एक सन्देश-

यह ब्लॉग समर्पित है साहित्य की अनुपम विधा "पद्य" को |
पद्य रस की रचनाओ का इस ब्लॉग में स्वागत है | साथ ही इस ब्लॉग में दुसरे रचनाकारों के ब्लॉग से भी रचनाएँ उनकी अनुमति से लेकर यहाँ प्रकाशित की जाएँगी |

सदस्यता को इच्छुक मित्र यहाँ संपर्क करें या फिर इस ब्लॉग में प्रकाशित करवाने हेतु मेल करें:-
kavyasansaar@gmail.com
pradip_kumar110@yahoo.com

इस ब्लॉग से जुड़े

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

यह तो कहने की बातें है

यह तो कहने की बातें है

यह तो कहने की बातें है ,बिन गर्मी प्यार नहीं होता ,
मैंने तो बरफ़ के टुकड़ों को,आपस में चिपकते देखा है
ना अकलमन्द कोई होता है अक्लदाढ़ के आने से,
कितने ही अकल भरे करतब,बच्चों को करते देखा है
तन की ताक़त से भी ज्यादा,मन की शक्ति आवश्यक है ,
कितने अपँग ,लाचारों को,  मंजिल  पर पहुँचते देखा है
दफ्तर में दहाड़ा जो करते ,घर पर बनते भीगी बिल्ली,
कितने रौबीले  साहबों को,बीबी से  डरते  देखा  है
सागर का जल तो खारा है,मीठा जल होता नदियों का ,
फिर भी सागर से मिलने को,नदियों को उमड़ते देखा है
वो ऊपरवाला एक ही है,अल्लाह बोलो चाहे इश्वर ,
मजहब के नामपे बन्दों को  ,आपस में झगड़ते देखा है
ना बरसे तो त्राहि त्राहि ,ज्यादा बरसे तो तबाही है ,
हर चीज की अति जब होती ,तो काम बिगड़ते देखा है
तक़दीर मेहरबां जब होती ,धन छप्पर फाड़ बरसता है,
परसु बन जाता परसराम ,तक़दीर संवरते  देखा है
दुःख ,पीड़ा और तकलीफों में,अपने ही साथ निभाते है ,
फिर भी कुछ अपनो को अपनों से नफरत करते देखा है
जिन बच्चों पर सब कुछ वारा ,उनने ही किया तिरस्कृत है,
माँ बापों को उनके खातिर , दिन रात तड़फते देखा है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


अच्छा लगता है

अच्छा लगता है

कैसे भी मन को समझाना अच्छा लगता है
वादे कर  सबको भरमाना , अच्छा लगता है
जहाँ नेह,आदर मिलता है,स्वागत होता है ,
उस घर में ही ,आना जाना ,अच्छा लगता है
मै हूँ, तुम हो, ये हो, वो हो,  या कोई भी हो,
सबको ही फोटो खिंचवाना ,अच्छा लगता है
भीड़ इकट्ठी करने में ,मुश्किल तो होती है,
पर उनसे ,ताली बजवाना ,अच्छा लगता है
ऐसा लगता ,भरा हुआ है घी और शक्कर से ,
औरों की थाली का खाना ,अच्छा लगता है
मतलब हो या ना हो,कुछ की आदत होती है ,
उन्हें फटे में ,टांग अड़ाना ,अच्छा लगता है
आजादी का मतलब हमको छूट मिल गयी है ,
एक दूसरे पर गलियाना,अच्छा लगता है
कुश्ती अब न अखाड़े में,मोबाइल पर होती ,
फेसबुकों पर जा भिड़ जाना,अच्छा लगता है
कुछ को सुख मिलता है औरों को तड़फाने में ,
जले घाव पर ,नमक लगाना,अच्छा लगता है
एक जमाना था जब गाने मीठे लगते  थे ,
अब हल्ला गुल्ला ,चिल्लाना ,अच्छा लगता है
फल अच्छे ,दो चार दिनों में पर सड़ जाते है ,
नीबू का आचार पुराना ,अच्छा लगता है
अपने ही जब साथ छोड़ देते है अपनों का ,
तो  लोगों को ,हर बेगाना ,अच्छा लगता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 23 जुलाई 2016

अब तक यह जीवन बीत गया

अब तक यह जीवन बीत गया

मैं तुम्हे बहुत कुछ कहता हूँ ,तुम मुझे बहुत कुछ कहती हो,
एक दूजे को कहते सुनते ,अब तक यह जीवन बीत  गया
घर में यदि होते कुछ बरतन ,तो आपस में टकराते  पर ,
उनके टकराने से आता  है  जीवन में  संगीत  नया
सोचो यदि तुम चुपचाप रहो ,और मैं भी दिन भर चुप बैठूं ,
हम दोनों गुमसुम मौन रहें,तो अपनी क्या हालत होगी
इसके विपरीत लड़ेंगे हम,और एक दूजे पर चीखेंगे ,
आनन्द पड़ोसी लेंगे ,घर में रोज महाभारत  होगी
इससे तो ज्यादा बेहतर है ,जब तुम बोलो तो मैं सुनलूँ ,
मै कुछ बोलूं तो तुम सुन लो,तुम जीती,मैं भी जीत गया 
 मैं तुम्हे बहुत कुछ कहता हूँ,तुम मुझे बहुत कुछ कहती हो ,
इक दूजे को कहते ,सुनते,अब तक ये जीवन बीत गया
मियां बीबी में कहा सुनी, और छोटे मोटे ये झगड़े ,
जब चलते है तो वैवाहिक ,जीवन का आनंद आता है
ये रूठा रूठी ,मान मनोवल, प्यार बढ़ाया करते है ,
झगड़े के बाद समर्पण का ,सुख भी दूना हो जाता है
मैं कभी मान लूँ निज गलती,तुम कभी मानलो निज गलती,
तब ही घर में गूंजा करता ,संगीत,मिलन का गीत नया
मैं तुम्हे बहुत कुछ कहता हूँ,तुम मुझे बहुत कुछ कहती हो,
एक दूजे को कहते सुनते, अब तक ये जीवन बीत गया
बीबी यदि जो जिद नहीं करे ,तो फिर वह बीबी ही कैसी  ,
तुम भाव खाव ,फिर मान जाव,इसमें तुम्हारा पतिपन है
तुम ना ना कर उसकी मानो,वो ना कह माने  तुम्हारी ,
इस नोकझोंक में ख़ुशी ख़ुशी ,कट जाता सारा जीवन है
तुम कभी समर्पण कर देते ,वो कभी समर्पण कर देती,
सुख मिलता ,एक दूजे में हम,जब खोजा करते मीत नया
मैं तुम्हे बहुत कुछ कहता हूँ,तुम मुझे बहुत कुछ कहती हो,
एक दूजे की कहते सुनते ,अब तक ये जीवन बीत गया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

किन्तु सठियाया नहीं हूँ आजतक

        किन्तु  सठियाया नहीं हूँ आजतक

पार कर ली उम्र मैंने साठ  की,किन्तु सठियाया नहीं हूँ आजतक
पहले जैसी ताजगी तो ना रही ,किन्तु मुरझाया नहीं हूँ आजतक 
वृद्धि अनुभव की हुई है इसलिए , लोग कहते हो गया मै वृद्ध हूँ
निभाने कर्तव्य अपना आज भी ,पहले जैसा पूर्ण ,मै कटिबद्ध हूँ
बड़ी कंकरीली डगर थी उम्र की ,राह में ठोकर लगी,कांटे मिले
कभी कोई ने दुलारा प्यार से ,तो किसी की डाट और चांटे मिले
झेलता झंझावतें तूफ़ान की ,नाव अपनी मगर मै खेता गया
 कभी धारा के चला विपरीत मै ,कभी धारा साथ मैं बहता गया
कई भंवरों में फंसा ,निकला मगर ,डूब मै पाया नहीं हूँ आजतक
पार करली उम्र मैंने साठ  की ,किन्तु सठियाया नहीं हूँ आजतक
सौंप दी पतवार तुमको इसलिए ,क्योंकि तुममे लगन थी,उत्साह था
 देख कर जज्बा तुम्हारे जोश का ,करके कुछ दिखलानेवाली चाह का
इसका मतलब कदाचित भी ये नहीं,हो गए है  पस्त मेरे  हौंसले
उतर सकता आज भी मैदान में ,वही फुर्ती और पुराना जोश ले
पोटली ,यह पुरानी तो है मगर ,अनुभव के मोतियों से है भरी
नहीं मन में मैल या दुर्भाव है ,इसलिए ही बात करता हूँ खरी
पीढ़ियों के सोच की यह भिन्नता,मैं समझ पाया नहीं हूँ आजतक
पार कर ली उम्र मैंने साठ की ,किन्तु सठियाया नहीं हूँ आजतक
प्रगति तुमने की,करो ,करते रहो ,प्रगति का पोषक हमेशा मैं रहा
संस्कृति ,संस्कार से भटके अगर,उसका आलोचक हमेशा मैं  रहा
तुम्हारी हर सफलता में खुश हुआ ,तुम्हारी पीड़ा लगी दुखदायिनी
किसी ने टेढ़ी नज़र तुमपर करी ,उस तरफ थी भृकुटियां मेरी तनी
कौन माली ,भला खुश होगा नहीं ,देख फलते ,फूलते उद्यान को
भूलना लेकिन न तुमको चाहये ,बागवाँ के किये उस अहसान को
है बड़ी मजबूत इस तरु की जड़ें,तभी हिल पाया नहीं हूँ आजतक
पार कर ली उम्र मैंने साठ की,किन्तु सठियाया नहीं हूँ आजतक

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
                   

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

आओ ,जीमें

आओ ,जीमें
तुम भी खाओ ,मैं भी खाऊं ,लेकिन धीमे धीमे
आओ,जीमें
बहुत खिलाई है लोगों को ,हमने हलवा पूरी
पर क्या करते ,आवष्यक था  ,थी थोड़ी मजबूरी 
अब वसूल करना सब खरचा ,हमको हुआ जरूरी
बीबी बच्चों की हसरत  भी करनी  हमको  पूरी 
अब तो हम इस पोजिशन में है ,पाँचों ऊँगली घी में
आओ,जीमें
खानपान में ,बड़ी चौकसी ,लेकिन रखनी होगी
खाने की हरचीज संभल  कर,हमको चखनी होगी
जल्दी जल्दी अगर खा लिया ,पेट  बिगड़  सकता  है
ज्यादा गरम खा लिया तो फिर ,मुंह भी जल सकता है
तीखी नज़रें रखे है हम पर  ,विजिलेंस की टीमें
आओ जीमें
जब तक खानपान आसन पर ,बैठें ,मौज उडाले
ख्याल रखें ,उतना ही खाएं,जितना सहज पचाले
पता नहीं कब ,नज़र किसी की ,लगे,जाय कट पत्ता
इसीलिये हम ,मजे उठाले,जब तक हाथ में  सत्ता
इतना जमा करें कि  जीवन ,कट जाए मस्ती में
आओ ,जीमें

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

हलचल अन्य ब्लोगों से 1-