एक सन्देश-

यह ब्लॉग समर्पित है साहित्य की अनुपम विधा "पद्य" को |
पद्य रस की रचनाओ का इस ब्लॉग में स्वागत है | साथ ही इस ब्लॉग में दुसरे रचनाकारों के ब्लॉग से भी रचनाएँ उनकी अनुमति से लेकर यहाँ प्रकाशित की जाएँगी |

सदस्यता को इच्छुक मित्र यहाँ संपर्क करें या फिर इस ब्लॉग में प्रकाशित करवाने हेतु मेल करें:-
kavyasansaar@gmail.com
pradip_kumar110@yahoo.com

इस ब्लॉग से जुड़े

बुधवार, 21 अगस्त 2013

फिफ्टी -फिफ्टी

            फिफ्टी -फिफ्टी

हमारे हुस्न की तारीफ़ करते ,फिर सताते है
और फिर कहते है जालिम हमें ,तोहमत लगाते है
बना रख्खा है फिफ्टी फिफ्टी बिस्किट की तरह हमको,
कभी नामकीन कहते है ,कभी मीठा  बताते    है

घोटू 

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

प्रार्थना


              प्रार्थना
हे प्रभु!मुझे रहने के लिए ,
बस इतनी जगह चाहिए ,
कि हाथ पैर  फैला सकूं
मुझे सोने के लिए,
बस इतनी जगह चाहिए ,
कि करवट बदल सकूं
इतनी खुली जगह हो ,
कि जब तक जियूं ,
खुल कर सांस ले सकूं  
इतनी कमाई हो ,
कि दो वक़्त दाल रोटी खा सकूं
इतना समय दो ,
कि तेरे गुण  गा सकूं
मेरी आपसे बस इतनी सी ही विनती है
क्योंकि मुझे मालूम है ,
राख की एक ढेरी  बन,
गंगा की लहरों में विलीन होना ही,
मेरी नियती है

मदन मोहन बहेती'घोटू' 

बातें

         बातें

तुमने इधर की बात की
तुमने उधर की बात की
कुछ अपने घर की बात की
कुछ उनके घर की बात की
लेकर मोहल्ले गली से ,
सारे शहर की बात की
कुछ आसमां की बात की ,
कुछ समंदर  की बात की
कुछ हसीनो के लुभाने
वाले हुनर की बात की
कुछ रहगुजर की बात की
कुछ हमसफ़र की बात की
गम को छुपाने तुमने सारी ,
दुनिया भर की बात की
मगर  तुमने कभी  ना ,
दुखते जिगर की बात की

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जगाया न होता

           जगाया न होता

हमें नींद से जो जगाया न होता
हिला  इस तरह जो उठाया न होता
बड़ी मुद्दतों में जो आया था हमको ,
वो सपना हमारा ,भगाया न  होता
और फिर ये कह के,कि डर लग रहा है,
हमें अपने सीने लगाया न होता
दिखा करके अपनी मोहब्बत के जलवे ,
मेरी हसरतों को ,जगाया न होता
लगा कर अगन ना यूं अपने बदन से ,
लबों से वो अमृत ,पिलाया न होता
तो फिर हमसुहबत हुए हम न होते ,
मज़ा वो मोहब्बत का आया न होता
बड़ी देर तक मै  ,यूं सोया न रहता ,
थकावट में एक दिन ,यूं जाया न होता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

सावन की बूँदा बांदी में

  सावन की बूँदा  बांदी  में

इस सावन की ,मन भावन की,प्यारी सी बूंदाबांदी में
मेह न मदिरा बरस रही है ,प्यारे मौसम बरसाती में बी
जल की बूँदें ,कुंतल से बह, गाल गुलाबी पर  ढलकेगी
कोमल ,मतवाले कपोल पर ,मादक सी मदिरा छलकेगी
प्यासे होठों से पी मधुरस ,अपनी प्यास बुझायेंगे  हम
भीग फुहारों में तेरे संग ,भीग प्रेमरस  जायेंगे हम
तेरे वसन ,भीग जब तेरे ,चन्दन से तन को चूमेंगे
देख नज़र से ,तेरा कंचन,हम भी ,पागल हो झूमेंगे
जाने क्या क्या,आस लगा कर ,रख्खी है  मन उन्मादी ने
इस सावन की ,मन भावन की,प्यारी सी बूंदाबांदी में

मदनमोहन बाहेती'घोटू' 

हलचल अन्य ब्लोगों से 1-