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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

बाली

                 बाली

सुबह उठा ,बोली घरवाली ,क्या मुश्किल कर डाली
ढूंढो ढूंढो ,नहीं मिल रही  ,मेरे कान   की   बाली
हम बोले ,आ गया  बुढापा,उमर नहीं अब बाली
और  कान की बाली तक भी ,जाती नहीं संभाली
पत्नी  बोली मुझे डाटते ,ये है बात निराली 
शैतानी तो तुम करते हो, खोती मेरी  बाली
मै बोला सुग्रीव सरल मै ,महाबली तुम  बाली
मेरी आधी शक्ति तुम्हारे सन्मुख होती खाली
सुन नाराज हुई बीबीजी ,ना वो बोली  चाली
उसे मनाने ,चार दिवस को ,जाते है हम बाली
घोटू
( हम अगले सप्ताह के लिए बाली भ्रमण पर
 ले जा रहे है अपनी पत्नी को मनाने -अत :एक
सप्ताह की ब्लोगिंग की छुट्टी -----घोटू  )

गुरुवार, 28 मार्च 2013

तलाश

            तलाश

मै तो दर दर भटक रहा था
गिरता पड़ता अटक रहा था
इधर झांकता,उधर  झांकता
सड़कों पर था धूल  फांकता 
गाँव गाँव द्वारे द्वारे   में
मंदिर  मस्जिद , गुरद्वारे में
फूलों में  ,कलियों,में ढूँढा
पगडण्डी,गलियों में ढूंढा
मित्रों में ,अपने प्यारों में
कितने ही रिश्तेदारों में
कुछ जानो में ,अनजानो में 
सभी वर्ण  के इंसानों में
भजन,कीर्तन के गानों में
युवा हो रही संतानों में
इस तलाश ने बहुत सताया
लेकिन फिर भी ढूंढ न पाया
नहीं कहीं भी ,लगा पता था
मै  'अपनापन 'ढूंढ रहा था

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मज़ा होली का

       मज़ा होली का

सुघड  पड़ोसन ,कितनी सुन्दर ,आती जाती,मुस्काती है
भले तुम्हारे ,मन को भाती ,पर भाभीजी ,कहलाती है
लेकिन जब होली आती है ,मिट जाता ,मन का मलाल है
उनके कोमल से गालों पर ,जब हम मल सकते गुलाल है
एक साल में,एक बार ही ,मिट सकती ,मन की भड़ास है
होली का यह पर्व इसलिये ,मन को भाता ,बड़ा  ख़ास है
घोटू

बुधवार, 27 मार्च 2013

होली की शुभकामना के साथ........



चिमटा चला के मारा, बेलन घुमा के मारा
फिर भी बचे रहे तो, भूखा सुला के मारा

बरसों से चल रहा है, दहशत का सिलसिला ये
बीवी ने जिंदगी को, दोजख बना के मारा

कैसे बतायें कितनी मनहूस वो घडी थी
इक शेर को है जिसने शौहर बना के मारा

वैसे तो कम नहीं हैं हम भी यूं दिल्लगी में
उसपे निगाह अक्सर उससे बचा के मारा

चर्चित को यूं तो दिक्कत, चर्चा से थी नहीं पर
बीवी ने आशिकी को मुद्दा बना के मारा

- विशाल चर्चित

मंगलवार, 26 मार्च 2013

संध्या

               संध्या

तुम संध्या ,मै सूरज ढलता ,
                       तुम पर जी भर प्यार लुटाता 
तुम्हारे कोमल कपोल पर ,
                        लाज भरी मै  लाली लाता
फिर उतार तुम्हारे तन से ,
                         तारों भरी तुम्हारी चूनर
फैला देता आसमान में ,
                           और तुम्हे निज बाहों में भर
क्षितिज सेज पर मै ले जाता,
                            रत होते हम अभिसार में
हम तुम दोनों खो  जाते है,
                            एक दूजे संग मधुर प्यार में
प्राची आती ,हमें जगाती,
                              चूनर ओढ़ ,सिमिट तुम जाती
मै दिन भर तपता रहता हूँ,
                               याद तुम्हारी ,बहुत सताती
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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