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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

आशा-निराशा

    आशा-निराशा

भरी बारिश में उनके घर
गए हम आस ये ले कर
मज़ा बारिश का  आयेगा
                    पकोड़े  जा के खायेंगे
मगर जब हम वहां  पहुंचे
वहां थे  चल रहे  रोज़े
नहीं सोचा था ये दिन भर ,
                      कि  हम  कुछ  खा न पायेंगे
आदमी चाहता है कुछ
मगर होता है उल्टा कुछ
कि किस्मत की पहेली ये,
                      कभी सुलझा न पायेंगे
चबा सकते थे जब खाना
नहीं था पास में खाना
मिला खाना गिरे सब दांत ,
                         अब कैसे  चबायेंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

चुनाव का अधिकार

          चुनाव का अधिकार

बचपन से ,जब से मुझ में ,
थोड़ी समझ और होंश आया है
मैंने अपने आप को ,
चुनाव के चक्कर में ही पाया है
सबसे पहले ,मेरे दाखिले के लिए ,
नर्सरी स्कूल का चुनाव किया गया
 इस दाखिले में ,मेरा कुछ भी दखल नहीं था ,
क्योंकि स्कूल का चुनाव पिताजी ने था किया
पर धीरे धीरे ,जब मै बड़ा होने लगा ,
मेरी चुनने की प्रवृत्ति रंग लाने लगी
खाने पीने में पसंद की चीज चुनना,
अच्छे बुरे दोस्त चुनना ,
पहनने के वस्त्र चुनना ,
इन सभी बातों में मेरे चुनाव को,
तबज्जो दी जाने लगी
और बड़ा होने पर इस बार ,
कौनसे कोलेज में जाऊं ,
कौनसा प्रोफेशन अपनाऊ
किसे अपनी गर्ल फ्रेंड बनाऊ
मेरे हाथ में आ गया था
ये सब चुनाव करने का अधिकार
इम्तिहान में पास होने पर ,
कई जगह अप्लाय किया ,
कई इंटरव्यूह  दिए
और चुनाव प्रक्रिया झेलनी पडी
तब कहीं नसीब हुई ,एक अच्छी नौकरी
फिर चला जीवनसाथी के चुनाव का चक्कर
लड़कियां देखी दर्जन भर
तब कहीं कोई पसंद आई
जिसके साथ मैंने शादी रचाई
जैसे जैसे बसता गया मेरा घर संसार
वैसे वैसे मै खोता गया ,अपना चुनाव का अधिकार
क्योंकि अब मेरी कम,मेरी बीबी की ज्यादा चलती है
अब मेरे लिए हर चीज मेरी बीबी चुनती है
आजकल चुनाव के मामले में ,ये बन्दा बेकार है
क्योकि हर चीज चुनने का पत्नीजी को अधिकार है
अब तो बस ,जब पांच साल में ,आम चुनाव आता है
देश का नेता चुनने में,ये बंदा  हाथ बटाता है
ये चुनाव का चक्कर भी अजीब है  होता
बच्चे को माँ बाप चुनने का हक़ तो नहीं होता
पर जन्म के बाद और शादी के पहले ,
हर चुनाव में उसकी चलती है
पर शादी के बाद ,चुनाव के मामले में,
उसकी दाल नहीं गलती है
क्योंकि उसको रोज रोज की लड़ाई
या घर की शांति  के बीच,
एक चीज का चुनाव करना पड़ता अक्सर  है
और रोज की लड़ाई के बदले ,बीबी की बात मान,
घर की शांति चुनना ही बेहतर है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

लुटियन की दिल्ली

  लुटियन की दिल्ली

ये दिल्ली तो है लुटियन की ,जी चाहे लूट लो उतना ,
यहाँ पर तो लुटेरों की ,बहुत ही भीड़ रहती है
ये तो एक डाइनिंग टेबल है ,जो जी में आये ,वो खाओ ,
परसने ,खानेवाले चमचों की भी भीड़ रहती है
ये पार्लियामेंट की बिल्डिंग ,बनायी गोल उनने है,
इसलिए गोलमालों की ,यहाँ भरमार रहती है ,
ये  दिल्ली है,ओपोजिट पार्टियाँ भी ,दिल मिला कर के,
यहाँ पर सत्ता करने को ,सदा तैयार  रहती है
घोटू  

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

झपकी

         झपकी
सुबह उठे जब आँख खुली तो ,आलस हम पर मंडराया ,
थोड़ी देर और सो ले हम,हमने  एक झपकी ले  ली
ऑफिस में जब लंच ब्रेक था ,खाना खाया ,सुस्ताये ,
कुर्सी पर बैठे बैठे ही  ,हमने  एक  झपकी ले ली
शाम हुई,जब घर जाने को ,हम गाडी में जा बैठे,
ट्राफिक जाम मिला रस्ते में,हमने एक झपकी ले ली
टी वी पर खबरे सुनते थे ,रोज रोज की घिसीपिटी ,
लंबा एक ब्रेक आया और हमने एक झपकी  ले ली
पत्नी जी थी व्यस्त काम में ,हम फुर्सत में लेटे थे ,
तो बस उनके इन्तजार में ,हमने एक झपकी ले ली
देख हमें भरते खर्राटे ,उनने हमको जगा दिया ,
हलकी सी करवट बदली और हमने एक झपकी ले ली
झपकी छोटी बहन नींद ,सभी कहीं आ जाती है ,
जब भी चाहा उससे मिलना ,हमने एक झपकी ले ली
झपकी की झप्पी लेने में ,बड़ा मज़ा है आ जाता ,
नयी ताजगी मिलती है जब ,हमने एक झपकी ले ली

मस्दन मोहन बाहेती'घोटू'


नसीहत

                 
                  नसीहत
भले बुद्धू हो ,नालायक ,पर बड़े बाप का बेटा ,
समझदारी इसी में है,पटा कर के ,रखा जाये
भले ही सिक्का खोटा हो ,बचा कर चाहिए रखना,
पता ना कब पड़े जरुरत और कब वो काम आ जाये
न मालूम कब ,तुम्हारा दोस्त ,ऊंचे पद पे जा बैठे ,
कभी बचपन का याराना ,बड़ा ही काम आता है
खिलाये कृष्ण को दो मुट्ठी ,थे चावल जिस सुदामा ने,
सुना है ,आजकल वो ,चार राईस मिल चलाता  है
घोटू

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