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रविवार, 13 जुलाई 2014

अपनी अपनी दास्ताँ

         अपनी अपनी  दास्ताँ

हिन्दू कोई,कोई मुस्लिम
बौद्ध कोई है ,कोई क्रिस्चन
सिख है कोई,बहाई कोई ,
              सबकी अलग आस्था है
कोई इडली ,कोई डोसा
कोई जलेबी और समोसा
पूरी कोई परांठा  खाता ,
           सबका अलग नाश्ता है
कोई भूखा करता है व्रत
और खोलता कोई सदाव्रत
मोक्ष को  पाने  सभी का ,
         अपना अलग रास्ता है
दुखी निसंतान इन्सां
कोई बच्चों से परेशां
सबके है अपने अपने दुःख,
           सबकी अलग दास्ताँ है

घोटू

याद तुम्हारी

               याद तुम्हारी

ये चंदा और ये तारे ,और उसपे रात ये कातिल
ये सबके सब ही काफी थे ,जलाने को हमारा दिल
बड़ी खामोशी पसरी  थी दर्द देती थी तन्हाई
और उसपे याद तुम्हारी ,सितम ढाने चली आई
हवा के झोकें भी आ खटखटाते द्वार, दे दस्तक
मुझे लगता है तुम आयी ,मगर नाहक ही होता शक
बड़ा दिल को दुखाता है ,सताता तुम्हारा गम है
दो घड़ी चैन से भी सो नहीं सकता ,ये आलम है
लगाईं आँख क्या तुमसे ,आँख ही लग नहीं पाती
लगी है आग कुछ ऐसी ,बुझाए बुझ नहीं पाती
कभी दिल के समंदर में,है उठते ज्वार और भाटे
कभी है काटने को दौड़ते ,सुनसान सन्नाटे
न जाने कब सुबह होगी,जिंदगी जगमगाएगी
न जाने लौट फिर किस दिन ,खुशी घर मेरे आएगी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

नाम की कमाई

               नाम की कमाई

आदमी आम होता ख़ास है , जब उसके जीवन में,
ख़ास कुछ ऐसा हो जाता ,नहीं जो आम  होता है
ये इस पर है कि किसके संग,हुआ है कौनसा किस्सा ,
कोई का नाम होता है ,कोई बदनाम होता  है
अगर मिल जाते लैला और मजनू ,हीर और रांझा,
तो क्या उनकी महोब्बत के ,यूं अफ़साने लिखे जाते
बसा लेते वो अपना घर ,आठ दस बच्चे हो जाते ,
गृहस्थी को चलाने में ,वो भी मशगूल हो जाते
मगर उनकी जुदाई ने ,बनाया ख़ास है उनको,
नहीं तो वो भी  हम तुमसे ,आदमी आम ही रहते
नहीं कुर्बान होते जो ,इश्क़  में एक दूजे  के ,
हमारी और तुम्हारी ही तरह अनजान ही रहते
नहीं तो लोग कितने ही ,कमाते और खाते है,
है आते और चले जाते,कोई ना याद भी करता
कोई जो देता  कुर्बानी,या फिर कुछ ख़ास करता है,
ज़माना उसके चर्चे उसके ,जाने बाद भी करता

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

 

बरसात आई

         बरसात आई

आज बरसात आई है
मुद्द्तों बाद आयी है
मचलने लग गया है मन,
लिए जज्बात आयी है
हुआ मौसम बड़ा बेहतर
भीग कर जाएँ हम हो तर
 साथ बूंदों के हम नाचें,
मज़ा मौसम का लें जी भर
देख कर तेरा भीगा तन ,
रहूँ ना मैं भी आपे में
मज़ा मुझको जवानी का,
मिले फिर से बुढ़ापे में

घोटू

अगर- मगर

        अगर- मगर

जो तुम गर्मी की लू होती ,मैं कच्चा आम,पक गिरता,
         अगर होती जो तुम बारिश,भीगता तुममे रहता मैं  
अगर तुम होती जो सर्दी ,रजाई में दबा लेता ,
          अगर  बासंती ऋतू होती,तो फूलों सा महकता   मैं
अगर तुम आग होती तो ,मैं भुट्टे सा सिका करता,
            अगर होती हवा जो तुम,तुम्हारे साथ  बहता  मैं
अगर होती जो तुम पानी,तो तुममे डूब मैं जाता,
           तुम्हारा साथ पाने को ,सितम कितने ही सहता मैं
मगर तुम बन गयी बीबी ,और शौहर मैं बेचारा,
            तुम्हारे मूड के संग संग ,बदलते रहते है मौसम
तुम्हारी उँगलियों के इशारों पर ,नाचता मैं रहता ,
            बनी हो जब से तुम हमदम,निकाला तुमने मेरा दम

  मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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