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गुरुवार, 13 मार्च 2014

थ्रिल

              थ्रिल
सवेरे ,सवेरे ,
ताजे ताजे अखबार के ,
करारे करारे पन्ने को,
एक एक कर खोल कर ,
नयी नयी ख़बरें,
पढ़ने में जो मज़ा आता है
वो रात को टी वी पर ,
देख लो सब खबर,
तो गुम हो जाता है
जैसे शादी के पहले ,
डेटिंग ,सेटिंग करने से,
सुहागरात का थ्रिल चला जाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

कूकर या कुकर

           कूकर या कुकर
                      १
पत्नी बोली पति और कूकर एक सुभाय
दोनो ही है पालतू, स्वामी भक्त  कहलाय 
स्वामिभक्त कहलाय ,सिर्फ इतना है अंतर
कुत्ता   भोंके रात,हिलाये पूंछ दिवस भर
'घोटू 'पर पति दिन भर भौंके ,रॉब दिखाता
और रात को पत्नी आगे  पूंछ  हिलाता
                       २
हम बोले पति श्वान ना ,होता घर की शान
घर की रखवाली करे ,रखता सबका ध्यान
रखता सबका ध्यान ,कुकर प्रेशर के जैसा 
जब भी बढे दबाब ,बजाता सीटी ,हमेशा
जो घंटों का काम मिनिट भर में निपटाता
वो कूकर ना ,वो तो प्रेशर कुकर कहाता
घोटू

दो छक्के

             दो छक्के
                   १
जब भी है हम देखते,चेहरा कोई हसीन 
लगता है लावण्यमय ,सुन्दर और नमकीन
सुन्दर और नमकीन,पास जा प्यार जताते
मिलता मीठा स्वाद और मीठी सी  बातें
कह घोटू कविराय समझ में ये ना आता
लज्जत भरी मिठास,हुस्न नमकीन कहाता
                           २
पत्नी हथिनी की तरह, पति तिनके से क्षीण
अब ये तुम्ही समझ लो ,किसके ,कौन अधीन
किसके कौन अधीन ,अगर पत्नी हो पतली
और मोटे पतिदेव ,मगर हालत है पतली
खरबूजे पर छुरी गिरे ,छुरी पर खरबूजा
पर कटता हर बार ,बिचारा पति ,खरबूजा

घोटू  
 

गाल के हाल

             गाल के हाल
                      १
गाल गाल अंतर बहुत ,तरह तरह के गाल
पिचके कुछ फूले हुए ,कोई सेव से  लाल
कोई सेव से लाल ,सपाट कोई है   सिंपल
तो कोई के  गालों में  पड़ते  है   डिम्पल
होते उनके गाल  लाल  जब  वो शर्माते
और जब गुस्सा   होते है तो गाल फुलाते
                         २
नारी गाल सुन्दर बहुत ,चिकने,प्यारे,लाल
पर मर्दों के गाल पर, दाढ़ी  का  जंजाल
दाढ़ी का जंजाल ,बुढ़ापा  है जब  आता
होती दूर  लुनाई, चेहरा  झुर्रा  जाता
कह घोटू कविराय ,गाल से निकले गाली
मिले गाल से गाल ,मिलन की प्रथा निराली
घोटू  

होली की मस्ती

             होली की मस्ती
                       १
अंग अंग में छा गयी ,खुशियां और उमंग
घोटू पर है चढ़ गया ,अब होली  का  रंग
अब होली का रंग,छा गयी मन में मस्ती
हुई जागृत ,बूढ़े तन में,  हुस्न  परस्ती
हाथों लिए गुलाल ,फाग की धूम मचाते
जो भी मिले हसीन ,गाल उसके सहलाते
                          २
बढ़ी उमर में हो गया है कुछ ऐसा  हाल
कितने ही दिन हो गये ,छुए गुलाबी गाल
 छुए गुलाबी गाल,उमर बीबी की सत्तर
झुर्राये है गाल ,हाथ क्या फेरें उन पर
घोटू निकले ये भड़ास होली पर केवल
जब मल सकें गुलाल ,हंसीं गालों पर जीभर
 
घोटू 

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