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सोमवार, 12 अगस्त 2024

बूढ़े बुढ़िया और बुढापा 


देखो बूढ़ा अपनी बुढ़िया ,

को किस तरह सताता है 

काम धाम कुछ भी ना करता,

केवल जुबां हिलाता है 


जब से हुआ रिटायर घर में 

रहता बैठा ठाला है 

दिन में सात आठ बार चाहिए ,

उसे चाय का प्याला है 


थोड़ा बरसाती मौसम हो 

पकौड़ियां तलवाता है 

या स्विग्गी से मंगा समोसे 

चुपके-चुपके खाता है 


कभी चाहिए दही पापड़ी ,

छोला और भटूरा है 

आलू टिक्की, पानी पूरी 

का भी आशिक पूरा है 


गाजर हलवा, गरम जलेबी,

 खाना बहुत सुहाता है 

स्वीट टूथ है देख मिठाई 

मुंह पानी भर लाता है 


हालांकि यह सब खाने की 

लगी हुई पाबंदी है 

फिर भी आंख चुरा खाने की 

उसकी आदत गंदी है 


 सुबह-सुबह अखबार चाटता 

देख सीरियल टीवी में 

दिनभर की मिल गई सेविका 

उसको अपनी बीवी में 


हाथों में हर दम मोबाइल 

व्हाट्सएप पर चैट करें 

देर रात तक रहे जागता 

सोने में भी लेट करें 


कभी बोलना सर दुखता है 

थोड़ा तेल लगा दो तुम 

कभी बोलना दर्द पांव में 

थोड़े पैर दबा दो तुम 


कभी बैठकर बीते किस्से 

दोनों याद किया करते 

हर फंक्शन में ,दोनों सज कर 

खुलकर भाग लिया करते 


बुढ़िया बूढ़े को सहती है 

बूढ़ा बुढ़िया को सहता 

पूरा दिन भर एक दूजे का 

ख्याल हमेशा पर रहता 


कभी रूठना ,कभी झगड़ना

 मान मनौव्वल कभी-कभी 

बहुत अधिक भावुक हो करके 

रोने के पल कभी कभी 


दोनों में से पहले कौन 

जाएगा यह चिंता करना 

कैसे गुजरेगा एकाकी 

जीवन सोच सोच डरना 


कहता  जितना जीवन जीना 

क्यों ना मस्ती मौज करें 

मौत आनी है ,आएगी ही

उससे क्यों हर रोज डरें 


इस जीवन के बचे कुचे दिन 

शान रहे और ठाठ रहे 

इसी तरह मिल बूढ़े बुढ़िया 

वृद्धावस्था काट रहे


मदन मोहन बाहेती घोटू 

 

शनिवार, 10 अगस्त 2024

बूढ़ों की लोरी 


बिस्तर पर लेटें हैं बूढ़ा और बुढ़िया

 इनको सुलाने को आ जा तू निंदिया 


कभी दौरा खांसी का बुढिया को आता  

तो बूढ़ा उठ कर के पानी पिलाता 

कभी दर्द बूढ़े के पैरों में आया

पेनबाम बुढिया ने झट से लगाया 

कभी याद करते पुरानी वो बातें 

लाख जतन करते, सो नहीं पाते 

कैसे भी इनको ,सुला जा तू निंदिया 

इनको सुलाने को आजा तू निंदिया 


बूढ़ा उठ के बार बार बाथरूम जाता 

तकिए को बाहों में अपनी दबाता 

करवट बदलते ही रहते हैं दोनों 

बस ऐसे जगते ही रहते हैं दोनों 

कभी  पाठ हनुमान चालीसा करते 

कभी राम का नाम रह रह के जपते 

इनको भी सपने दिखा जा तू निंदिया इनको सुलाने आ जा तू निंदिया 


मदन मोहन बाहेती घोटू

कैसे मानू


 कैसे बात तुम्हारी लूं मैं मान जी 

शिवजी के हैं अवतार हनुमान जी 


प्रभु प्रकटे जब बन कर राम 

शंकर आए बन हनुमान 

रहे पहाड़ों में शिव शंकर 

तरु शाखा पर रहते वानर 

वानर नग्न ,मगर वाघांबर

शिवजी का परिधान जी 

कैसे बात तुम्हारी लूं मैं मान जी 

शिवजी के है अवतार हनुमान जी 


भूत पिशाच  शिवा के संगी 

इन्हें भगाए पर बजरंगी 

भूत पिशाच निकट नहीं आवे 

महावीर जब नाम सुनावे 

मुंडमाला को धारण करते

हैं शंकर भगवान जी 

कैसे बात तुम्हारी लूं मैं मान जी 

शिवजी के हैं अवतार हनुमान जी 


रावण शिव का भक्त परम था 

शिव के कारण उसमें दम था 

किंतु राम का वह दुश्मन था 

सीता जी का किया हरण था 

और राम के सच्चे सेवक,

सदा रहे हनुमान जी 

कैसे बात तुम्हारी लूं मैं मान जी 

शिवजी के हैं अवतार हनुमान जी 


शिवजी ने दो ब्याह रचाये 

ब्रह्मचारी हनुमान कहाये 

शिवजी चलते हैं नंदी पर 

डाल डाल पर उछले वानर 

एक तपस्वी,एक उपद्रवी

 कुछ भी नहीं समान जी 

कैसे बात तुम्हारी मैं लूं मान जी 

शिव जी के हैं अवतार हनुमान जी 


मदन मोहन बाहेती घोटू

हम हैं भक्त शिव शंकर के 


तेजोमय शिव प्रचंड 

मस्तक पर है त्रिपुंड 

और पुत्र वक्रतुंड जानिए 


पहने हैं वाघांबर 

चंद्र सुशोभित है सर 

ऐसे हैं गंगाधर मानिए 


गले पड़ी सर्पमाल 

और भाल है विशाल 

नंदी पर हैं सवार पहचानिए 


डमरू स्वर डम डम डम 

संग त्रिशूल है हरदम 

भोले को बम बम पुकारिए 


प्रकटी है गंगा जिनके सर से 

हम तो भगत है शिव शंकर के 

हर कोई बोले ,बम बम भोले 

प्रेम से बोले,बम बम भोले 


शिव शंकर  अविनाशी 

काशी के भी वासी 

भव्य तेज राशि ,पर भोले हैं 


उनसे हर कोई डरे 

यह तांडव नृत्य करें 

नेत्र तीसरा जब भी खोले हैं 


हिल जाते भू अंबर 

बन जाते प्रलयंकर 

आंखों से बरसाते शोले हैं 


जब हो जाते प्रचंड 

कर देते खंड-खंड 

शांत हो के फिर बनते भोले है


जिसे सब रहते हैं डर-डर के 

हम है भगत शिव शंकर के

 हर कोई बोले , बम बम भोले 

 प्रेम से हर बोले,बम बम भोले 


मदन मोहन बाहेती घोटू

बुधवार, 7 अगस्त 2024

व्यथा कथा


आओ तुम्हे सुनाएं यारों,

अपनी व्यथा कथा 

अब ये कथा व्यथा या सुख की,

 देना मुझे बता 


जिस लड़की पर भी दिल आया ,उसने हमको घास न डाली 

मुश्किल से मिल पाई बीवी, 

थोड़ी ठिगनी ,थोड़ी काली 

कामकाज में बड़ी निपुण थी ,

लेकिन थी तो काली कोयल 

उसे साथ में लेकर जाकर ,

कभी न हम हो पाए सोशल 


दोस्त पत्नियां सब थी सुंदर

मिलती जुलती रहती सज कर 

और पत्नी थी होशियार पर 

रहे किचन में घुसी सदा 

आओ तुम्हें सुनाए यारों 

अपनी व्यथा कथा 


पाक कला में वो प्रवीण थी

स्वाद भरे पकवान खिलाती  

सास ससुर की करती सेवा,

हम पर ढ़ेरों प्यार लुटाती 

साफ और सुथरा रखती घर को 

हरदम सुंदर और सजा कर 

मेहमानों का स्वागत करती 

हरदम खुश हो और मुस्काकर 


गुण उसमें कितने ही भरे थे 

सब उसकी तारीफ करे थे 

मैं मूरख काले रंग को ले ,

व्यंग मारता रहा सदा 

आओ तुम्हें सुनाए यारों 

अपनी व्यथा कथा 


गोरी पत्नी सदा सताती 

होती है फैशन की मारी 

उसके साज श्रृंगार को लेकर

खर्चे होते भारी-भारी 

सास ससुर आंखों में चुभते 

नहीं कोई  मेहमान सुहाते

नहीं पकाना आता अक्सर 

होटल से खाना मंगवाते 


उसके नखरे से सहते सहते 

पतिदेव टेंशन में रहते 

काली बीवी पाकर जीवन,

 सदा खुशी से  रहे लदा 

आओ तुम्हें सुनाये यारों 

अपनी व्यथा कथा


मदन मोहन बाहेती घोटू

ओ भैया मेरे लाडले 


तू जिए हजारों साल, ओ भैया मेरे लाडले तेरा जीवन हो खुशहाल , ओ भैया मेरे लाडले 


एक मां की संताने हैं हम 

संग गुजारा,हमने बचपन 

एक मिट्टी में हम तुम खेले 

वो दिन भी थे,क्या अलबेले 

कभी दोस्ती, कभी लड़ाई 

मिलजुल हमने करी पढ़ाई


तुम चले गए कालेज और हम ससुराल चले 

तू जिये हजारों साल ,ओ भैया मेरे लाडले


भाई बहन के प्यार का रिश्ता 

सारी उमर तलक हैं निभता 

हर एक बरस जब आता सावन 

बंधता है रक्षा का बंधन 

भाई की कलाई पर बहना 

बांधती है राखी का गहना 

और बरसती है प्यार, ओ भैया मेरे लाडले तू जिये हजारों साल , ओ भैया मेरे लाडले


मदन मोहन बाहेती घोटू

मौत से निवेदन 


ऐ मौत तू आएगी ही, निश्चित तेरा आना

बस इतनी गुजारिश है जरा देर से आना


जबतक था जवां,उलझा गृहस्थी के जाल में 

हर दम ही रहा व्यस्त, कमाने को माल मैं 


यूं वक्त खिसकता गया और आया बुढ़ापा

अपने में भी मैंने दिया तब ध्यान जरा सा


 भगवान ने इतनी हसीं दुनिया यह बनाई 

कुछ भी मजा लिया न ,यूं ही उम्र गमाई


जितनी बची है जिंदगी, कुछ ऐश मैं कर लूं

भगता उम्र का भूत ,लंगोटी ही पकड़ लूं


 आनंद से है उम्र बची मुझको बिताना  

ऐ मौत गुजारिश है ,जरा देर से आना


कितनी ही मेरी ख्वाइशें अब तक है अधूरी

मैं चाहता हूं जीते जी कर लूं उन्हें पूरी


कितनों के ही एहसान है,मैं उनको चुका दूं

सतकर्म में, मैं,अपनी उमर बाकी लगा दूं 


काटू बुढ़ापा ऐश और आराम करूं मैं

गगरी को अपने कर्म की पुण्यों से भरूं मैं


 सब पाप धो दूं गंगा में ,जीवन सुधार लूं

कुछ दान धर्म कर लूं ,प्रभु को पुकार लूं


 अगले जन्म के वास्ते हैं पुण्य कमाना  

ऐ मौत गुजारिश है कि ज़रा देर से आना


मदन मोहन बाहेती घोटू

मुझको दिया बिगाड़ आपने

 मुझको दिया बिगाड़ आपने
 मुझ पर इतनी प्रीत लुटाकर सचमुच किया निहाल आपने
मै पहले से कुछ बिगड़ा था,थोडा दिया बिगाड़ आपने

पहले कम से कम अपने सब ,काम किया करता था मै खुद
अस्त व्यस्त से जीवन में भी,रखनी पड़ती थी खुद की सुध
अब तो मेरे बिन बोले ही ,काम सभी हो कर देती तुम
टूटे बटन टांक देती  हो ,चाय     नाश्ता  धर देती तुम 
मेरी हर सुख और सुविधा का ,पूरा ध्यान तुम्हे रहता है
मुझ को कब किसकी जरुरत है,पूरा भान तुम्हे रहता है
 मुझे आलसी बना दिया है ,
रख कर इतना ख्याल आपने 
 मै पहले से कुछ बिगड़ा था,   थोडा दिया बिगाड़  आपने 

भँवरे सा भटका करता था ,कलियों पीछे ,हर रस्ते में
लेकिन जब से तुम आई हो , मेरे दिल के गुलदस्ते में
तुम्हारे ही पीछे अब तो ,  मै बस  हूँ  मंडराया करता
लव यू, लव यू, का गुंजन ही ,अब मै दिन भर गाया करता
पागल अली ,कली  के चक्कर ,में इतना पाबन्द हो गया
इधर उधर ,होटल में खाना ,अब तो मेरा बंद हो गया
ऐसी स्वाद ,प्यार से पुरसी ,
घर की रोटी दाल आपने 
 मै पहले से कुछ बिगड़ा था ,थोड़ा  दिया बिगाड़  आपने

मुझ पर ज्यादा बोझ ना पड़े ,रखती हो ये ख्याल  हमेशा
इसीलिये ,मेरे बटुवे से ,    खाली कर        देती सब पैसा 
मेरे लिए ,शर्ट  या कपडे ,लेने जब जाती बाज़ार हो
खुद के लिये , सूट या साडी ,ले आती तुम तीन चार हो
पैसा ,मेल हाथ का ,कह तुम,हाथ हमेशा धोती रहती
धीरे धीरे , लगी सूखने, मेरे धन की  ,गंगा बहती
मुझको ए टी एम ,समझ कर,किया है इस्तेमाल आपने 
 मैं पहले से कुछ बिगड़ा था  ,थोड़ा  दिया बिगाड़ आपने

मै पहले ,अच्छा खासा था ,तुमने क्या से क्या कर डाला
ये न करो और वो न करो कह,पूरा मुझे बदल ही  डाला
और अब ढल तुम्हारे सांचे में जब बिलकुल बदल गया मै
तुम्ही शिकायत ,ये करती हो,     पहले जैसा  नहीं रहा मै 
चोरी ,उस पर सीनाजोरी , ये तो  वो ही मिसाल हो गयी
ऐसा रंगा ,रंग में अपने , कि मेरी पहचान    खो गयी
सांप मरे ,लाठी ना टूटे ,
ऐसा  किया  जुगाड़  आपने
मै पहले से कुछ बिगड़ा था ,थोडा दिया बिगाड़ आपने
 
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुरुवार, 1 अगस्त 2024

आलस का मजा 


आपने सोने का मजा तो लिया होगा 

आपने बिछोने का मजा भी लिया होगा 

लेकिन कितनी ही बार ऐसा भी होता है

आदमी सुबह तलक गहरी नींद सोता है

जल्दी से उठने का मन नहीं होता है 

पर हालतों से करना पड़ता समझौता है

एक मन कहता है ,पड़े रहो मत जागो

एक मन कहता है अब निद्रा को त्यागो

कभी आंख खुलती है कभी बंद हो जाती

बदन कसमसाता है और अंगड़ाई आती

कभी फिर करवट ले सोने को मन करता

सोने और जगने में यूं ही द्वंद है चलता 

तन कहता जग जाओ, मन कहता सो जाओ 

फिर से तुम सपनों की दुनिया में खो जाओ 

इसी कशमकश को तो कहते हैं आलस हम

 जगने की मजबूरी ,नींद टूटने का गम

बदन टूटने लगता आती है जम्हाई 

कभी इधर कभी उधर लेते हैं हम अंगड़ाई

नींद का खुमार मुश्किल से छूट पाता है

सच में ऐसे आलस में बड़ा मजा आता है


मदन मोहन बाहेती घोटू

बुधवार, 31 जुलाई 2024

मैं तुमसे क्या मांगा था 


मैंने तुमको देखा, तुमसे क्या मांगा था 

केवल तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपनी प्यारी चंचल हिरणी सी आंखों से

प्यार भरी एक दृष्टि मुझ पर भी बरसा दो

 मेरे जीवन को हरशा दो 

पर तुमने इनकार कर दिया 


तुमने नज़र उठाई , मैने क्या मांगा था

केवल तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपने कोमल से कपोल पर,

 एक चुम्बन अंकित करने दो 

मुझको रोमांचित करने दो 

पर तुमने इनकार कर दिया 


तुम पास आई तो दिल धड़का

 मैंने तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपने रक्तिम और रसीले इन अधरों का,

मुझको भी  रसपान करा दो,

मेरे जीवन को सरसा दो

पर तुमने इनकार कर दिया 


तुम सकुचाई और शरमाई 

मैंने तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपनी कसी और कमनीय देह को

अपने बाहुपाश में मुझे बांध लेने दो 

मुझे स्वर्ग का सुख लेने दो,

पर तुमने इनकार कर लिया 


मैं निराश हो लौट रहा था तुमने टोका 

झोंका आया एक तुम्हारे मधुर स्वरों का

बोली टुकड़ों टुकड़ों की ये मांग अधूरी 

मैं राजी हूं तुम्हे समर्पित होने  पूरी 

प्यार भरे तुम्हारे प्यारे आमंत्रण ने 

मेरे जीवन का सपना साकार कर दिया

तुमने मुझपर बहुत बड़ा उपकार करदिया


मदन मोहन बाहेती घोटू

मंगलवार, 30 जुलाई 2024

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


ये मिट्टी नहीं है हमारी ये मां है 

मिट्टी से अपना बदन ये बना है 

जीवन के पल-पल में छाई है मिट्टी 

हमेशा बहुत काम आई है मिट्टी 

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


गांव की मिट्टी में बीता था बचपन

मिट्टी का घर था और मिट्टी का आंगन मिट्टी के चूल्हे की रोटी सुहानी 

मिट्टी के मटके से पीते थे पानी 


मिट्टी के होते खिलौने थे सुंदर 

वो गाड़ी वो गुड़िया वो भालू वो बंदर 

मिट्टी की पाटी में खड़िया लगाकर 

सीखे थे हमने गिनती और अक्षर 

मिट्टी में खेले ,हुए कपड़े मैले 

बचपन में छुप छुप कर खाई है मिट्टी 

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


मिट्टी की सिगड़ी में सर्दी में दादी 

हमें सेक मक्की के भुट्टे खिलाती 

मिट्टी सुराही का ठंडा वो पानी

 मिट्टी के  कुल्हड़ की चाय सुहानी


 बारिश में मिट्टी में चलना वो थप थप बचाने को पैसे थी मिट्टी की गुल्लक 

हमेशा बहुत काम आई है मिट्टी 

जीवन के हर रंग छाई है मिट्टी 

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


त्यौहार जब भी दिवाली का आता

 मिट्टी के गणपति और लक्ष्मी माता 

सभी लोग मिलकर के करते थे पूजन मिट्टी के दीपक से घर होता रोशन 


अब तो शहर में है कंक्रीट के घर 

मिट्टी की खुशबू नहीं है कहीं पर 

एक कंचन काया बदन यह हमारा 

इसकी भीअंतिम विदाई है मिट्टी 

जीवन के पल-पल मे छाई है मिट्टी 

  ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


मदन मोहन बाहेती घोटू

शनिवार, 20 जुलाई 2024

छुपे रुस्तम 


हम जमीन से जुड़े हुए हैं 

पर पापुलर हैं जन-जन में 

चाहे अमीर ,चाहे गरीब 

हम मौजूद सबके भोजन में 

मैं तो हूं छुपी हुई रुस्तम 

मत समझो मैं मामूली हूं 

बाहर से हरी भरी पत्ती 

पर अंदर लंबी मूली हूं 

छोटे पौधों सी मैं दिखती 

पर अंदर मीठी गाजर हूं 

मैं शलजम प्यारी रूप भरी 

मैं गुण की खान चुकंदर हूं 

माटी के अंदर छुपा हुआ 

मैं आलू सबको भाता हूं 

मैं निकल धरा से प्याज बना 

भोजन का स्वाद बढ़ाता हूं 

मैं गुणकारी सब पर भारी 

भरा मसाला मैं गुण का 

तो मैं हल्दी हूं हितकारी 

मैं हूं तड़का लहसुन का 

मैं तेल भरी, हूं मूंगफली ,

मिट्टी में पलकर हूं निखरी 

मैं जमीकंद , मैं हूं अरबी 

मैं शकरकंद हूं स्वाद भरी 

हम सब धरती की माटी में 

छुप कर रह कर है बड़े हुए 

बाहर से दिखते घास फूस

पर अंदर गुण से भरे हुए 

इसलिए किसी का बाह्य रूप 

को देख ना कीमत आंको तुम 

अगर परखना है गुण को 

तो उसके अंदर झांको तुम 


मदन मोहन बाहेती घोटू

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