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शनिवार, 1 नवंबर 2025

बोनस वाली जिंदगी 

मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है,
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में 
अपने साथी संगी और परिवार जनों
 के प्रति मेरा प्यार भरा है नस-नस में

जीवन के कुछ दिन मस्ती में बीत गए, किलकारी भरते, मुस्काते, बचपन में 
कुछ दिन बीते यूं ही किशोर अवस्था में 
उच्छृंखल से, मौज मनाते ही यौवन में और फिर शादी हुई गृहस्थी बोझ बड़ा, गया उलझता मैं कमाई की उलझन में
पग पग बाधाओं से टकराव हुआ ,
कितने सुख-दुख झेले अबतक जीवन में पाले पोसे बच्चे, उनके पंख उगे ,
नीड़ बसा कर अपना, चले गए बसने 
 मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है,
 काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में 

इस जीवन में खट्टे मीठे कितने ही, अनुभव पाकर के अब जब परिपक्व हुआ 
धीरे-धीरे सीख सीख दुनियादारी 
अच्छा बुरा समझने में कुछ दक्ष हुआ
 दबे पांव आ गया बुढ़ापा ,यह बोला 
बूढ़े हो तुम ,किसी काम के नहीं रहे जबकि चुस्त दुरुस्त काम में यह बूढ़ा, अपने मन की पीर बताओ किसे कहे कार्य शैली में अंतर दोनों पीढ़ी का 
सोच नहीं उनकी मिलती है आपस में
 मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है 
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में 

यह सच है की बढ़ती हुई उम्र के संग 
हुआ समय का भी कुछ ऐसा पगफेरा तने हुए तन में कमजोरी समा गई तरह-तरह की नई व्याधियों ने घेरा 
काम धाम कुछ बचा नहीं है करने को,
खालीपन ही खालीपन है जीवन में 
 लाचारी ने मुझे निकम्मा बना दिया,
रह रह टीस उठा करती मेरे मन में 
कल तक तो चलता फिरता था फुर्तीला देखो आज हो गया कितना बेबस मै 
मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है, 
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में

वृद्धावस्था मुझे इस तरह सता रही पिछले जन्मों की मुझे मिल रही कोई सजा
 रह गया वस्तु में एक चरण छूने की बस 
 मेरे सर पर जब से बुजुर्ग का ताज सजा जी करता है त्यागूं सभी मोह माया ,
कुछ पुण्य कमा लूं,राम नाम का जप करके 
तीर्थाटन और दान धर्म थोड़ा कर लूं 
करूं प्रायश्चित पापों का जीवन भर के कोशिश करूं कि तर जाऊं मै बैतरणी , यही कामना ईश कृपा की मानस में 
मैंने एक भरपूर जिंदगी जी ली है 
काट रहा हूं बाकी जीवन बोनस में

मदन मोहन बाहेती घोटू 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

आओ फिर लड़ लें,झगड़ लें 

बहुत दिन से तुम न रूठी ,
और ना मैंने मनाया 
फेर कर मुंह नहीं सोये,
एक दूजे को रुलाया 
देर तक भूखी रही तुम,
और मैं भी न खाया 
फिर सुलह के बाद वाला ,
नहीं सुख हमने उठाया 
रूठने का, मनाने का ,
बहाना हम कोई गढ़ ले 
आओ फिर लड़ लें,झगड़ ले 

चलो फिर से याद कर ले ,
उम्र वह जब थी जवानी 
दिन सुनहरे हुआ करते, 
और रातें थी सुहानी 
पागलों सा प्यार था पर ,
एक दूजे की न मानी 
चाहते ना चाहते भी ,
हुआ करती खींचातानी 
हुई अनबन रहे कुछ क्षण,
राह कुछ ऐसी पकड़ ले 
आओ फिर लड़लें ,झगड़लें 

सिर्फ मीठा और मीठा ,
खाने से मन है उचटता 
बीच में नमकीन कोई ,
चटपटा है स्वाद लगता 
इस तरह ही प्यार में जो ,
झगड़े का तड़का न लगता 
तो मनाने बाद फिर से ,
मिलन का सुख ना निखरता 
रुखे सूखे होठों पर वह ,
मिलन चुंबन पुनः जड़ लें 
आओ फिर लड़लें, झगड़लें 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

खींच सकता हूं जितना 

झेलता सब परेशानी,
बुढ़ापे की बीमारी की, 
अभी तक काटा ये जीवन,
हमेशा गाते ,मुस्काते

जिऊंगा यूं ही हंस हंस कर 
जब तलक मेरे दम में दम 
मौत भी डगमगाएगी,
मेरे नजदीक को आते 

क्योंकि हथियार मेरे संग,
दुआएं दोस्तों की है,
 है रक्षा सूत्र बहनों का ,
भाइयों का है अपनापन 

असर पत्नी के सब व्रत का, 
है करवा चौथ, तीजों का 
मिलेगा फल उसे निश्चित,
रहेगी वह सुहागन बन

प्यार में मेरा भी सबसे 
बन गया इस तरह बंधन 
मोह में और माया में ,
उलझ कर रह गया है मन 

मज़ा जीने में आता है 
चाहता दिल, जियूँ लंबा
जब तक खींच सकता हूं 
मैं खींचूंगा मेरा जीवन

मदन मोहन बाहेती घोटू 
गुनगुनाते रहो 

भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो 
पंछियों की तरह चहचहाते रहो 

रोने धोने को ना,है ये जीवन मिला 
ना किसी से रखो कोई शिकवा गिला 
प्रेम का रस सभी को पिलाते रहो
भुनभुनाओ नहीं ,गुनगुनाते रहो 

आएंगे सुख कभी, छाएंगे दुख कभी 
तुम रखो हौसला, जाएंगे मिट सभी 
तुम कदम अपने आगे बढाते रहो 
भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो 

देख औरों की प्रगति, न मन में जलो
जीत जाओगे तुम, दो कदम तो चलो 
जश्न खुशियों का अपनी मनाते रहो भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो 

मुश्किलें सब तुम्हारी,सुलझ जाएगी 
जिंदगी हंसते गाते,गुजर जाएगी 
तुम त्यौहार हर दिन मनाते रहो 
भुनभुनाओ नहीं, गुनगुनाते रहो

मदन मोहन बाहेती घोटू 

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

श्री गणेश लक्ष्मी पूजन दीवाली पर एक साथ क्यों?

अभी कुछ दिन पहले ही तो,
 बड़े भक्ति भाव से हमने ,
गणेश जी को विदा देकर किया था रवाना  
यह कह कर कि है गणपति बप्पा अगले बरस तुम जल्दी आना 
और बरस भर की जरूरत ही नहीं पड़ी बहुत जल्दी हमें पड़ गया उनको फिर से बुलाना 
क्योंकि दिवाली आ गई है 
घर-घर में लक्ष्मी जी छा गई है 
उल्लू पर सवार लक्ष्मी माता अपनी महिमा दिखने लगी है 
पति विष्णु तो सोए हुए हैं लंबी नींद 
और यह अपने दोनों हाथों से सिक्के बरसाने लगी है 
लक्ष्मी माता चंचल है और धन समृद्धि के साथ खो न दे अपने बुद्धि और विवेक इसलिए उन पर संतुलन बनाने के लिए निमंत्रित किया जाते हैं श्री गणेश 
लक्ष्मी माता एक स्थान पर स्थिर नहीं होती है 
श्री गणेश बुद्धि के स्वामी है लक्ष्मी को स्थिर करने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है 
श्री गणेश जी लक्ष्मी जी को स्थिर रखकर लंबे समय तक रखते हैं टिकाए इसलिए दीपावली पूजन में लक्ष्मी जी के साथ बिठाकर गणेश जी भी जाते हैं पूजाएं 
आपने देखा होगा लक्ष्मी की तस्वीरों में जब वो अकेली होती है ,
दोनों हाथों से धन बरसाती है 
और जब गणेश जी साथ होती हैं 
तो शांति मुद्रा में पूजी जाती है
गणेश जी की सलाह से धन बरसाते हुए अच्छे बुरे का करती संतुलन है
दीपावली पर गणेश पूजन का यही तो कारण है 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

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