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मंगलवार, 17 अगस्त 2021

शांति का अस्त्र  मोबाइल

याद जमाना आता जब हमजो कुछ पल भी थे नामिलते
 बेचैनी सी छा जाती थी ,और चलती थी छुरियां दिल में 
 पर कुछ ऐसा पलटा मौसम, बदल गया है सारा आलम, 
तुम खुश अपने मोबाइल में, मैं खुश अपने मोबाइल में
 
 दूर-दूर हम बैठे रहते ,नहीं किसी से कुछ भी कहते अपने अपने मोबाइल से ,हम दोनों ही चिपके रहते फुर्सत नहीं हमें की देखें एक दूजे को उठाकर नजरें अपनी अपनी ही दुनिया में ,खोए रहते हम बेखबरे आपस में हम बात करें क्या,कोई टॉपिक नजर ना आता 
 मेरा वक्त गुजर जाता है, वक्त तुम्हारा भी कट जाता 
 बात शुरू यदि कोई होती, तू तू मैं मैं बढ़ जाती है 
 मेरे हरेक काम में तुमको ,कोई कमी नजर आती है इसीलिए शांति से जीने का पाया यह रस्ता सुंदर 
व्यस्त रहो और मस्त रहो तुम ,मोबाइल से खेलो दिनभर 
यह तुम्हारी सुन लेता है ,दो आदेश काम करता है 
उंगली से तुम इसे नचाती ,चुप रहता, तुम से डरता है 
मैं ये सब ना कर सकता था इस कारण होता था झगड़ा 
हम तुम बहुत सुखी है जब से, हाथों में मोबाइल पकड़ा 
मोबाइल ना शांति यंत्र यह,टोका टाकी  मिट जाती है 
नोकझोंक सब बंद हो जातीघरमेंशांतिपसरजातीहै  मौन भावना पर हो जाती,रह जाती है दिल की दिल में 
तुम खुश अपने मोबाइल में, मैं कुछ अपने मोबाइल में

मदन मोहन बाहेती घोटू

शनिवार, 14 अगस्त 2021

किस्मत 

जिस दिन और जहां पर भी है होता जब भी जन्म हमारा 
उसी समय तय हो जाता है, पूरा जीवन चक्र हमारा 
उस पल की ही ,ग्रह स्थिति से, जन्मकुंडली अपनी बनती
चाल ग्रहों की ही जीवन के, पल पल का संचालन करती उसी समय अनुसार हमारा, भाग्य लिखा जाता है सारा जन्म स्थल भूगोल बनाता, कद काठी, रंग गोरा काला भाग्य लिखा रहता मुट्ठी में ,रेखाओं में अंकित होता 
 कब तक जीना, कैसे जीना, कब मरना, सब निश्चित होता 
 पूर्व जन्म के संचित कर्मों का जो भी है लेखा-जोखा इस जीवन में हमें भोगना ,पड़ता है फल उन कर्मों का केवल अच्छे कर्म हमारे ,भाग्य बदलने में सक्षम है इसीलिए सत्कर्म करो तुम ,जब तक बाकी तुम में दम है कामयाबी का ये ही नुस्खा,काम करो जी जान लगन से अपना भाग्य स्वयं लिख लोगे, यदि चाहोगे सच्चे मन से

मदन मोहन बाहेती घोटू
किस्मत वाला पति 

आप प्यार करते हैं जिनसे, उनसे ही कुछ कहते हैं 
बच्चों को मां-बाप इसलिये,कभी डांटते रहते हैं 
ताकि चले वे सही राह पर, गलत राह पर ना भटके
 प्यार भरी यह डाट निराली, होती है सबसे हटके 
जिन्हें समझते हो तुम अपना, ओर जिनसे है प्यार तुम्हे कभी कभी फटकार लगाने, का उन पर अधिकार तुम्हें स्कूल में मास्टर जी डांटे, पाठ याद करवाने को 
 डांट बॉस की दफ्तर में है, ड्यूटी सही निभाने को 
 डांट नहीं यह तो जादू का डंडा, बोले सर चढ़कर 
 जीवन में अनुशासन लाता ,हमें बनाता है बेहतर 
 प्यार प्रदर्शित अपना करने का यह ढंग निराला है 
 जिसे डाटती पत्नी वह पति ,सचमुच किस्मत वाला है 

मदन मोहन बाहेती घोटू

 फेंकू

तुम भी फेंकू,मैं भी फेंकू

रूप तुम्हारा, प्यारा सुंदर और नयना हिरनी से चंचल 
एक नज़र जिसपर भी फेंको,कर देती हो उसको घायल
 एक मीठी मुस्कान फेंक दो , बड़ी आस से तुम को देखूं
तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू 

ऊंची ऊंची फेंका करता, मैं तुम्हारे  प्यार का मारा 
कैसे भी मैं तुम्हें पटा लूं और जीत लूं दिल तुम्हारा 
प्रणय निवेदन करूं ,तुम्हारे आगे अपने घुटने टेंकू
तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू

हम दिल की फेंकाफेंकी में,उलझे कुछ ना कर पाए पर 
फेंकू नेता, ऊंचे ऊंचे ,वादे फेंक ,जमे कुर्सी पर 
भाषण और आश्वासन फेंके ताकि वोट उन्हीं को दे दूं
तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू

हम सब बातों के फेंकू पर ,असली फेंकू निकला नीरज 
भाला फेंक,स्वर्ण ले आया और लहराया भारत का ध्वज 
स्वर्ण पदक टोक्यो में जीता ,बड़े गर्व से  उसको देखूं
 तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू

मदन मोहन बाहेती घोटू

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

ऐसा साज मुझे दे दो तुम

 जब भी दिल के तार छिड़े तो ,
 निकले मधुर रागिनी मोहक ,
 जो अंतर तक को छू जाए 
 ऐसा साज  मुझे दे दो तुम 
 बीती खट्टी मीठी यादों,
 के सब पन्ने बिखरे बिखरे 
 उन्हें समेट, सजा फिर से,
 जिल्दसाज ऐसा दे दो तुम  
  
भटक रहे बादल से मन को, घनीभूत कर जो बरसा दे सूखे अपनेपन की खेती ,को नवजीवन दे, सरसा दे शुष्क पड़ी जो मन की सरिता, बह निकले ,उसमें कल कल हो 
है सुनसान पड़ी यह बस्ती, दिल की, इसमें कुछ हलचल हो
 इस दुनिया में बहुत त्रसित हूं
 परेशान हूं, रोग ग्रसित हूं,
  मेरे मुरझाए चेहरे पर 
  खुशियां आज मुझे दे दो तुम 
  जो अंतरतर तो छू जाए ,
  ऐसा साज मुझे दे दो तुम 
  
एक जमाना था जब हम भी, फूलों से महका करते थे उड़ते थे उन्मुक्त गगन में, पंछी से चहका करते थे 
सूरज जैसा प्रखर रूप था , धूप पहुंचती आंगन आंगन सावन सूखे, हरे न भादौ, मतवाला था हर एक मौसम फिर से फूल खिले बासंती 
फिर आए जीवन में मस्ती 
खुशी भरे जीवन जीने का,
 वो अंदाज मुझे दे दो तुम 
 जो अंतरतर को छू जाए ,
 ऐसा साज मुझे दे दो तुम

मदन मोहन बाहेती घोटू

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