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रविवार, 29 सितंबर 2013

mere patne by akhand gahmari

वो कहती है हम उनके दिल अजीज है
जान है वो हमारी हम उनकी जान है
उमड पडा उनका प्‍यार एक दिन
कर दिया निहाल प्‍यार से अपने एक दिन
क्‍या बताउू यारो कैसे किया प्‍यार एक दिन
झाडू मार कर जगाया कुत्‍ते की तरह
घर की सफाई करवायी महरी की तरह
मजवाया बर्तन हमसे कुछ यू इस तरह
पटक कर बर्तन बोली हिटलर की तरह
जानू बर्तन चमकाना बिम बार की तरह
उनके जानू कहने पर जोश था आया
बर्तन क्‍या बतर्न के वाप को चमकाया
चल पडा ये सोच कर करके स्‍नान
करूगा मैटम केा प्‍यार एक मजनू की तरह
लगा ग्रहण मेरे प्‍यार केा चॅाद की तरह
कपडेा की गठरी ले प्रकट हुई भत की तरह
कपडे धुलवाये,खाना बनवायी बास की तरह
हो गया पसीने लतपथ मैं
बैठा पंखे की नीचे मजदूर की तरह
तभी आकर पसर गयी सोफे पर जल्‍लाद की तरह
मेरे माथे पर अपना हाथ प्‍यार से फेर दिया
कोई काम ठीक से नही करते हेा
कह कर सेडिल से हमें पीट दिया
फिर बडे प्‍यार से पास बुलाया
बोली जानू तुम बडे अच्‍छे हेा
कितना प्‍यार करते हेा
आई लव यू कहती हू तुम लव टू ये बोलो जरा
फिर वह हसते हुए बोली जानू
क्‍या करती जानू आज महरी नहीं आयी थी
और मैं 5लाख रूपया दहेज में लेकर आयी थी
मेरे परम ससूर जी ने मेरे पापा से कहा था
बेटी 5 लाख लेकर जायेगी तेा सुख से रहेगी
पाव जमीन पर नहीं पडेगें उसे कामो से रहेगी
अब तुम ही बताओ जानू कैसे मिलता सुख
महरी नही आयी थी इस लिये करना पडा आपको
मैने सोचा सही है अखंड 5 लाख लेकर आयी
डाडू पोछा करने लिये,5 लाख में उसने खरीद लिया
बिक गया है हर इंसान दहेज की लालच में
जल रही दहेज की आग में लडकी लकडी की तहर
अगर मेरी बीबी ने काम ही करनवा महरी कती तरह
तो क्‍या गम है मैं उका जानू और वह मेरी जानू है
5 लाख में बिका हुआ एक खुशनसीब मजदूर हू
अखंड गहमरी

रात से सुबह तक -चार छोटी कवितायें

रात से सुबह तक -चार छोटी कवितायें
                       १
                  झपकी
दिन भर के काम की थकावट
पिया से मिलन की छटपटाहट 
जागने का मन करे ,नींद आये लपकी
                                        झपकी
                    २
             खर्राटे
अधूरी कामनाये ,दबी हुई बांते
जिन्हें दिन में हम ,बोल नहीं पाते
रात को सोने पर ,निकलती है बाहर
                         बन कर खर्राटे
                      ३
             उबासी 
चूम चूम बार बार ,बंद किया मुंह द्वार
निकल ही नहीं पायी ,हवाएं बासी
उठते जब सोकर ,बेचैन होकर ,
निकलती बाहर है ,बन कर  उबासी
                       ४
              अंगडाई
प्रीतम ने तन मन में ,आग सी लगाई
रात भर रही लिपटी ,बाहों में समायी
प्रेम रस लूटा ,अंग अंग टूटा ,
उठी जब सवेरे तो आयी अंगडाई

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ओरेंज काउंटी -दिल से

         ओरेंज काउंटी -दिल से *

यह है एक संतरा
मधुर रस से भरा
संग पर अलग अलग ,है इसकी फांके
ये प्यारा ,परिसर
है पंद्रह  टावर
रहें सभी मिलजुल कर ,रिश्तों को बांधे
एक है परिवार
बरसायें मधुर प्यार
हर दिन हो त्योंहार ,सुख दुःख सब बांटे
साथ साथ,संग संग
बिखराएँ प्रेमरंग
जीवन में हो उमंग,हँसते ,मुस्काते

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
*THE RESIDENTIAL COMPLEX,WHERE I LIVE

शनिवार, 28 सितंबर 2013

छोटी सी प्रेमकथा छोटा सा विरहगीत

             छोटी सी प्रेमकथा

वो  आये ,मुस्कराये
हम मिले और खिलखिलाये
मिलन ने ये गुल खिलाये
पका खाना वो खिलाये
और हम बच्चे खिलाएं

          छोटा सा विरहगीत

आप वहाँ ,हम यहाँ ,
इतनी दूर और ऐसे
बीरबल की खिचडी ,
पके तो कैसे?

घोटू

चांदनी छिटकी हुई है ..

        चांदनी छिटकी हुई है ..

चांदनी छिटकी हुई है ,चाँद मेरे ,
                   बांह से मेरी मगर तुम मत छिटकना   
वृक्ष जैसा खड़ा मै  बाहें पसारे ,
                   बावरी सी लता जैसी  आ लिपटना
    इस तरह से हो हमारे  मिलन के पल
    एक हम हो जाएँ जैसे दूध और जल
बांह में मेरी सिमटना प्यार से तुम,
                      लाज के मारे स्वयं में मत सिमटना
चांदनी छिटकी हुई है ,चाँद मेरे ,
                      बांह से मेरी मगर तुम मत छिटकना
         तुम विकसती ,एक नन्ही सी कली हो
         महक फैला रही,   खुशबू  से भरी हो
भ्रमर आ मंडरायेंगे तुमको लुभाने,
                        भावना के ज्वार में तुम मत बहकना
चांदनी छिटकी हुई  है चाँद मेरे ,
                        बांह से मेरी ,मगर तुम मत छिटकना
            कंटकों से भरी जीवन की डगर है
             बड़ा मुश्किल और दुर्गम ये सफ़र है
होंसला है जो अगर मंजिल मिलेगी ,
                          राह से अपनी मगर तुम मत भटकना
चांदनी छिटकी हुई है चाँद मेरे ,
                            बांह से मेरी मगर तुम मत छिटकना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

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