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बुधवार, 18 सितंबर 2013

छोटी दुनिया-बड़ा नजरिया


छोटी  दुनिया-बड़ा नजरिया
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मैंने पूछा लिफ्ट  मेन से
ऊपर नीचे, नीचे ऊपर
बार बार आते जाते हो
लोगों को अपनी मंजिल तक,
रोज़ रोज़ तुम पंहुचाते हो
छोटे से इस कोठियारे में,
 टप्पा खाते रहते,दिन भर
तुमको घुटन नहीं होती है?
लिफ्ट मेन बोला  मुस्का  कर
सर,ये तो अपनी ड्यूटी है
इससे ही मिलती रोटी  है
इसमें दुनिया दिख जाती है ,
लिफ्ट भले ही ये छोटी है,
हरेक सफ़र में नयी खुशबूए ,
नूतन सुन्दर चेहरे अच्छे
ऊपर नीचे आते ,जाते ,
झूले का सुख पाते बच्चे
 एक दूसरे से मिलने पर,
 हल्लो करते हुए पडोसी
न कोई अपनापन,
न कोई गर्मजोशी
बच्चों के स्कूली बेग थामती हुई
अस्त व्यस्त मातायें,
कोलेज जाने के नाम पर,
पिक्चर का प्रोग्राम बनाटी हुई कन्याये 
अपनी मालकिन की ,बुराइयाँ करती हुये ,
महरियाँ और  नौकर
सुबह सुबह अख़बारों का बण्डल उठाकर,
दुनिया की खबर बाँटने वाले,
न्यूज़ पेपर वेंडर
बहुओं की बुराई करती हुई सासें,
 सासों की आलोचना करती हुई बहुए
अपने पालतू कुत्ते को
पति से ज्यादा प्यार करती महिलाएं
बसों की भीड़ से उतर
पसीने में तर बतर
कुछ थके हारे पस्त चेहरे
अपनी बीबी के आगे भीगी बिल्ली बनते,
बड़े बड़े साहबों के रोबीले चेहरे
शोपिंग कर ढेरों बैगों का ,बोझ उठाये
थकी हुई पर प्रसन्न  महिलायें
हर बार
आती है एक नयी खुशबू की फुहार
विभिन्न वेशभूषाएं
भिन्न भिन्न भाषाएँ
मुझको इस छोटे से घर में
पूरा हिंदुस्तान नज़र आये
कभी बिछड़ों को मिलाता हूँ
कभी जुदाई के दृश्य देखता हूँ
ऊपर नीचे करते करते
मै रोज़ दुनिया के कई रंग देखता हूँ
और आप सोचते है की मुझे घुटन होती होगी
क्योंकि मै एक छोटे से डिब्बे में सिमटा हूँ
मै तो इस छोटे से डब्बे में भी,
खुश रहता हूँ, बड़े चेन  में
मुझे बताया लिफ्ट मेन ने

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

हम नूतन घर में आये है

हम नूतन घर में आये है
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नए पडोसी,नयी पड़ोसन
नया चमकता सुन्दर आँगन
नूतन कमरे और वातायन
      ये  सब मन को अति भाये है
       हम नूतन घर में आये है
कोठी में थे,बड़ी शान में
थे जमीन पर ,उस मकान में
आज सातवें आसमान में
        हमने निज पर फैलायें है
        हम नूतन घर में आये है
प्यारा दिखता उगता सूरज
सुदर लगता ढलता सूरज
धूप,रोशनी,दिन भर जगमग
        नवप्रकाश में मुस्काये है
        हम नूतन घर में आये है
तरणताल में नर और नारी
गूंजे बच्चों की किलकारी
 क्लब,मंदिर,सुख सुविधा सारी
          पाकर के हम हर्शायें है
          हम नूतन घर में आये है

झरने,फव्वारे खुशियों के
शीतल,तेज हवा के झोंके
ताक झांक करने के मौके
        इस ऊंचे घर में पायें है
    
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
(यह  कविता मेरे ओरंज काउंटी में
 आने के उपरान्त लिखी गयी है)

विकास की आंधी-पड़ोसियों का दर्द

 विकास की आंधी-पड़ोसियों का दर्द

हमारा छोटा सा घर था,
और उस पर एक छोटी सी छत थी
जहाँ हम सर्दी में ,कुनकुनी धूप का आनंद उठाते थे
 तेल की मालिश कर ,
नंगे बदन को,
सूरज की गर्मी में तपाते थे
और गर्मी की चांदनी रातों में,
जब शीतल बयार चल रही होती  थी,
सफ़ेद चादर पर ,हम दो दो चांदो को निहारते ,
तो तन में सिहरन सी होती थी
पड़े रहते थे ,हम तुम ,साथ साथ
और  मधुचंद्रिका सी होती थी,
हमारी हर रात
पर विकास की आंधी में,
हमारे घरों के आसपास ,
उग आई है,बहुमंजिली इमारते
और बदलने पड़  गयी है,हमें अपनी आदतें
बड़ी मुश्किलें हो  गयी है
हमारी सारी  आजादी खो गयी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

कविता कैसे बन जाती है

       कविता कैसे बन जाती है

तुम अक्सर पूछा करते हो ,कविता कैसे बन जाती है
लो ,मै तुमको बतलाता हूँ, कविता  ऐसे बन जाती है
रातों को नींद न जब आती ,जगता रहता,भरता करवट
जब सपन अधूरे रह जाते , होती है मन में अकुलाहट
कुछ अंतर्मन की पीडायें ,कुछ दुनियादारी के झंझट
तब  उभर उभर कर भाव सभी  ,शब्दों में ढलने लगते झट
होती है मुझे प्रसव पीड़ा , ले जनम कविता आती है
लो मै तुमको बतलाता हूँ ,कविता ऐसे  बन जाती है
इस जीवन के दुर्गम पथ पर,मिलते पत्थर ,चुभते कांटे
अनजान राह पर भटक भटक ,मिलते वीराने ,सन्नाटे
कुछ आते पल तन्हाई के ,जो मुश्किल से ,कटते ,काटे
संघर्षों के उस मौसम में ,जब वक़्त मारता है चांटे
वह चपत ,गाल पर उंगुली की ,जब छाप छोड़ कर जाती है
 लो मै तुमको बतलाता हूँ,कविता ऐसे बन जाती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ऊंचाई का दर्द

            ऊंचाई का दर्द

मेरे मस्तक के हिम किरीट पर ,जब पड़ती है सूर्य किरण
पहले स्वर्णिम आभा देता ,फिर चांदी सा चमके चम चम
फिर ढक लेते मुझको बादल ,मै लुप्त प्राय सा हो जाता
खो जाता है व्यक्तित्व मेरा ,आँखों से ओझल  हो जाता
फिर ग्रीष्म ऋतू का तीक्ष्ण ताप,पिघलाता  मेरा तन पल पल
मै फिर हिम आच्छादित हो जाता ,जब फिर से आती शीत लहर
यह  ऊंचाई , यह  कद मेरा  ,सब करते है  मुझको  आभूषित
वह स्वर्ण मुकुट ,वह रजत मुकुट ,होते मस्तक पर आलोकित 
पर  सर पर हिम की शीतलता ,देती मुझको कितनी सिहरन
मेरा व्यक्तित्व लुप्त करते ,जब मुझे घेरते  मेघ सघन
यह ऊंचाई की पीड़ा है ,यह है ऊंचे कद का प्रसाद
ऊंचे हो,देखो, जानोगे ,तुम ऊंचाई से जनित त्रास
मै दिखता बहुत भव्य तुमको ,पर जाने मेरा अंतरमन
कितनी पीड़ा दायक होती ,है ऊंचाई की वो ठिठुरन 
मेरे मस्तक का हिम किरीट ,दिखता तो बड़ा सुहाना है
पर मुझ पर क्या गुजरा करती ,क्या कभी किसी ने जाना है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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