एक सन्देश-

यह ब्लॉग समर्पित है साहित्य की अनुपम विधा "पद्य" को |
पद्य रस की रचनाओ का इस ब्लॉग में स्वागत है | साथ ही इस ब्लॉग में दुसरे रचनाकारों के ब्लॉग से भी रचनाएँ उनकी अनुमति से लेकर यहाँ प्रकाशित की जाएँगी |

सदस्यता को इच्छुक मित्र यहाँ संपर्क करें या फिर इस ब्लॉग में प्रकाशित करवाने हेतु मेल करें:-
kavyasansaar@gmail.com
pradip_kumar110@yahoo.com

इस ब्लॉग से जुड़े

शनिवार, 1 नवंबर 2025

मेरा जीवन

मुझे ना उधो से कुछ लेना
मुझे ना माधो को कुछ देना 
बड़े प्यार से खाता जो भी 
 मिलता चना चबेना 
जब से मन से निकल गई है 
कुछ पाने की तृष्णा 
बड़े प्रेम से जपता हूं अब 
जय राधा जय कृष्णा

 मैं त्यागी मोह और माया
 निर्मल हो गई मेरी काया 
भाव घृणा का दूर हो गया,
सब पर प्रेम लुटाया 
करता सबसे प्यार ,
घृणा का बचा न कोई प्रश्न ना 
बड़े प्रेम से जपता हूं अब 
जय राधा जय कृष्णा  

 मैंने दिया अहम को त्याग 
सभी के प्रति मन में अनुराग 
अब तक सोई पड़ी आत्मा 
आज गई है जाग 
अब तो सबकी सेवा करना 
अपना प्यार परसना 
बड़े प्रेम से जपता हूं मैं,
जय राधा जय कृष्णा 

किसी से ना झगड़ा ना रार 
सभी के प्रति मन में है प्यार 
दीन दुखी की सेवा करना 
धर्म-कर्म व्यवहार 
मन में भक्ति भाव लिए अब
 सबके दिल में बसना 
बड़े प्रेम से जपता हूं मैं 
जय राधा जय कृष्णा 

मदन मोहन बाहेती घोटू 
बोनस वाली जिंदगी 

मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है,
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में 
अपने साथी संगी और परिवार जनों
 के प्रति मेरा प्यार भरा है नस-नस में

जीवन के कुछ दिन मस्ती में बीत गए, किलकारी भरते, मुस्काते, बचपन में 
कुछ दिन बीते यूं ही किशोर अवस्था में 
उच्छृंखल से, मौज मनाते ही यौवन में और फिर शादी हुई गृहस्थी बोझ बड़ा, गया उलझता मैं कमाई की उलझन में
पग पग बाधाओं से टकराव हुआ ,
कितने सुख-दुख झेले अबतक जीवन में पाले पोसे बच्चे, उनके पंख उगे ,
नीड़ बसा कर अपना, चले गए बसने 
 मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है,
 काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में 

इस जीवन में खट्टे मीठे कितने ही, अनुभव पाकर के अब जब परिपक्व हुआ 
धीरे-धीरे सीख सीख दुनियादारी 
अच्छा बुरा समझने में कुछ दक्ष हुआ
 दबे पांव आ गया बुढ़ापा ,यह बोला 
बूढ़े हो तुम ,किसी काम के नहीं रहे जबकि चुस्त दुरुस्त काम में यह बूढ़ा, अपने मन की पीर बताओ किसे कहे कार्य शैली में अंतर दोनों पीढ़ी का 
सोच नहीं उनकी मिलती है आपस में
 मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है 
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में 

यह सच है की बढ़ती हुई उम्र के संग 
हुआ समय का भी कुछ ऐसा पगफेरा तने हुए तन में कमजोरी समा गई तरह-तरह की नई व्याधियों ने घेरा 
काम धाम कुछ बचा नहीं है करने को,
खालीपन ही खालीपन है जीवन में 
 लाचारी ने मुझे निकम्मा बना दिया,
रह रह टीस उठा करती मेरे मन में 
कल तक तो चलता फिरता था फुर्तीला देखो आज हो गया कितना बेबस मै 
मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है, 
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में

वृद्धावस्था मुझे इस तरह सता रही पिछले जन्मों की मुझे मिल रही कोई सजा
 रह गया वस्तु में एक चरण छूने की बस 
 मेरे सर पर जब से बुजुर्ग का ताज सजा जी करता है त्यागूं सभी मोह माया ,
कुछ पुण्य कमा लूं,राम नाम का जप करके 
तीर्थाटन और दान धर्म थोड़ा कर लूं 
करूं प्रायश्चित पापों का जीवन भर के कोशिश करूं कि तर जाऊं मै बैतरणी , यही कामना ईश कृपा की मानस में 
मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है 
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में

मदन मोहन बाहेती घोटू 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

आओ फिर लड़ लें,झगड़ लें 

बहुत दिन से तुम न रूठी ,
और ना मैंने मनाया 
फेर कर मुंह नहीं सोये,
एक दूजे को रुलाया 
देर तक भूखी रही तुम,
और मैं भी न खाया 
फिर सुलह के बाद वाला ,
नहीं सुख हमने उठाया 
रूठने का, मनाने का ,
बहाना हम कोई गढ़ ले 
आओ फिर लड़ लें,झगड़ ले 

चलो फिर से याद कर ले ,
उम्र वह जब थी जवानी 
दिन सुनहरे हुआ करते, 
और रातें थी सुहानी 
पागलों सा प्यार था पर ,
एक दूजे की न मानी 
चाहते ना चाहते भी ,
हुआ करती खींचातानी 
हुई अनबन रहे कुछ क्षण,
राह कुछ ऐसी पकड़ ले 
आओ फिर लड़लें ,झगड़लें 

सिर्फ मीठा और मीठा ,
खाने से मन है उचटता 
बीच में नमकीन कोई ,
चटपटा है स्वाद लगता 
इस तरह ही प्यार में जो ,
झगड़े का तड़का न लगता 
तो मनाने बाद फिर से ,
मिलन का सुख ना निखरता 
रुखे सूखे होठों पर वह ,
मिलन चुंबन पुनः जड़ लें 
आओ फिर लड़लें, झगड़लें 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

खींच सकता हूं जितना 

झेलता सब परेशानी,
बुढ़ापे की बीमारी की, 
अभी तक काटा ये जीवन,
हमेशा गाते ,मुस्काते

जिऊंगा यूं ही हंस हंस कर 
जब तलक मेरे दम में दम 
मौत भी डगमगाएगी,
मेरे नजदीक को आते 

क्योंकि हथियार मेरे संग,
दुआएं दोस्तों की है,
 है रक्षा सूत्र बहनों का ,
भाइयों का है अपनापन 

असर पत्नी के सब व्रत का, 
है करवा चौथ, तीजों का 
मिलेगा फल उसे निश्चित,
रहेगी वह सुहागन बन

प्यार में मेरा भी सबसे 
बन गया इस तरह बंधन 
मोह में और माया में ,
उलझ कर रह गया है मन 

मज़ा जीने में आता है 
चाहता दिल, जियूँ लंबा
जब तक खींच सकता हूं 
मैं खींचूंगा मेरा जीवन

मदन मोहन बाहेती घोटू 
गुनगुनाते रहो 

भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो 
पंछियों की तरह चहचहाते रहो 

रोने धोने को ना,है ये जीवन मिला 
ना किसी से रखो कोई शिकवा गिला 
प्रेम का रस सभी को पिलाते रहो
भुनभुनाओ नहीं ,गुनगुनाते रहो 

आएंगे सुख कभी, छाएंगे दुख कभी 
तुम रखो हौसला, जाएंगे मिट सभी 
तुम कदम अपने आगे बढाते रहो 
भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो 

देख औरों की प्रगति, न मन में जलो
जीत जाओगे तुम, दो कदम तो चलो 
जश्न खुशियों का अपनी मनाते रहो भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो 

मुश्किलें सब तुम्हारी,सुलझ जाएगी 
जिंदगी हंसते गाते,गुजर जाएगी 
तुम त्यौहार हर दिन मनाते रहो 
भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो

मदन मोहन बाहेती घोटू 

हलचल अन्य ब्लोगों से 1-