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गुरुवार, 22 अगस्त 2013

बिठानी पड़ती गोटी है

   बिठानी पड़ती गोटी है

आजकल हर जगह कुछ इस तरह का हो रहा कल्चर ,
काम कोई हो करवाना ,बिठानी पड़ती  गोटी  है
जगह जो हो अगर छोटी,तो लगती है रकम छोटी ,
बड़ी जो हो जगह तो फिर ,वहां कीमत भी मोटी  है
यहाँ नंगे है सब अन्दर ,ढका है आवरण ऊपर ,
कहीं पर सूट ,साड़ी है, कहीं केवल  लंगोटी  है
भले ही आदमी बाहर से हो कितना बड़ा दिखता ,
मगर देखा हकीकत में कि होती सोच छोटी है
अंगूठे छाप सैकड़ों ही,खेलते है करोड़ों में,
कोई पढ़ लिख के मुश्किल से ,जुटा पाता दो रोटी है
 ये सारा खेल किस्मत का,लिखा जो ऊपर वाले ने,
किसी का भाग्य अच्छा है,कोई तकदीर खोटी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

तो हम जाने

          तो हम जाने

दिखा कर रूप का जलवा ,जलाती हम को रहती हो,
रसोई घर में जा चूल्हा ,जलाओ तुम तो हम जाने
अदाएं और लटकों से ,हमें करती हो तुम घायल ,
कभी इन घावों पर मलहम ,लगाओ तुम तो हम जाने
चला कर तीर नज़रों के ,कलेजा चीर देती हो,
सुई हाथों में ले टांका , लगाओ तुम ,तो हम जाने
हमें अपने इशारों पर ,नचाती रोज रहती हो ,
कभी जंगल के मोरों को ,नचाओ तुम ,तो हम जाने

घोटू

अपनी अपनी किस्मत

       अपनी अपनी किस्मत

समंदर  के   किनारे ,ढेर  सारी  रेत  फैली  थी
लहर से दूर थी कुछ रेत ,जो बिलकुल अकेली थी
कहा मैंने ,अकेली धूप में क्यों बैठ तुम जलती
भिगोयेगी लहर ,उस ज्वार की तुम प्रतीक्षा करती
आयेगी चंद  पल लहरें, भिगा कर  भाग जायेगी
मिलन की याद तुमको देर तक फिर  तडफडायेगी
तुम्हे तुम्हारे धीरज का ,यही मिलता है क्या प्रतिफल
तो फिर हलके से मुस्का कर,दिया ये रेत ने उत्तर
बहुत सी ,गौरवर्णी और उघाड़े बदन महिलायें
तपाने धूप  में अपना बदन ,जब है यहाँ आये
पड़ी निर्वस्त्र रहती ,दबा मुझमे ,अपने अंगो को
भला ,ऐसे में ,मै भी रोक ना पाती उमंगों को
हसीनो का वो मांसल , गुदगुदा तन पास आता है
मज़ा अद्भुत निराला ,सिर्फ मिल मुझको ही पाता है
 चिपट कर उनकी काया से,जो सुख मिलता ,मुझे कुछ पल
लहर से मेरी दूरी का ,यही मिलता मुझे प्रतिफल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 21 अगस्त 2013

पत्नी को रखना संभाल के

           पत्नी को रखना संभाल के

              हम लाये है ससुराल से ,मोती निकाल के
             इस पत्नी को अपनी सभी रखना संभाल के
लूटा  है हमको ,इसकी महोब्बत ने,अदा  ने
 आई है हम पे अपना सारा प्यार लुटाने    
जन्नत का मज़ा ,धरती पर ही हमको दिलाने
ये तो वो नियामत है जो बख्शी है खुदा ने
               है हुस्न की दौलत ये ,है जलवे  कमाल के
                इस पत्नी को अपनी सभी ,रखना संभाल के
दुनिया में सबसे बढ़ के हसीना है बीबियाँ
दिल में जड़ा के रखिये ,नगीना है बीबियाँ
साकी भी है,मय भी हैऔर मीना है बीबियाँ
सुख और अमन से जिन्दगी जीना  है बीबियाँ
              बीबी के बिना ,हम है बिना सुर और ताल है
               इस पत्नी को अपनी सभी,रखना संभाल  के
करती है प्यार छोटों से ,बूढों से , बड़ों से
बढ़ता है वंश आपका ,इनके ही भरोसे
 बच्चों को दे दुलार ये  है पाले और पोसे
खाना बनाके ,प्यार से ,सबको ये  परोसे
               इनके बिना ,पड़ जाते लाले ,रोटी  दाल के
               इस पत्नी को अपनी ,सभी ,रखना संभाल के

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

तकिया- तूने क्या क्या किया

      तकिया- तूने क्या  क्या किया 

वही कोमल बदन सुन्दर ,है प्यारा  और मुलायम है
ये तकिया ,रेशमी प्यारा ,भला तुमसे कहाँ कम है
कोई भी पोज में रखलो ,काम ये रोज आता  है
न सजने और संवरने में , कई घंटे  लगाता है
न फरमाईश है गहनों की ,न होटल की ,घुमाने की
और ना इसकी आदत है  ,कोई नखरे  दिखाने की
बिना ही ना नुकर कर के ,ये बंध ,बाँहों में जाता है
रखो सर इस पे ,सो जाओ,मज़े से ये सुलाता  है
अगर तुझमे और तकिये में ,कोई च्वाइस मिला होता
तो जाहिर मैंने निश्चित में ही,तकिये को चुना होता
कही ये बात मैंने ,बीबीजी का दिल  जलाने को
तो अगली रात ,मुझको ना ,मिले तकिये सिरहाने को
दूसरे  दिन सवेरे ही ,सुधारी हमने ,निज गलती
कहा बीबी के आगे एक तकिये की है क्या हस्ती
नहीं इसमें  में,कोई हरकत ,अदा ना कोई सिसकारी
न वो बंधन है कि  जिसमे बंध ,लगे बीबी हमें प्यारी
बड़ा निर्जीव सा निरीह है ये रुई  का पुतला
शुरू में नर्म,दब दब कर ,मगर हो जाता है ये पतला
मगर पत्नी ,शुरू में पतली ,फिर वो फूल जाती है
ये काम आता है सोने में,वो दिन भर काम आती है
जगह बीबी की कैसे भी ,ये तकिया  ले नहीं सकता
जो सुख बीबी से मिलता है ,वो तकिया दे नहीं सकता

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

 
 


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