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बुधवार, 22 जून 2016

सेंटिमेंटल बुढ्ढे

सेंटिमेंटल बुढ्ढे

ये बुढ्ढे बड़े सेंटिमेंटल होते है
जो बच्चे उन्हें याद तक  करते,
उन्ही की याद में रोते  है
ये बुढ्ढे बड़े सेंटिमेंटल होते है
ये ठीक है उन्होंने बच्चों को पाला पोसा ,
लिखाया ,पढ़ाया
आगे बढ़ाया
तो ऐसा कौनसा  अहसान कर दिया
यह तो उनका कर्तव्य था ,जब उनने जन्म दिया
अपने लगाए हुए पौधे को ,सभी सींचते है ,
यही सोच कर कि ,फूल खिले,फल आएं
सब की  होती है ,अपनी अपनी अपेक्षाएं
तो क्या बच्चे बड़े होने पर ,
श्रवणकुमार बन कर,
पूरी ही करते रहें उनकी अपेक्षाएं
और अपनी जिंदगी ,अपने ढंग से न जी पाएं
उनने अपने ढंग से अपनी जिंदगी जी है ,
और हमे अपने ढंग से ,जिंदगी करनी बसर है
हमारी और उनकी सोच में और जीने के ढंग में ,
पीढ़ी का अंतर है
उनके हिसाब से अपनी जिंदगी क्यों बिताएं
हमें पीज़ा पसंद है तो सादी रोटी क्यों खाएं
युग बदल गया है ,जीवन पद्धति बदल गयी है
हम पुराने ढर्रे पर चलना नहीं चाहते,
हमारी सोच नयी है
और अगर हम उनके हिसाब से  नहीं चलते है,
तो मेंटल होते है
ये बुढ्ढे बड़े सेंटिमेंटल होते है
हर बात में शिक्षा ,हर बात में ज्ञान  
क्या यही होती है बुजुर्गियत की पहचान
हर बात पर  उनकी रोकटोक ,
सबको कर देती है परेशान
आज की मशीनी जिंदगी में ,
किसके पास टाइम है कि हर बार
उन्हें करे नमस्कार
हर बात पर उनकी सलाह मांगे
उनके आगे पीछे भागे
अरे,उनने अपने ढंग से  अपनी जिंदगी बिताली
और अब जब बैठें है खाली
कथा भागवत सुने,रामायण पढ़े
हमारे रास्ते में न अड़े
उनके पास टीवी है ,कार है
पैसे की कमी नहीं है
तो राम के नाम का स्मरण करें ,
उनके लिए ये ही सही है
क्योंकि जिस लोक में जाने की उनकी तैयारी है ,
वहां ये ही काम आएगा
साथ कुछ नहीं जाएगा
और ऐसा भी नहीं कि हम ,
उनके लिए कुछ नहीं करते है
'फादर्स डे 'पर फूल भेजते है ,गिफ्ट देते है
त्योंहारों पर उनके चरण छूते  है
और फंकशनो में 'वीआईपी 'स्थान देते है
हमे मालूम है कि हम उनके लिए कुछ करें न करें ,
वे हमेशा हमे आशीर्वाद बरसाते  रहेंगे
हमारी परेशानी में परेशान नज़र आते  रहेंगे
उनकी कोई भी बददुआ हमे मिल ही नहीं सकती ,
क्योंकि ये बड़े जेंटल होते है
ये बुढ्ढे बड़े  सेंटिमेंटल होते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 28 मई 2016

क्या सोचेंगे लोग

            क्या सोचेंगे लोग

सोच कभी मत मन में लाना,क्या सोचेंगे लोग
नहीं सोच कर ,ये घबराना ,क्या सोचेंगे  लोग
लोगों की तो आदत ही है, टोका  करते  है,
अच्छा बुरा करो कुछ भी ,तुमको टोचेंगे  लोग 
खाना अपने ढंग से खाओ ,जैसे भाता  हो,
वर्ना भूखे रह जाओगे  ,क्या सोचेंगे   लोग
नहीं भरोसा ,कभी किसी का,मतलब के सब यार,
जब भी मौका ,जिसे मिलेगा ,आ नोचेंगे लोग
जनमदिवस की खुशियां हो या मरने का गम हो,
अगर मुफ्त की दावत है तो ,आ पहुंचेंगे  लोग
अपनी ऊँगली ,उसे थमाना ,जो इस काबिल हो,
वर्ना ऊँगली से पोंची तक ,जा पहुंचेंगे  लोग
भला बुरा सब किस्मत के ही बस में  होता है,
हरेक बात में तुम्हारी ,गलती खोजेंगे  लोग

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

मन को खलता है

        मन को खलता है

पास पास बैठें ,पर चुपचुप ,मन को खलता है
हाथ न जिसके कुछ आता ,हाथों को मलता है
यूं तो तन के ,एक कोने में ,धक धक करता है,
पर जब जिद पर आजाता दिल ,बहुत मचलता है
दुबली पतली तीली का मुंह,यूं   ही, काला   है ,
तो माचिस से ,टकराने  पर ,वो क्यों जलता है
नित नित ,झाग झाग हो साबुन ,जीवन  जीता है,
साफ़ दूसरों को  करता ,खुद तिल तिल  गलता है
 जलती हुई आग की ज्वाला ,भी बुझ जाती है,
शीतल शीतल ,जल का जादू,सब पर चलता है
रोज मुसाफिर ,आते जाते ,रात  बिताते  है ,
जग ,होटल के बिस्तर सा है,नहीं बदलता है
अलग मान्यता,अलग अलग ,जगहों पर होती है ,
पूजा जाता कहीं,कहीं पर ,रावण जलता  है
कंकरीले,पथरीले पथ पर ,ठोकर लगती है ,
एक बार जो गिर जाता है ,वही संभलता है
डंडे से यदि जो अनुशासन ,आये ,लाएंगे ,
हमको सोच बदलनी होगी ,सब कुछ चलता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शुक्रवार, 27 मई 2016

आदत बिगाड़ दी हमने

   आदत बिगाड़ दी हमने

उनके चेहरे पे निगाह ,अपनी गाढ  दी हमने
हुस्न के उनकी और  ,रंगत  निखार दी हमने
उनके  गालों के गुलाबों  को  थोड़ा सहलाया ,
उनकी उलझी हुई ,जुल्फें संवार  दी  हमने
उनके बहके थे कदम,डगमगा के गिर न पड़ें ,
थामने  उनको  थी,बाहें  पसार दी हमने
उनकी हाँ में हाँ करी ,और ना में ना बोला ,
हम पे इल्जाम है,आदत बिगाड़ दी  हमने
हुस्न के उनकी जो ,तारीफ़ के दो  कहे ,
लोग कहते है कि  किस्मत सुधार दी हमने
देखते  देखते हर और खबर फ़ैल गयी ,
प्यार की दौड़ में तो बाजी मार ली हमने

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


अच्छा लगता है

             अच्छा लगता है
कभी किसी पर,दिल आना भी ,अच्छा लगता है
सपनो  से ,मन बहलाना भी ,अच्छा  लगता है
वो जब गिरते हुए थामते ,अपनी बाहों में  ,
कभी कभी ठोकर खाना भी ,अच्छा लगता है
एक तरह का खाते  खाते  ,  मन उकताता है ,
कभी कभी  होटल जाना भी ,अच्छा लगता है
जब मन करता ,अपनी मरजी ,जी लें कभी कभी,
बीबी का मइके जाना भी ,अच्छा  लगता  है
अपने हाथों ,यदि वो पोंछें ,अपने आंचल से ,
तो कुछ आंसू ढलकाना भी ,अच्छा लगता है
फ़िल्मी गाने ,सुनते सुनते ,जब मन भरता है,
कभी कभी ,पक्का गाना भी ,अच्छा लगता है    
जब अपनी तारीफें सुन सुन ,वो इतराते है ,
उनका ऐसे इतराना भी ,अच्छा लगता है
दिन भर करके काम ,थके हम जल्दी सोते है,
पत्नी का मीठा ताना भी,अच्छा लगता  है
यही सोच कर ,साथ हूर का ,होगा जन्नत में,
कुछ लोगों को ,मर जाना भी ,अच्छा लगता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'



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