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रविवार, 5 जुलाई 2020

मौसम और स्वाद

सुबह सुबह क्यों तलब चाय पीने की मन में उठती है ,
ब्रेकफास्ट के समय जलेबी पोहे हमे सुहाते है
खाने बाद याद पापड़ की ,क्यों हमको आती अक्सर ,
सर्दी में ही गजक रेवड़ी ,मुंह का स्वाद बढ़ाते है
गर्मी के पड़ते ही कुल्फी ,आइसक्रीम लुभाते मन ,
बारिश पड़ते गरम पकोड़े ,याद हमें क्यों आते है
सर्दी में गाजर हलवे का स्वाद सुहाता है सबको ,
और सावन के महीने में ही ,घेवर मन को भाते है

बूंदी लड्डू ,बेसन चक्की ,सदाबहार मिठाई है ,
श्राद्ध पक्ष में सबसे ज्यादा खीर बनाई जाती है
सदाबहार समोसे होते ,गर्म गर्म और मनभावन,
खुशबू आलू की टिक्की की ,मुंह में पानी लाती है
दही बड़े और चाट पापड़ी ,हर मौसम में चलते है ,
पानी पूरी हमेशा ही सबके मन को ललचाती  है
ये जिव्हा है रस की लोभी ,बड़ी स्वाद की मारी है ,
मौसम के संग संग उसकी भी ,चाह बदलती जाती है

मदन मोहन बाहेती ;घोटू ' 

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

छेड़छाड़  

छेड़ने में लड़कियों को ,मज़ा जो  तुमको  है  आये
अगर तुम्हे वो डाट लगाए ,रहो ढीठ से तुम मुस्काये
इस चक्कर में अगर कभी जो ,तुमको पड़े मार भी खानी ,
तो उनके पापा के बदले ,उनके हाथों की ही खायें

घोटू 
शंशोपज

एक तरफ तुम ये कहते हो ,
प्रगति के पथ पर बढ़ना है
इसीलिये कंधे से कंधा
मिला काम हमको करना है
और दूसरी और कह रहे ,
हमें करोना से लड़ना है
इसके लिये हमें आपस में ,
दो गज की दूरी रखना है
शंशोपज में है इनमे से,
बात कौनसी को हम माने
दूरी रखें ,मिले ना कंधे ,
देश प्रेम के हम दीवाने

घोटू 
कभी तुम भी ----

                           कभी तुम भी छरहरी थी    
स्वर्ग से जैसे उतर कर ,आई हो ,ऐसी परी थी
                           कभी तुम भी छरहरी थी
बड़ा ही कमनीय ,कोमल और कंचन सा बदन था
मदमदाता ,मुस्कराता और महकता मृदुल मन था
बोलती थी मधुर स्वर में ,जैसे कोकिल गा  रही हो
चलती लगता ,सरसों की फूली फ़सल लहरा रही हो
हंसती थी तो फूलों का जैसे  कि  झरना झर रहा हो
गोरा आनन ,चाँद नभ में ,ज्यों किलोलें कर रहा हो
थे कटीले नयन ,हिरणी की तरह ,मन को लुभाते
बादलों की तरह कुंतल ,हवा में थे ,लहलहाते
थी लबालब प्यार से तुम ,भावनाओं से भरी थी
                            कभी तुम भी छरहरी थी
वक़्त के संग,आगया यदि थोड़ा सा बदलाव तुममे
ना रही ,पहले सी चंचल ,आ गया  ठहराव  तुममे
प्यार के आहार से यदि ,गयी कुछ काया विकस है
तोअसर ये है उमर का,बाकी तो सब ,जस का तस है
अभी भी तिरछी नज़र से जब ,देखती ,मन डोलता  है
अभी भी मन का पपीहा ,पीयू  पीयू  बोलता  है  
अभी भी छुवन तुम्हारी ,मन में है सिहरन जगाती
तब कली थी,फूल बनकर,और भी ज्यादा सुहाती
हो मधुर मिष्ठान सी अब ,पहले थोड़ी चरपरी थी
                               कभी तुम भी छरहरी थी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
पता नहीं कल ---

मन यदि कुछ करने को करता ,तो करने दो ,
पता न कल ,कुछ करने के हालात  ना रहे
आज कामनाएं जाग्रत है ,मचल रही है ,
पता नहीं कल ,ऐसी कोई  बात ना रहे

बीत गयी सो बीत गयी ,ना लौट सकेगी ,
और कल क्या क्या हो सकता है ,नहीं खबर है
सिर्फ आज है ,जिसमे तुम अपने मन माफिक ,
कुछ भी कर सकते हो ,तुममे चाह अगर है
आज वक़्त है ,उसका पूरा लाभ उठालो ,
पता नहीं कल ,समय तुम्हारे साथ ना रहे
मन यदि  कुछ करने को करत्ता तो करने दो ,
पता न कल ,कुछ करने के हालत ना रहे

यूं तो कहते सारा खेल ,लकीरों का है ,
लिखा  भाग्य  में जो होना ,वो ही है होना
अपने मन मरजी का यदि तुम कुछ कर लोगे ,
नहीं बाद में तुम्हे पड़े पछता कर रोना
मन में आज बसे  हैं सपने कुछ करने के ,
पता न कल ये जोश और जज्बात ना रहे
मन यदि कुछ करने को करता ,तो करने दो ,
पता न कल कुछ करने के हालात ना रहे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

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