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बुधवार, 9 सितंबर 2020

मैं क्यों देखूं  इधर उधर

मैं रहूँ देखता सिर्फ तुम्हे ,तुम रहो देखती सिर्फ मुझे ,
यूं देख रेख में आपस की ,जाता है अपना वक़्त गुजर
सुन्दर,मनमोहक,आकर्षक,अनमोल कृति तुम ईश्वर की ,
जब खड़ी सामने हो मेरे , तो मैं क्यों देखूं इधर उधर

दो नयन तुम्हारे ,दो मेरे ,जब मिले ,नयन हो गये  चार
कुछ हुआ इस तरह चमत्कार ,खुल गए ह्रदय के सभी द्वार
तुम धीरे धीरे ,चुपके से ,आई और मन में समा गयी ,
मैं भी दिल हार गया अपना ,आपस में हममें हुआ प्यार
अब पलक झपकते नैन नहीं ,बिन तुमको देखे चैन नहीं ,
जिस तरफ डालता हूँ  नज़रें ,तुम ही तुम आती मुझे नज़र
मैं रहूँ देखता सिर्फ तुम्हे ,तुम रहो देखती सिर्फ मुझे ,
यूं देख रेख में आपस की ,जाता है अपना वक़्त गुजर  

दिन रात तुम्हारे ख्वाबों में ,खोया रहता दीवाना मन
कुछ असर प्यार का है ऐसा ,छाया रहता है पागलपन
हल्की सी भी आहट  होती ,यूं लगता है तुम आयी हो ,
दिन भर बेचैन रहा करता ,पाने को तुम्हारे दरशन
तुन बिन सबकुछ सूना सूना ,दुःख विरह वेदना का दूना ,
बस हम मन ही मन प्यार करें ,कोई भी होता नहीं मुखर
मैं रहूँ देखता सिर्फ तुम्हे ,तुम रहो देखती सिर्फ मुझे ,
यूं देखरेख में आपस की ,जाता है अपना वक़्त गुजर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

बदलाव

थे रोज के जो मिलनेवाले ,मुश्किल से मिलते कभी कभी
करते दूरी से हाथ हिला कर 'हाय 'और फिर 'बाय 'तभी
जहाँ हरदम रहती हलचल थी ,रौनक ,मस्ती थी ,हल्ला था
चुपचाप और खामोश पड़ा ,जीवंत बहुत जो मुहल्ला था
यह कैसा आया परिवर्तन ,ना जाने किसकी नज़र लगी
 हंस कर ,मिलजुल रहनेवालों ने ,बना दूरियां आज रखी
सब घर में घुस कर बैठे रहते ,सहमे सहमे और डरे डरे
मुंह पर है पट्टी बाँध रखी ,खुल कर बातें भी नहीं करे
ना जन्मदिवस सेलिब्रेशन ,ना किटी पार्टी ना उत्सव
लग गयी लगाम सभी पर है ,अब मिलना जुलना ना संभव
ना भीड़भाड़ ,सुनसान सड़क ना बाज़ारों में चहल पहल
कोरोना के एक वाइरस ने ,जीवन शैली को दिया बदल

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
यश के बस

ज्योतिष को  थी कुंडली,दिखलाई एक बार
उसने बोला  भाग्य में ,है यश की भरमार
है यश की भरमार , मिलेगी यश से सिद्धी
घर में शांति रहेगी , होगी पद  की   वृद्धी
फंसे उमर भर 'घोटू' यस के  चक्कर में हम
यस सर यस सर दफ्तर में ,घर में यस मेडम

घोटू 

रविवार, 6 सितंबर 2020

गुरुघंटालों के प्रति -शिक्षकदिवस पर

मैंने गुरु से सीखा जितना ,उतना गुरुघंटालों से
ढाई घर चलनेवाली ,उनकी शतरंजी चालों से

जीवनपथ पर जब निकला मैं ,था सीधासादा सच्चा  
पर लोगों को चुभता था यह,मैं क्यों हूँ इतना अच्छा
बार बार थे मुझे सताते राहों में अटका रोड़ा
ठोकर खा ,रोड़ों से बचना ,सीखा मैं थोड़ा थोड़ा
जब भी उनने,मुझे फंसाने,उलटी सीधी चाल चली
बच बाहर आने को मैंने ,ढूंढी पतली कोई गली
चुगलखोरियाँ ,चमचगिरियाँ,मख्खनबाजी ,मक्कारी
अपना स्वार्थ साधनेवाली ,चालबाजियां वो सारी
चाल शकुनि मामा जैसी,चलना फेंक गलत पासे
भ्र्ष्ट करे सबकी बुद्धि वह ,सीखा मंत्र ,मंथरा से
कब दे ढील ,खींचना डोरी ,और पतंग काट देना
भाई भाई के बीच दीवारें ,करके खड़ी ,बाँट देना
जितने गुरुघंटाल मिले ,थे इन खेलों में पारंगत
दावपेंच कुछ सीखा गयी ,हमको उनकी थोड़ी संगत
इन उलटी सीधी चालों का ,ज्ञान बहुत आवश्यक था
वरना उनके चक्रव्यूह से ,कोई भी ना बच सकता
सदगुरु ने था ज्ञान सिखाया ,अच्छी अच्छी शिक्षा दी
पर जीवन में कई बार जब आयी घडी परीक्षा की
सीधी ऊँगली ,घी ना निकला ,टेढ़ी की ,तब सका निकल
गुरुघंटालों की शिक्षा ने ,रस्ता मेरा ,किया सरल
सच का रस्ता ,अच्छा होता ,मगर बात ये भी सच्ची
अगर किसी का भला कर सके ,कभी झूंठ भी है अच्छी
टेढ़ा ज्ञान ,काम में ला ,मैं  निकला हूँ जंजालों से
मैंने गुरु से जितना सीखा ,उतना गुरुघंटालों से

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

बुधवार, 2 सितंबर 2020

प्यार की बरसात

जबसे मेरी मसें भीगी ,
मेरे मन में प्यार के कीड़े कुलबुलाने लगे
सारे हसीं चेहरे ,मेरा मन लुभाने लगे
यौवन की ऊष्मा में ,जब मन तपता था
तो हृदय के सागर में ,
मोहब्बत का मानसूनी बादल उठता था
ये आवारा बादल ,किसी हसीना को देख के
कभी गरज कर छेड़खानी करते ,
कभी आँख मारते ,तड़ित रेख से
और कभी कभी छींटाकशी कर ,
अपना मन बहलाते थे
पर बेचारे बरस नहीं पाते थे
भटकते रहते थे ,सही जगह और ,
सही दबाब वाले क्षेत्र की तलाश में
बरसने की आस में
ये होते रहे घनीभूत
और जब तुम्हे देखा ,
तो प्यार से होकर अभिभूत
ये द्रवित हुए और जब तुमसे मुलाकात होगयी
और प्यार की बरसात हो गयी

घोटू 

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