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शनिवार, 24 मई 2014

जिंदगी कैसे कटी

        जिंदगी  कैसे कटी

कटा बचपन चुम्मियाँ पा ,भरते थे किलकारियां,
                      गोदियों में खिलोने की तरह हम सटते रहे
हसीनो के साथ हंस कर,उम्र  सारी काट दी,
                        कभी कोई को  पटाया ,कभी खुद पटते  रहे
आई जिम्मेदारियां तो निभाने के वास्ते ,
                         कमाई के फेर में ,दिन रात हम  खटते  रहे 
कभी बीबी,कभी बच्चे ,कभी भाई या बहन ,
                       हम सभी में,उनकी जरुरत ,मुताबिक़  बंटते रहे 
शुक्ल पक्षी चाँद जैसे ,कभी हम बढ़ते रहे ,
                         कृष्णपक्षी  चाँद जैसे ,कभी हम घटते   रहे
मगर जब आया बुढ़ापा,काट ना इसकी मिली ,
                         और बुढ़ापा काटने को ,खुद ही हम कटते रहे     

घोटू

बुढ़ापा ना कटे

          बुढ़ापा ना कटे

जवानी थी,मारा करते फाख्ता थे तब मियाँ
मजे से दिन रात काटे ,खूब काटी मस्तियाँ
मगर अब आया बुढ़ापा,काटे से कटता  नहीं,
ना इधर के ,ना उधर के,हम फंसे है दरमियाँ

घोटू

संगत का असर

          संगत का असर

तपाओ आग में तो निखरता है रंग सोने का,
                          मगर तेज़ाब में डालो तो पूरा गल ही जाता है
है मीठा पानी नदियों का,वो जब मिलती समंदर से ,
                           तो फिर हो एकदम  खारा ,बदल वो जल ही जाता है  
असर संगत  दिखाती है,जो जिसके संग रहता है,
                            वो उसके रंग में रंग  धीरे धीरे  ,खिल ही जाता  है
अलग परिवारों से पति पत्नी होते ,साथ रहने पर,
                            एक सा सोचने का ढंग उनका  मिल ही जाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शुक्रवार, 23 मई 2014

ब्याह तू करले मेरे लाल

            घोटू  के   पद
       ब्याह तू करले मेरे लाल

ब्याह तू करले मेरे लाल
नयी बहू के पग पड़ करते कितनी बार ,निहाल
होनी थी जो हुई ,मिटा दे ,मन का सभी मलाल
जनता के भरसक सपोर्ट का,रहा यही जो  हाल
मोदी की सरकार चलेगी ,अब दस पंद्रह साल
अपना बैठ ओपोजिशन मे ,बिगड़ जाएगा हाल
चमचे भी सब  ,मुंह फेरेंगे,देख   समय  की चाल
मैं बूढी,बीमार  आजकल, तबियत  है   बदहाल
चाहूँ देखना , हँसता गाता , मै , तेरा   परिवार
युवाशक्ति बन कर उभरेंगे ,तेरे  बाल  गोपाल
अपने अच्छे दिन आएंगे ,तब फिर से एकबार
ब्याह तू,करले मेरे लाल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुरुवार, 22 मई 2014

तीन मुक्तक


         तीन मुक्तक
                 १
घरों में दूसरों के झाँकने की जिनकी  आदत है ,
           फटे खुद के गरेंबां पर,नज़र उनको नहीं आते
  भले ही बाद में खानी पड़े उनको दुल्लती ही,
          मगर कुछ लोग अपनी शरारत से बाज ना आते
बदलती है बड़ी ही मुश्किलों से ,जिसकी जो आदत ,
         जो खाया करते चमचों से,हाथ से खा नहीं पाते
ये  सच है पूंछ कुत्ते की,सदा टेढ़ी ही रहती है ,
        करो कोशिश कितनी ही,हम सीधी कर नहीं पाते
                              २                                              
भले ही  चोर कोई,चोरी करना छोड़ देता है,
                    मगर वो हेराफेरी से ,कभी ना बाज आता है
लोग सब अपने अपने ही ,तरीके से जिया करते,
                    जिन्हे लुंगी की आदत है ,पजामा ना सुहाता है
भले ही कितना  सहलाओ ,डंक ही मारेगा बिच्छू ,
                     सांप को दूध देने से ,जहर उसका न जाता है
शराफत की कोई उम्मीद करना ,बद्तमीजो से ,
                     हमारा ये तजुर्बा है,हमेशा व्यर्थ  जाता है
                                ३ 
  समंदर के किनारे की ,रेत पर चाहे कुछ लिख़ दो,
                   लहर जब आएगी अगली ,सभी कुछ मिट ही जायेगा
अगर तुमने उगाये केक्टस के पौधे गमले मे,
                     तो निश्चित है कोई ना कोई काँटा ,चुभ ही जाएगा 
है काला  काग होता है ,और काली है कोकिल भी ,
                    मगर जब बोलेंगे ,अंतर ,तुम्हे तब दिख ही जाएगा
भले सोना हो या पीतल चमकते दोनों,पीले है ,
                      कसौटी पर घिसोगे तो,भरम सब मिट ही जाएगा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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