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बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

मैं अनुशासित

        मैं अनुशासित

           मैं अनुशासित ,पत्नी शासित
          पत्नी पीड़ित ,क्यों परिभाषित
पत्नी प्रेम,पल्लवित पोषित
पत्नी शोषित ,क्यों उदघोषित 
           तन ,मन और जीवन आनंदित
           मैं अनुशासित,पत्नी शासित
नवग्रह रहते सभी शांत है
गृह की गृहणी अगर शांत है
            यह आग्रह है,गृह शांति  हित
             मैं अनुशासित ,पत्नी  शासित
खुश है अगर आपकी बेगम
घर में आता नहीं कोई गम
                सदा रहेगी ,खुशियां संचित
                मैं अनुशासित ,पत्नी शासित
मौज मनाओगे जीवन भर
तुम पत्नी के चमचे बन कर
             होठों से लग,होंगे हर्षित
              मैं अनुशासित  ,पत्नी शासित
उनकी ना में ना ,हाँ में हाँ
मिले जहाँ की सारी खुशियां
                सुन्दर भोजन,प्रेम प्रदर्शित
                 मैं   अनुशासित ,पत्नी शासित
है सच्चा सामिप्य ,समर्पण
सुख पाओगे ,हर पल,हर क्षण
                 पत्नी को कर जीवन अर्पित
                 मै अनुशासित  ,पत्नी शासित
भले दहाडो ,तुम दफ्तर में
पर भीगी बिल्ली बन घर में
                रहने में ही ,है पति का  हित
                 मै अनुशासित,पत्नी शासित
यदि पत्नी को दोगे  आदर
खुशियों से भर जाएगा घर
               प्रेम सुरभिं से ,सदा सुगन्धित
               मै अनुशासित ,पत्नी शासित

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

ऊँट कौन करवट बैठेगा ?

           ऊँट कौन करवट बैठेगा ?

 

सब नेताओं के सपनो में ,पी एम कुर्सी घूम रही है

ऊँट कौन करवट बैठेगा ,कोई को मालूम नहीं   है

मात सोनिया सपने देखें,ताजपोशी राहुल की होगी

ममता का मन भी मचले है,है पंवार ,पॉवर के लोभी

जयललिता भी लालायित है और नितीश भी नज़र गढ़ाये

साईकिल पर बैठ मुलायम ,लालकिले के सपन सजाये

फूट रहे मोदी मन मोदक ,निकल मांद  से करते गर्जन

कभी भाग्य से छींका टूटे ,अडवाणी सोचे मन ही मन

माया दलित कार्ड दिखला कर ,चाह  रही आये पॉवर में

लोग नाम ले रहे आप का ,पर अरविन्द ढके मफलर में

हम भी,हम भी,हम भी ,हम भी,कह कर के सब उछल रहे है 

एक बार फिर सत्ता पा लें ,देवगोड़ा जी ,मचल रहे है

एक मोरचा  बी जे पी का,एक मोरचा  कांग्रेस   का

खुला तीसरा, अगर मोरचा,तो क्या होगा ,भला देश का

अभी इलेक्शन में टाइम पर,मन में सत्ता झूम रही है

ऊँट कौन करवट बैठेगा ,कोई को मालूम नहीं   है

 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

माँ और मासी

       माँ और मासी

मेरी माँ और मेरी मासी
एक की उम्र बानवे,एक की अठ्ठासी
दोनों दूर दूर ,अलग और अकेली
एक दुसरे को फोन करती है डेली
उनकी बातचीत कुछ होती है ऐसी
और तुम कैसी हो और मैं कैसी
तबियत कैसी है ,ठीक है ना हालचाल
तेरे बहू बेटे ,रखते है ना ख्याल
मोह माया के जाल में फंसी  है
सबकी चिंताएं ,मन में बसी है  
इधर उधर की बातें करने के बाद
रोज होता है उनका संवाद
क्या करें बहन,मन नहीं लगता है
बड़ी ही मुश्किल से वक़्त कटता है
दिन भर क्या करें ,बैठे ठाले
इतनी उम्र हो गयी है,अब तो राम उठाले
क्या करें,मौत ही नहीं आती,एक दिन है मरना
पल भर का भरोसा नहीं ,पर कहती है,
अच्छा कल बात करना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

वेलेंटाइन डे और वेलेट

      वेलेंटाइन डे और वेलेट

पीज़ा के संग पेप्सी ,प्रियतमा संग प्यार
ऐसे हमने मनाया ,प्रीत भरा   त्योंहार
प्रीत भरा त्योंहार ,सीट कोने की लेकर
करी शरारत खूब ,प्रेम से देखी  पिक्चर
देकर लाल गुलाब,चुरा  होठों की लाली
वेलेंटाइन डे पर वेलेट हो गया  खाली

घोटू

बसन्ती ऋतू आ गयी

       बसन्ती ऋतू आ गयी

सर्दियों के सितम से हालत ये थे,
                 तन बदन था खुश्क,गायब थी लुनाई
ढके रहना ,लबादों से लदे  दिन भर ,
                 रात पड़ते दुबक जाना ,ले   रजाई
शाल ,कार्डिगन,इनर और जाने क्या क्या,
                  हुस्न की दौलत छिपी थी,लगा ताले
बसन्ती ऋतू आयी ,ताले खुल गए सब ,
                   खुली गंगा बह रही है,हम नहा ले
आम्र तरु के बौर ,फल बनने लगे है,
                   गेंहूं की बाली में दाने भर रहे है
लहलहाती स्वर्णवर्णी सरस सरसों ,
                    रसिक भँवरे,मधुर गुंजन कर रहे है
 पल्ल्वित नव पल्लवों से तरु तरुण है ,
                     कूक कोयल की बहुत मन को लुभाती
तन सिहरता ,मन मचलता ,चूमती जब,
                      बसन्ती  ,मादक बयारें ,मदमदाती
इस तरह अंगड़ाइयां ऋतू ले रही है ,
                       हमें भी अंगड़ाई  आने लग गयी है
फाग ने आ ,आग ऐसी लगा दी ,
                        पिय मिलन की आस मन में जग गयी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'                     

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