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सोमवार, 22 मार्च 2021

आज के हालात -पांच चौके

कुछ तो'कोविड' ने बना दी दूरियां
और कुछ है उम्र की मजबूरियां
वो पुराना प्यार है खो सा गया ,
ऐसा क्या हो गया अपने दरमियां

बेवजह ही रोज होता क्लेश है
प्रेम का बाकी न वो  उन्मेष है
छुवन में होती नहीं वो सुरसुरी ,
बदन में गर्मी बची ना  शेष है

रूठने और मनाने के चोंचले
भूल जाओ ,अब हम बूढ़े हो चले
सहे सब संतोष से ,जो हो रहा ,
ना अपेक्षाएं रखें ना दिल जले

अब तो जैसी कट रही है,काट लो
अपने सुख दुःख ,तुम परस्पर बाँट लो
प्यार अब संभाल बन कर रह गया ,
समझौते से दूरियों को पाट  लो

क्या पता है कब बिछड़ अब जायें हम
झेलना किसको  ,अकेलेपन का  गम
स्वर्ग में मिल जायें जो इत्तेफ़ाक़ से ,
हमको तुम पहचान लेना कम से कम

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
आज मैं असिया गया हूँ

बीस वर्षों पूर्व मेरी ,उमर  थी जब साठ  ऊपर
कर दिया मुझको गया था ,नौकरी से भी रिटायर
ये कहा हालत तुम्हारी ,ना रही अब काम लायक
बुढ़ापा आने लगा है और अब तुम गए हो थक
आदमी थे कभी बढ़िया ,हो मगर घटिया गए हो
ना रही बुद्धि नियंत्रित और तुम सठिया गए हो
किन्तु उसके बाद भी तेंतीस प्रतिशत वर्ष काटे
बीस वर्षों रहा मिलजुल,और सुख दुःख,सभी बांटे
बुढ़ापे की बेबसी से ,किन्तु बेबसिया गया हूँ
साठ  में सठिया गया था ,अस्सी में असिया गया हूँ

जिंदगी के इस सफर में ,सैंकड़ों तूफ़ान देखे
कईअपनों ने भुलाया ,मीत कुछ अनजान देखे
गिरा ,सम्भला ,चोंट खाई ,करी मेहनत ,कुछ बना मैं
किसी को सीढ़ी बनाया ,किसी की सीढ़ी बना मैं
सोचता हूँ कभी मैंने ,क्या गमाया ,क्या कमाया
प्यार जी भर कर लुटाया ,तभी सबका प्यार पाया
किसी से कुछ नहीं माँगा ,बन सका उतना दिया हूँ
अब तलक जैसे जिया हूँ ,शान से लेकिन जिया हूँ
देख अपने हाल खस्ता ,मगर अब खिसिया गया हूँ
साठ में सठिया गया था ,अस्सी में असिया गया हूँ

खेल जो भी नियति ने ,लिखे थे ,सब खेल खेले
कभी पहनी पुष्पमाला ,और पत्थर कभी झेले
मुश्किलों के पहाड़ आये ,बीच ,पर ना डगमगाया
स्वाभिमानी शान से ,मस्तक हमेशा ही उठाया
भाग्य ने छीना अगर कुछ ,तो बहुत कुछ दिया भी है
दोस्तों ,शुभचिंतकों ने ,प्यार इतना किया भी है
जिंदगी कट गयी इतनी ,बिना चिंता ,ये क्या कम है
जी रहा अब भी ख़ुशी से ,नहीं मन में कोई ग़म है
चाहने वालों का अब भी ,हो मैं मन बसिया गया हूँ
साठ  में सठिया गया था ,अस्सी में असिया गया हूँ

भूलने की बिमारी पर ,प्यार अपनों का न भूला
सीख ली आलोचकों से ,प्रशंसा  पा  नहीं फूला
लाख कोशिश करी ,मन से पर न छूटी मोह माया
भेद अपने पराये का ,भूल कर ना भूल पाया
नहीं कोई को दिखाया  ,घाव जो दिल पर लगा है
कितनो ने ही ,मीठी मीठी ,बातें कर मुझको ठगा है
कोई ने यदि आस मुझसे ,कभी की ,मैंने न तोड़ी
हँसते गाते गुजर जाए ,बची अब जो उम्र थोड़ी
चाहूँ तोडूं ,सभी बंधन ,जिनमे मैं फँसिया गया हो
साठ  में सठिया गया था ,अस्सी में असिया गया हूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '  
चलो एक बार फिर से

हमारी और तुम्हारी अब ,निभे ना संग रह रह कर
परेशां हो गए हम रोज के झगड़ों को सह सह कर
बन गयी जिंदगी जिल्लत है ,इससे होगा ये बेहतर
अहम की तुष्टि करने ,यूं नहीं टकराये हम दोनों
चलो एक बार फिरसे अजनबी बन जाए हम दोनों

भुलादें ये कभी बेइंतहां  हम प्यार करते थे      
दीवाने और पागल थे,एक दूजे पे मरते थे
सात जन्मो के साथी हम ,हमेशा दम ये भरते थे
पुराने कसमें और वादे ,सभी बिसरायें हम दोनों
चलो एक बार फिर से अजनबी ,बन जाएँ हम दोनों

जमाना था ,हमारी और तुम्हारी ,एक थी चाहें
नहीं रखता था कोई भी ,किसी से कुछ अपेक्षाएं
मगर लगने लगा ऐसा ,जुदा  अपनी है अब राहें
उलझ रिश्ते गए उनको , मिलें , सुलझायें हम दोनों
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों

चलोअनजान बन कर फिर लड़ाये ,प्यार से नज़रें
सिलसिला प्यार का चालू ,नया करदें हो बेसबरे
दिवाना बन उठाऊं मैं ,तुम्हारे नाज़ और नखरे
पुराने प्यार में फिर ताज़गी भर लाएं हम दोनों
चलो एक बार फिरसे अजनबी बन जाएँ हम दोनों

प्यार की भड़के चिंगारी ,जगे दिल में ,मोहब्बत फिर
उजड़ते प्यार के गुलशन में आये प्यारी रंगत फ
महक जाए पुरानी  जिंदगी ,बन जाए जन्नत फिर
जवानी की हसीं यादें ,फिर से दोहराएं हम दोनों
चलो एक बार फिर से अजनबी ,बन जाएँ हम दोनों

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
एक लड़की सांवली सी

भोलीभाली और भली सी
एक सांचे में ढली सी
मुझे केरल में मिली थी ,
एक लड़की सांवली सी

उम्र के तूफ़ान में  थी
जवानी परवान पर थी
रूप था निशदिन निखरता
आ रही तन में सुगढ़ता
देख निज यौवन उभरता ,
हो रही कुछ बावली सी
एक लड़की सांवली सी

सोचती कुछ ,मुस्कराती
बिना मतलब खिलखिलाती
गाल पर गुलमोहर खिलते
पंखुड़ियों से होठ हिलते
मन तरंगित ,तन तरंगित ,
अधखिली कोई कली सी
एक लड़की सांवली सी

नयन सुन्दर ,चपल,चंचल
बदन पर टिकता न आँचल
अमलताशी हाथ पीले
हाव भाव  सब नशीले
प्यास तन मन की बुझाने ,
हो रही उतावली सी
एक लड़की सांवली सी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

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