है
न कोई जाल फेंकें है ,न डाले कोई भी काँटा ,
                     करोड़ों मछलियाँ प्यारी ,मगर फिर भी फंसाते है
मगर कुछ कुवे ,सरवर है ,भरा जिनमे मधुर जल है ,
                          नदी कोई भी भूले से,उधर का रुख नहीं करती
अगर अपने ही अपने में ,सिमट कर कोई रहता है ,
                       कोशिशे लाख करले पर ,कोई लड़की नहीं पटती 
 'घोटू '
                      
  '            
             
               

मज़ा

              मज़ा

न आता गर्म बालू से,गरम पानी की थैली से ,
        है तपती धूप में आता ,मज़ा असली सिकाई का
न सूखी बर्फियों में है ,न लड्डू ,बालूशाही में,
       जलेबी की टपकती चाशनी , सुख है  मिठाई  का
लूटते चोर डाकू और बड़े शोरूम मालों में ,
        मज़ा लेकिन निराला है ,हसीनो की लुटाई का 
मज़ा ना मार में माँ की,पिता की या कि टीचर की,
         मज़ा कुछ और ही होता है बीबी से  पिटाई का

घोटू

वेलेंटाइन डे के बाद

       वेलेंटाइन डे के बाद

चेहरा हसीन ,बातों में मिश्री घुली हुई,
         लम्बी सी लिस्ट ,दोस्तों की उनने जोड़ ली
अबके से वेलेंटाइन पर ,इतने मिले गुलाब ,
         अब्बू ने उनके ,फूलों की दूकान खोल ली

घोटू

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

फ़िक्र

              फ़िक्र

फ़िक्र कर रहे हो तुम उसकी,जिसे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है
जिसके लब पर,भूलेभटके ,कभी तुम्हारा  जिक्र  नहीं है
टुकड़ा दिल का ,निभा रहा है ,बस ऐसे संतान धर्म वह
हैप्पी होली या दिवाली,या फिर हैप्पी जन्मदिवस  कह
तुम्हारे ,दुःख ,पीड़ा,चिंता ,बिमारी का ख्याल नहीं है
तुम कैसे हो,किस हालत में ,कभी पूछता ,हाल नहीं है
आत्म केंद्रित इतना है सब रिश्ते नाते भुला दिए है
जिसने अपनी ,जननी तक को ,सौ सौ आंसूं रुला दिए है
कहने को है अंश तुम्हारा ,पर लगता है बदला,बदला
या फिर तुमसे ,पूर्व जन्म का,लेता है शायद वो बदला
भूल गया सब रिश्ते नाते ,बस  मैं हूँ और मेरी मुनिया
दिन भर व्यस्त कमाई करने में सिमटी है उसकी दुनिया
इतना ज्यादा ,हुआ नास्तिक,ईश्वर में विश्वास नहीं है
अहम ,इस तरह ,उस पर हाबी ,जो वो सोचे ,वही सही है
आ जायेगी ,कभी सुबुद्धि ,बैठे हो तुम आस लगाये
कोई उसको क्या समझाए ,जो कि समझना कुछ ना चाहे
तुम कितनी ही कोशिश करलो,उसको पड़ता फर्क नहीं है
फ़िक्र कर रहे हो तुम उसकी ,जिसे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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