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सोमवार, 26 अगस्त 2013

जंगल का कानून

    जंगल का कानून

आजकल तो हो गया जंगल का ये कानून है ,
की यहाँ पर कोई भी ,चलता नहीं क़ानून है
आम जनता सांस भी ले ,तो है ये उसका कसूर ,
और दबंगों के लिए तो,माफ़ सारे खून है  ,
रुपय्ये की साख गिरती जा रही है दिन ब दिन,
और चढ़ते आसमां पर ,जा रहे सब दाम है
आजकल बेख़ौफ़ होकर घूमते  है  दरिन्दे ,
औरतों की अस्मतों को ,लूटना अब आम है
जेल भरने के जो काबिल ,जेब भरते नेता बन,
करते खुल के गुंडा गर्दी , छूट है उनको  खुली
हो गयी है बड़ी गंदी ,राजनीति  इस तरह ,
माफिया को बचाने ,मासूम चढ़ते है सुली
शेर ने तो बाँध रख्खी ,अपने मुंह पर पट्टियाँ ,
रंगे सियारों के हाथों ,चल रही सरकार है
खाने के अधिकार का भी ,बन रहा क़ानून है ,
खूब खाओ,खाने का अब ,कानूनी अधिकार है
राजनीति ,आजकल ,पुश्तेनी धंधा बन गया ,
जिधर भी तुम हाथ डालोगे,उधर ही पोल है
गोलमालों का यहाँ पर ,सिलसिला थमता नहीं ,
इसका कारण ,ये भी है ,संसद भवन ही गोल है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 25 अगस्त 2013

ये हमें क्या हो गया है

        ये हमें क्या हो गया है

हम पहले ,लूटपाट और गुंडागिर्दी करने वाले ,
दबंगों को चुनाव में वोट देकर ,सत्ता में बैठाते है
और फिर उनके अत्याचार और भ्रष्टाचार से ,
परेशान भी बहुत हो जाते है
हम पहले,प्रवचन में मर्दानगी की दवाइयां ,
परोसने वाले ,नाटकीय बहुरूपियों को ,
महान संत बतलाते है
और फिर उनके  जमीन हडपने,कालाजादू करने,
और मासूम बच्चियों पर बलात्कार के किस्से सुन ,
उन पर अपनी नाराजगी भी जतलाते है
क्या हममे पात्र और कुपात्र की,
 परख करने का विवेक ही खो गया है  
खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते है ,
और फिर रोते है,
ये हमें क्या हो गया है ?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

बरसात और शादी

                बरसात और शादी

तपिश से गर्मियों की तंग आ हम प्रार्थना करते ,
कि जल्दी आये मौसम बारिशों का और जल बरसे
अकेलेपन से आकर तंग ज्यों क्वांरा करे विनती ,
जल्द से जल्द बीबी जाए मिल,वो शादी को तरसे
शुरू में बारिशें जब आती है ,मन को सुहाती है,
बाद शादी के जैसे कुछ दिनों आनंद  आता है
मगर जब रोज बारिश की झड़ी लगती ,नहीं रुकती ,
पति भी रोज की फरमाइशों से  तंग आता है
कहीं गड्ढे ,कहीं कीचड,कहीं  पानी,कहीं सीलन ,
न जाने कब बरस जाए ,संग छाता रखो हरदम
मारे खर्चों के होता गीला आटा ,मुफलिसी में भी ,
बाद शादी के ,घर के बजट का ,होता यही आलम
बाद  बारिश के जैसे होती है पैदा नयी  फसलें,
बाद शादी के ऐसे अधिकतर ,परिवार बढ़ता है
बारिशें और शादी ,एक सी,खुशियाँ कभी आफत ,
बचो तुम लाख लेकिन भीगना सबको ही पड़ता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

हुस्न का जादू

         हुस्न का जादू

तुम्हारे हुस्न का जादू ,चला है मेरे सर चढ़ कर
नहीं दुनिया में कोई भी,हसीं है तेरे से बढ़ कर
दिखा कर नाज़ और नखरे,हमारा दिल जलाती हो
कभी जाती लिपट और फिर छिटक के भाग जाती हो
बड़ी मादक  सी अंगडाई ,सवेरे उठ के जब लेती
कई छुरियां चलाती हो ,कलेजा चीर तुम देती
हमें बाहों में भर कर के ,नशा ,उन्माद भरती हो
और फिर छोडिये जी की,खुद  फ़रियाद करती हो
 बड़ी ही स्वाद ,प्यारी और मीठी ,चाकलेटी  हो
लगी हो जबसे होठों से,उतर की दिल में बैठी हो
अदाएं और जलवों से ,हमें बेबस भी करती हो
मज़ा भी पूरा लेती हो,और बस बस भी करती हो
ये सब अंदाज़ तुम्हारे,गजब के है,अजब से है
तुम्हारे इश्क में  पागल,दीवाने हम तो कब से है

मदन मोहन बाहेती'घोटू;

जन्म दिवस पर

  जन्म दिवस पर

उम्र सारी बेखुदी में कट गयी
उस सदी से इस सदी में कट गयी
जमाने ने ,ढाये कितने ही सितम ,
छाई गम की बदलियाँ और छट गयी
कौन अपना और पराया कौन है,
गलतफहमी थी,बहुत,अब हट गयी
मुस्करा कर सभी से ऐसे मिले ,
दूरियां और खाइयाँ सब पट गयी
बचपने में ,जवानी में और कुछ ,
उम्र अपनी बुढ़ापे में बंट  गयी
लोग कहते एक बरस हम बढ़ गए ,
जिन्दगी पर एक बरस है घट गयी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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