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मंगलवार, 10 जून 2014

अलग अलग धर्मस्थल

       अलग अलग  धर्मस्थल

चर्च में प्रार्थना करने ,ईसाई जाते सारे है
इबादत यीशु  की करते,बिना जूते उतारे  है
और मस्जिद में भी जब लोग जा नमाज पढ़ते है
उतारा करते है चप्पल पर, अपने पास रखते है
और मंदिर में दर्शन करने जाते  लोग  रोजाना
मगर  जूते उतारे बिन  ,मना है मंदिर में जाना
प्रार्थना प्रभु की करते ,ध्यान चप्पल में रहता है
चुरा ना कोई ले चप्पल ,यही डर मन में रहता है
नहीं होता कोई बुत मस्जिदों में,खुदा ,अल्ला का
मगर चर्चों में होता बुत यीशु और मरियम माँ का
और मंदिर में कितने देवता की मूर्तियां होती
रोज श्रृंगार होता ,दो समय है  आरती    होती
अन्य पूजागृहों में सिर्फ आशीर्वाद मिलता है
मगर मंदिर में आशीर्वाद संग परशाद मिलता है  
चर्च में मौन सब चुपचाप रहते ,शांति रहती है
कहीं प्रवचन ,कहीं उपदेश की बरसात बहती है
मज़ा पर मंदिरों में कीर्तन का,नाच गाने का
यहीं पर मिलता है मौका,नयी चप्पल चुराने का              

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 7 जून 2014

गयी हो जब से तुम मइके

             गयी हो जब से तुम मइके

गयी हो जब से तुम मइके,है मेरा मन नहीं लगता
विरह की वेदना सह के ,है मेरा मन नहीं लगता
नहीं तो भूख लगती है,न आता स्वाद खाने में
बना रख्खी है क्या हालत ,तुम्हारे इस दीवाने ने
कोई भी आके ये देखे कि मेरा मन नहीं लगता
गयी हो जबसे तुम मइके ,है मेरा मन नहीं लगता
करवटें बदला करता हूँ ,न ढंग से नींद आती है
तुम्हारी याद आ आ के,मुझे हरदम सताती है
तड़फता हूँ मैं रह रह के,है मेरा मन नहीं लगता
गयी जब से तुम मइके है मेरा मन नहीं लगता
तुम्हारा रूठना और रूठ के मनना ,लिपट जाना
झुक लेना वो नज़रें का,और वो'हाँ'भरी ना ना
याद आते वो क्षण बहके ,है मेरा मन नहीं लगता
गयी हो जबसे तुम मइके ,है मेरा मन नहीं लगता
जो तुम थी ,जिंदगानी थी ,सभी सूना है बिन तेरे
आजकल मैं अकेला हूँ,मुझे  तन्हाई  है   घेरे
कभी दिन रात थे महके,है मेरा मन नहीं लगता
गयी हो जब से तुम मइके ,है मेरा मन नहीं लगता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कमी हम मे रही होगी

        कमी हम मे रही होगी

उन्होंने छोड़ हमको थामा दामन ,और कोई का,
                 कमी  हम में ही निश्चित ही,कुछ न कुछ तो रही होगी
हमारे ही मुकद्दर में ,नहीं थी दोस्ती उनकी ,
                  गलत हम ही रहे होंगे ,और वो ही सही होगी
नहीं किस्मत में ये होगा ,जुल्फ सहलाएं हम उनकी,
                    और उनके रस भरे प्यारे ,लबों  का ले सके चुम्बन
बांह में बाँध कर के फूल जैसे बदन को कोमल,
                     महकते जिस्म की उनके,चुरा लें सारी खुशबू हम
नहीं तक़दीर में लिख्खी थी इतने हुस्न की दौलत ,      
                     जिसे संभाल कर के रख सकें ,अपने खजाने में
करे थे यत्न कितने ही कि उनको कर सकें हासिल,
                      मिली नाकामयाबी हमको ,उनका साथ पाने में
या फिर उनके मुकद्दर में ,कोई बेहतर लिखा होगा ,
                      करी कोशिश हमने पर,कशिश हम में,नहीं होगी
उन्होंने छोड़ हम को ,थामा दामन और कोई का,
                     कमी हम में ही निश्चित ही,कुछ न कुछ तो रही होगी
वो उनका मुस्कराना ,वो अदाएं चाल वो उनकी ,
                     और वो संगेमरमर का,तराशा सा बदन उनका
गुलाबी गाल की रंगत ,दहकते होंठ प्यारे से ,
                       कमल से फूल सा नाजुक ,वो गदराया सा तन उनका
तमन्ना थी कि उनका हाथ लेकर हाथ में अपने ,
                          काट दें साथ उनके सफर सारा जिंदगानी का
मगर अरमान सारे रह गए बस दिलके दिल में ही ,
                          यही अंजाम होना था, हमारी  इस  कहानी   का 
खुदा ही जानता है ,बिछड़ कर अब कब मिलेंगे हम,
                           न जाने हम कहाँ होंगे,न जाने वो कहीं होगी
उन्होंने छोड़ हमको ,थामा  दामन और कोई का,
                          कमी हम में ही ,निश्चित ही,कुछ न कुछ तो रही होगी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'     

शुक्रवार, 6 जून 2014

एक नारी-दुखिया बेचारी

           एक नारी-दुखिया  बेचारी

एक पूरब की नारी और एक दक्षिण की नारी ने,
                एक इटली की नारी की ,बड़ी हालत बिगाड़ी है
एक चौथी भी है जो राज,राजस्थान में करती ,
                 हरा कर इटली वाली को,छीन सब सीट डाली है
वो जब सत्ता में थी पत्ता भी ना हिलता इजाजत बिन,
                  उसीके लोग देते ,उसके शहजादे को गाली  है
जो टस से मस न   होती थी,हिला डाला है लोटस ने,
                  डुबो दी नाव मोदी ने ,बड़ी दुखिया  बिचारी है

घोटू 

गुरुवार, 5 जून 2014

जिंदगी का सफर

        जिंदगी का सफर

टर्मिनस से टर्मिनस तक ,बिछी हुई,लोहे की रेलें
जिन पर चलती रेल गाड़ियां ,कोई पीछे, कोई पहले
कोई तेज और द्रुतगामी,कोई धीमे और रुक रुक कर
स्टेशन से स्टेशन तक ,बस काटा करती है चक्कर
कोई भीड़ भरी पैसेंजर ,तो कोई ऐ. सी. होती है
कोई मालगाड़ियों जैसी ,जो केवल बोझा  ढोती है  
यात्री चढ़ते और उतरते ,हर गाडी में बहुत भीड़ है
हर यात्री की अलग ख़ुशी है,हर यात्री की अलग पीड है
कोई लूटता ,मज़े सफर के,कोई रहता परेशान है
कोई हेंड बेग लटकाये ,कोई के संग ताम झाम  है
अपनी यात्रा कैसे काटें,यह सब तुम पर ही निर्भर है
प्लानिंग सही,रिज़र्वेशन हो ,तो होता आसान सफर है
इन्ही रेल की यात्रा जैसा,होता है अपना जीवन पथ
एक जन्म का टर्मिनस है ,एक मृत्यु का है टर्मिनस
कोई गाड़ी कैसी भी हो,लेकिन सबका पथ है निश्चित
दुर्घटना का ग्रास बनेगी ,अगर हुई जो पथ से विचलित
और हम बैठे हुए ट्रेन में,जीवन का कर रहे सफर है 
रेल गाड़ियां,आती ,जाती,हम तो केवल ,पैसेंजर है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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