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सोमवार, 5 अप्रैल 2021

सुबह सुबह होती है

सुबह सुबह होती है
ओस की बूँदें भी ,
बन जाती मोती है

बचपन जैसी निश्छल
धुली धुली  कोमल सी
मंद समीरण जैसी ,
कुछ चंचल चंचल सी
तरु के नव किसलय सी ,
खिलती हुई कली सी
खुशबू से महक रही ,
लगती है भली सी
अम्बर में तैर रही ,
एक पगली बदली सी
कुछ उजली उजली सी ,
कुछ धुंधली धुंधली सी
फुदक रहे पंछी सी ,
चहक रही चिड़िया सी
टुकुर टुकुर देख रही ,
नन्ही सी गुड़िया सी
थकी हुई रजनी ज्यों ,
लेती अंगड़ाई सी
आलस को भगा रही ,
आती जम्हाई सी
बालों को सुलझा कर ,
चमक रहे आनन की
हाथ में झाड़ू ले
बुहारते आँगन सी
पनिहारिन के सर पर ,
छलक रही गगरी सी
चाय की चुस्की सी
कुरमुरी मठरी सी
बछड़े की रम्भाहट
गाय के दूहन सी
मंदिर की घंटी सी ,
और घिसते चन्दन सी
सूरज की आभा जब ,
ज्योतिर्मय होती है
शुरुवात शुभ दिन की ,
सभी जगह होती है
सुबह, सुबह होती है  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

इम्युनिटी

रूपसी (C ),रूपसी (C )
कोई ना तुमसी (C )हसीं  (C )
बहुत मादक छवि तुम्हारी ,
तुम मेरे मन बसी (C )
तुम्हारी हर अदा प्यारी ,
और प्यारी है हंसी (C )
मुझपे तुम अहसान कर दो ,
बन के मेरी प्रेयसी (C )
क्योंकि मेरी जिंदगी में ,
आ गयी है  बेबसी (C )
कोरोना के जाल में है ,
जिंदगी मेरी फंसी (C )
और तुममे प्रचुर मात्रा ,
में भरा विटामिन (C )
तुम मिलोगी तो मेरी ,
बढ़ जायेगी फिर इम्युनिटी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

बुढ़ापे की उमर

दौड़ने की ना रही ,अब टहलने की उमर है
जरा सा बाजा बजा कर बहलने की उमर है

अच्छे अच्छे सूरमा को मात करते थे कभी
चाँद तारे ,तोड़ने की बात करते थे कभी
थे कभी वो हौंसले पर हो गए अब पस्त है
नहीं खुद पे खुद का अब ,औरों का बंदोबस्त है
अब तो पग पग ,संभल आगे चलने की ये उमर है  
दौड़ने की ना रही ,अब टहलने की उमर है

अपने बल और बाजुओं पर नाज़ था हमको बड़ा
अब तो थोड़ी दूर चल कर ,कदम जाते लड़खड़ा
उम्र के जिस दौर में हम ,आ गए है आजकल
कल खिले से फूल थे ,मुरझा गए है आजकल
याद कर बातें पुरानी ,मचलने की उमर है
दौड़ने की ना रही अब टहलने की उमर है

बुढ़ापे का स्वाद चखने लग गए है इन दिनों
प्यार से परहेज रखने लग गए है इन दिनों
दे रहे ढाढ़स है अपने मन को हम समझा रहे
नौ सौ चूहे मार बिल्ली की तरह हज़  जा रहे
कुछ न मिलता ,हाथ केवल मलने की ये उमर है
दौड़ने की ना रही अब टहलने की उमर है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जिंदगी

हमने  जैसे तैसे कर के ,बस गुजारी जिंदगी
दूसरों खातिर  लुटा दी अपनीसारी  जिंदगी
भाव में  बहते रहे और पीड़ाएँ  सहते रहे ,,
उलझनों में रही उलझी सीधीसादी जिंदगी
सबको खुश करने के चक्कर में न कोई खुश रहा ,
और हमने व्यर्थ ही अपनी गमा दी जिंदगी
भूल कर भी आजकल वो ,पूछते ना हाल है ,,
जिनके खातिर दाव  पर ,हमने लगा दी जिंदगी
किसीकी भी जिंदगी में ,दखल देना है गलत ,
हमने जी ली अपनी ,तुम जी लो तुम्हारी जिंदगी  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

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