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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

नसीहत

                 
                  नसीहत
भले बुद्धू हो ,नालायक ,पर बड़े बाप का बेटा ,
समझदारी इसी में है,पटा कर के ,रखा जाये
भले ही सिक्का खोटा हो ,बचा कर चाहिए रखना,
पता ना कब पड़े जरुरत और कब वो काम आ जाये
न मालूम कब ,तुम्हारा दोस्त ,ऊंचे पद पे जा बैठे ,
कभी बचपन का याराना ,बड़ा ही काम आता है
खिलाये कृष्ण को दो मुट्ठी ,थे चावल जिस सुदामा ने,
सुना है ,आजकल वो ,चार राईस मिल चलाता  है
घोटू

नसीब अपना अपना

    
     नसीब  अपना  अपना
समंदर  के  किनारे ढेर  सारी  रेत  फैली  थी
लहर से दूर थी कुछ रेत,जो बिलकुल अकेली थी
कहा मैंने ,अकेली धुप में क्यों बैठ तुम जलती
भिगोयेगी लहर ,उस ज्वार की तुम प्रतीक्षा करती
आयेगी चंद पल लहरें,भीगा कर भाग  जायेगी
मिलन की याद तुमको देर तक फिर तड़फडायेगी
तुम्हे तुम्हारे धीरज का ,यही मिलता है क्या प्रतिफल
तो फिर हलके से मुस्का कर ,दिया ये रेत में उत्तर
बहुत सी ,गौरवर्णी और उघाड़े बदन  कन्याये
तपाने धूप मे,अपना बदन  जब है यहाँ  आये
पड़ी निर्वस्त्र रहती ,दबा मुझमे ,अपने अंगों को
भला ऐसे में,मै भी रोक ना पाती ,उमंगों को
हसीनो का वो मांसल ,गुदगुदा तन ,पास आता है
वो सुख अद्भुत ,निराला ,सिर्फ मिल मुझको ही पाता है
चिपट कर उनकी काया से,जो सुख मिलता ,मुझे कुछ पल
लहर से मेरी दूरी का ,यही  मिलता ,मुझे प्रतिफल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

शिकायत

         
शिकायत उनने की ये ,जवानी मे घाँस ना डाली ,
बुढ़ापे मे ,हमे क्यों इस तरह ,इतना सताते  है 
कहा हमने कि ताज़े  फलों का है शौक कम हमको,
हमारी तो ये  आदत ,हम तो सूखा मेवा  खाते  है 
घोटू 

शिकवा

      शिकवा

गए बारिश में उनके घर ,ये सोचा भीगेगे संग संग ,
मगर जाते ही पकड़ा दी ,उन्होंने  छतरियां  हमको
सुनाने हाले दिल अपना ,लिखी थी प्यार से चिट्ठी ,
बता दी ढेर सारी ,व्याकरण की  गलतियां   हमको
हमारे तो मुकद्दर में ,लिखा है एसा उलटा कुछ ,
अकेले  मिलने पहुंचे ,उनकी  दादी  सामने आई ,
कहा बेटा ,किया अच्छा ,जो आये ,दर्द है सर में ,
बिठा सर अपना दबवाने ,लगा उनने  दिया   हमको

घोटू

कदम ताल से धरती कांपी- चले हिन्द के वीर


कदम ताल से धरती कांपी
चले हिन्द के वीर
लिए तिरंगा चोटी  चढ़ के
   गरजे ले शमशीर .............
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भारत माँ ले रहीं सलामी
खुशियों का सागर उमड़ा
गले मिले सन्तति सब उनकी
ह्रदय कमल खिल-खिला पड़ा
कदम ताल से धरती कांपी ................
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भारत माँ   हैं जान से प्यारी
संस्कृति अपनी बड़ी दुलारी
प्रेम शान्ति का पाठ पढ़े हम
अनगिन भाषा खिले हैं क्यारी
कदम ताल से धरती कांपी ................
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नई नई नित खोज किये हम
विश्व गुरु बन दुनिया पाठ पढाये
वसुधा सागर गगन भेद के
सूक्ष्म ,तपस्या योग सिखाये
कदम ताल से धरती कांपी ................
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हम  स्वतंत्र हैं प्रजातंत्र है
अपना सब का प्यारा राज
यहाँ अहिंसा भाईचारा नीति नियम है
 सभी मनाएं भाँति -भांति हिल-मिल त्यौहार
कदम ताल से धरती कांपी ................
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शेर हैं हम नरसिंह है हम वीर बड़े हैं
अर्जुन एकलव्य से हैं तो भीष्म अटल हैं
कायर दुश्मन वार कभी पीछे करते हैं
लिए तिरंगा छाती चढ़ते वीर हमारे अजर अमर हैं 
कदम ताल से धरती कांपी ................
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प्रेम शान्ति का पाठ पढो हे दुनिया वालों
ना कर तांडव नाश सृष्टि का इसे बचा लो
ज्ञान दंभ पाखण्ड लूट बेचैनी से तुम घिरे पड़े हो
अन्तः झांको ,ज्वालामुखी धधकता 'स्वको अभी बचा लो
दूध की नदिया सोने चिड़िया से गुर सीखो
कल्पवृक्ष भारत अगाध है प्रेम लुटाना लेना सीखो
कदम ताल से धरती कांपी ................
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
प्रतापगढ़ भारत

कुल्लू -हिमाचल

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