एक सन्देश-

यह ब्लॉग समर्पित है साहित्य की अनुपम विधा "पद्य" को |
पद्य रस की रचनाओ का इस ब्लॉग में स्वागत है | साथ ही इस ब्लॉग में दुसरे रचनाकारों के ब्लॉग से भी रचनाएँ उनकी अनुमति से लेकर यहाँ प्रकाशित की जाएँगी |

सदस्यता को इच्छुक मित्र यहाँ संपर्क करें या फिर इस ब्लॉग में प्रकाशित करवाने हेतु मेल करें:-
kavyasansaar@gmail.com
pradip_kumar110@yahoo.com

इस ब्लॉग से जुड़े

शुक्रवार, 29 जून 2012

लक्ष्य-लक्ष्मी प्राप्ति का

लक्ष्य-लक्ष्मी प्राप्ति का

जो फलों की कामना हो,बीज बोना चाहिये

लक्ष्मी की प्राप्ति का ही,  लक्ष्य होना चाहिये
पीठ कछुवे की तरह से,इस कदर मजबूत हो,
जरुरत पड़ने पे उसको पहाड़ ढोना  चाहिये
लेना पड़ सकती है तुमको,दुश्मनों की भी मदद,
देवता और दानवों सा,  साथ होना  चाहिये
कोई भी जरिया हो चाहे नाग की मथनी बने,
कैसे भी हो ,हमको बस ,सागर बिलौना चाहिये
निकल  सकता है हलाहल,भी सुधा की चाह में
,साथ संकट निवारक  शंकर का होना  चाहिये
उच्च्श्रेवा,एरावत,निकलेगी रम्भा,वारुणी,
छोट मोटे रत्नों का बंटवारा होना चाहिये
लक्ष्मी खुद प्रकट होकर आपको मिल जाएगी,
प्रतीक्षा में धैर्य अपना नहीं खोना  चाहिये
अपने साथी देवताओं को ही अमृत बांटना,
मोहिनी का रूप पर सुन्दर ,सलोना चाहिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मै प्लास्टिक का दाना हूँ

 मै प्लास्टिक का दाना हूँ

मै प्लास्टिक का दाना हूँ

श्वेत वर्ण सुन्दर और मोती सा सुहाना हूँ
समय के एक्सट्रूडर में,
जब जब मै पिघलता  हूँ
अलग अलग सांचों में,
अलग अलग रूपों में,
ढलता,संवरता हूँ
कभी मै कंघा बन,
गौरी क्र नरम नरम,
केशों को सहलाता हूँ
कभी खिलौना बन कर,
रोते हुए बच्चों को,
खुश कर हंसाता हूँ
कभी बाल्टी बन कर,
अपने में पानी भर,
उनको नहलाता हूँ
चाय  का कप  बन कर,
उनके होठों से लग,
कितना सुख पाता हूँ
बेग बना तो सब्जी,
और चीजें घर भर की ,
भर भर के लाता हूँ
और टूट जाने पर,
फेंक दिया जाता या,
बेच दिया जाता हूँ
ये मेरे जीवन का अंत नहीं होता है
बार बार गलता हूँ,
बार बार ही मेरा पुनर्जनम होता है
बार बार नया रूप,
बार बार तिरस्कार
उम्र के साथ साथ,
कमजोरी बार बार
कभी ख़ुशी होती है,
कभी कभी  रोता मन
क्या ये  ही है नियति,
क्या ये ही है जीवन
जगती के  चक्कर का,बस आना जाना हूँ
मै  प्लास्टिक का दाना हूँ

मदन  मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 27 जून 2012

तू इनायत अली

     तू इनायत अली

मेरे मौला तू करता है सबकी भली

तू इनायत अली,तू इनायत  अली
तेरी तारीफ़ के गीत है  गूंजते,
हर गांओं,शहर और मोहल्ले,गली
तू इनायत अली,तू इनायत अली
तू तो नूरजहाँ है,हम खाख है
तू तो अल्लाह है,तू खुदा  पाक है
तेरी रहमत से ही होते दिन रात है
ये जहाँ सारा  तेरी करामात   है
है बड़ी ही अनोखी ये जादूगरी
तू इनायत अली,तू इनायत अली
बीज खेतों में उग कर फसल बनते है
फूल खिलते है,पेड़ों में फल लगते है
सर्दियाँ या गर्मी या  बरसात  है
सारे मौसम बदलना तेरे हाथ है
गिरे पतझड़ में पत्ते,खिले है  कली
तू इनायत अली,तू इनायत अली
ऐसी दुनिया बनायी है तूने खुदा
इतने इंसान है पर सभी है  जुदा
है इतने जनावर,परिंदे   कई
ऐसी कारीगरी देखी  ना कहीं
तूने फूलों में रंगत और खुशबू भरी
तू इनायत अली,तू इनायत  अली
रोज सूरज उगे,बांटता  रौशनी
चांद फैलता रातों में आ चांदनी
टिमटिमाते है तारे,चले  है हवा
हम हैं बन्दे तेरे,तू बड़ा मेहरबां
है तेरे ही इशारों पे दुनियां चली
तू इनायत अली,तू इनायत अली

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

पाती-पिता के नाम

 पाती-पिता के नाम

आज हम जो कुछ भी हैं,ये मेहरबानी आपकी

हमारा किस्सा नहीं ,ये है कहानी आपकी
जिंदगी के इस सफ़र में ,आई जब भी मुश्किलें,
हम गिरे या लडखडाये,उंगली  थामी आपकी
थपथपा कर पीठ इसी हौसला अफजाई की,
जोश दूना भर गयी  ये कदरदानी  आपकी
इस चमन में खिल रहे है,फूल हम जो महकते,
आपका है खाद पानी, बागवानी   आपकी
आपने डाटा ,दुलारा ,सीख दी ,रस्ता  दिखा,
याद है बचपन की सब ,बातें पुरानी आपकी
आपके कारण ही कायम है हमारा ये वजूद,
आपका ही अक्स हैं,हम है निशानी   आपकी
देर से आये हैं लेकिन आये हैं हम तो दुरुस्त,
आपको पहचान पाए,कदर  जानी आपकी
आपका साया हमारे सर पे  बस कायम रहे,
हे खुदा! हो जाए हम पर मेहरबानी  आपकी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

गड्डों से बचो

      गड्डों से बचो

घर से जब निकलो

संभल  कर चलो
सोच समझ कर के,
बाहर पग  धरो
हो सकता है,तुम्हारे पडोसी ने,
अपने फायदे के लिए,
या तुम्हे फ़साने
गड्डे खोद रखें हो,
जिनमे तुम या तुम्हारे बच्चे,
गिर सकते है,जाने,अनजाने
और प्रिंस या माही की तरह,
बन सकते है सिर्फ  अफ़साने
याद रहे,गड्डे खोदना कठिन है,
पर उनमे गिरना बड़ा आसान है
और उनमे से निकलने में,
बड़ी मुश्किल में फंस जाती जान है
क्योंकि एक गड्डे से निकलने के लिए,
पास में दूसरे गड्डे भी खोदने पड़ते है
और आपस में जोड़ने पड़ते है
और इस कार्यवाही में,
इतना समय लग जाता है
कि गड्डे में गिरे आदमीका,
दम ही निकल जाता है
आज खेतों में खुले बोरवेल  है
सड़कों पर खुले मेनहोल  है
नफरत के गड्डे है
 लालच  के गड्डे है
नशीले पदार्थों के गड्डे है
बेईमानी और भ्रष्टाचार के गड्डे है
जरा सी भी असावधानी हुई,
हम इनमे गिर जाते है
मुश्किल से घिर जाते है
इसीलिए कहता हूँ,
घर से जब निकलो
संभल कर चलो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


हलचल अन्य ब्लोगों से 1-