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गुरुवार, 4 सितंबर 2014

हम और तुम

           हम और तुम

तुम हो अंतर्मुखी,मैं हूँ बाहृय मुखी
तुम हो मुझसे दुखी,मैं हूँ तुमसे दुखी
पहले शादी के पत्री मिलाई गयी ,
      गुण है छत्तीस मिले ,पंडित ने पढ़ा
गुण हमारे तुम्हारे न मिलते है कुछ,
      हममे तुममें है छत्तीस का आंकड़ा
मैं हूँ सौ वाट का बल्ब जलता हुआ,
      तुम स्लिम ट्यूब लाइट ,वो भी फूंकी
        तुम हो अंतर्मुखी ,मैं हूँ बाहृय मुखी 
तुम चुपचाप अपने में सिमटी रहो,
         मैं परिंदे सा नीले गगन में  उडूं
है जुदा सोच अपना ,जुदा  ख्याल है ,
        तुम तो पीछे चलो और मैं आगे  बढू
मैं सबसे मिलूं,हंसी ठठ्टा करूं ,
        और नज़रें तुम्हारी ,झुकी की झुकी
        तुम हो अंतर्मुखी ,मैं हूँ बाहृय  मुखी
मुझ को लगती है मौज और मस्ती भली,
       और तुम सीरियस ,खुद में खोई रहो
है रस्ते हमारे अलग ही अलग ,
          मैं तो पश्चिम बहूं और तुम पूरब बहो
मैं तो चाहता हूँ चलना बुलेट ट्रेन सा ,
         तुम हो अड़ियल सी  भैंसा गाडी ,रुकी
          तुम हो अंतर्मुखी ,मैं हूँ बाहृय मुखी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू' 

जोश- बुढ़ापे में

         जोश- बुढ़ापे में

उठो,जागो,पड़े रहने से न कुछ हो पायेगा ,
                     अगर कुछ  करना है तुमको ,खड़ा होना  चाहिए
यूं ही ढीले पड़े रह कर ,काम हो सकता नहीं,
                      जोश हो और हौसला भी,बड़ा होना  होना  चाहिए
इस बुढ़ापे  में भला ये सब कहाँ हो पायेगा ,
                       ये ग़लतफ़हमी तुम्हारी ,सोचना ये छोड़ दो,
पुरानी माचिस तीली भी लगा देती आग है ,
                        मसाला माचिस पर लेकिन ,चढ़ा होना चाहिए

घोटू

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

बारिश में भीजेंगे

       बारिश में भीजेंगे

आ चल बारिश में भीजेंगे
बिना बाल्टी और रस्सी के ,सूरज पानी खींचा करता
और बादलों की टंकी में ,अपनी जब वह नभ में भरता
जब जब धरती प्यासी होती,फव्वारों सा बरसाता है
उस रिमझिम में जब नहाते है,हमको बड़ा मज़ा आता है
ना तो कोई सीमित धारा ,और ना  कोई चार दिवारी
खुल्ला विस्तृत बाथ रूम तब,बन जाती है दुनिया सारी
आसमान से आती बूँदें तन को चुभ चुभ सी जाती है
पूरे तन की मालिश करती हुई  हमें वो सहलाती  है
नीचे भू पर बहता पानी और ऊपर से आती   वर्षा 
उछल कूद कर,नाच भीगना  ,सचमुच मन देता है हर्षा
पानी की बूँदें शीतल  पर,तन मन में है आग लगाती
तनऔरवसन एक दिखते जब तन में सिहरन सी छाजाती
मन में प्रीत उमड़ आएगी ,एक दूसरे  पर रीझेंगे
आ चल बारिश में भीजेंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

मिलनी मोहलत चाहिए

           मिलनी मोहलत  चाहिए

मन मे होना चाहिए कुछ कर गुजरने का जूनून ,
      लगा जी,जुटना पडेगा ,अगर शोहरत  चाहिए
यूं तो सब ही काटते है ,पर सफल वो जिंदगी,
     नाम थोड़ा चाहिए और थोड़ी  इज्जत  चाहिए
बूढ़े बूढ़े लोग भी चढ़ जाते है एवरेस्ट पर,
      थोड़ा जज्बा चाहिए और थोड़ी हिम्मत चाहिए
बिना माचिस  जलाये भी,लोग जलने लगेगें ,
      आप  हो  खुशहाल ,बीबी  खूबसूरत  चाहिए
हमने अपनी जिंदगी का किया सौदा आपसे,
      रुंगावन  में प्यार ,कीमत में रियायत  चाहिए
इतनी सुन्दर रची दुनिया ,जिंदगी दी चार दिन,
     ऐ खुदा!एक और दिन की ,मिलनी मोहलत चाहिए

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
          स्मार्टवाच
नाचते जिसके इशारों पर उमर सारी रहे ,
        हमने अपनी कलाई पर ,उनकी फोटो खींच ली
स्मार्ट है ये वाच या फिर हो गए हम स्मार्ट है,
      कैद मुट्ठी पर किया और मिटा अपनी खीज ली            
घोटू

                    दीवानगी
चाँद बादल में छिपा पर देते उसको अर्घ्य है ,
            ये हमारी आस्था और श्रद्धा की है बानगी
तुमने घूंघट में छिपा कर रखा अपना चन्द्रमुख,
      फिर भी तुम पर मर मिटे ,ये हमारी दीवानगी 
घोटू

                    बरकत
आपका सजना संवरना ,सबका सब बेकार  है ,
       जिंदगी में आपकी जो किसी से चाहत नहीं
कितने ही स्वादिष्ट सुन्दर,आप व्यंजन पकाएं ,
      कोई यदि ना सराहे ,होती सफल मेहनत नहीं
हरे पीले लाल नीले ,कितने भी रंगीन हो ,
      फूलों में खुशबू नहीं तो काम की रंगत नहीं
बिन पसीना बहाये ,आये ,न हो ईमान की,
     'घोटू' ऐसी कमाई में ,होती है बरकत नहीं
घोटू
             चाय की चुस्की
चाहते जो आप जीना मस्ती से सारी उमर ,
     रोज पीना चाहिए फिर दार्जिलिंग की 'ब्लेक टी'
कड़क खुशबू भरी होती चाय भी आसाम की,
     एक प्याला पी लिया तो आ जाती है ताजगी
जीने यदि चाव है,दिल में किसी की चाह है ,
    चाहते हो खुशी से कट जाए सारी   जिंदगी
छोटी छोटी पत्तियों में जोश का जादू भरा,
     चुस्ती लाती है बदन में  ,एक चुस्की चाय की

घोटू   

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