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मंगलवार, 30 जुलाई 2013

ईमान- नेताओं मे

  
नेताओं मे खोजते  ईमान हो,
            कर रहे कोशिश क्यों बेकार मे 
कितना ही ढूंढो .नहीं मिल पाएंगे,
            तुम्हें मीठे करेले    बाज़ार  मे 
जो भी दिखता हकीकत होता नहीं,
             फर्क है तस्वीर मे और असल  मे,
राख़ की आती नज़र है परत पर,
             आग ही तुम पाओगे  अंगार मे 
बेईमानी से भरी इस रेत मे,
             हो गए गुम,चंद दाने  शकर के,
लाख छानो,तुम्हें मिल ना पाएंगे ,
             व्यर्थ कोशिश जाएगी ,हर बार मे 
हसीनों और नेता मे अंतर यही,
             नेता की 'हाँ 'का भरोसा कुछ नहीं,
और हसीनों की है ये प्यारी अदा,
             उनकी हामी,उनके है  इंकार मे 
हो समंदर चाहे कितना भी बड़ा,
              उसमे खारा पानी ही होता सदा,
तपिश से बादल बनाओगे तभी,
               बरसेगा वो,मीठा बन,बौछार मे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'        

सोमवार, 29 जुलाई 2013

नींद जब जाती उचट है ....

नींद जब जाती उचट है ...

नींद जब जाती उचट है रात को ,
                     जाने क्या क्या सोचता है आदमी
पंख सुनहरे लगा कर आस के ,
                      चाँद तक जा पहुंचता है  आदमी
दरिया में बीते दिनों की याद के ,
                       तैरता  है ,डुबकियाँ है मारता
गुजरे दिन के कितने ही किस्से हसीं,
                         कितनी ही आधी अधूरी दास्ताँ
ह्रदय पट पर खयालों  के चाक से,
                          लिखता है और पोंछता है आदमी
नींद जब जाती उचट है रात को,
                            जाने क्या क्या सोचता है आदमी
किसने क्या अच्छा किया और क्या बुरा ,
                              उभरती है सभी यादें   मन बसी
कौन सच्छा दोस्त ,दुश्मन कौन है,
                               किसने दिल तोडा और किसने दी खुशी
कितने ही अंजानो की इस भीड़ में,
                               कोई अपना   खोजता है आदमी
नींद जब जाती उचट है रात को,
                                 जाने क्या क्या सोचता है आदमी

मदन मोहन बाहेती' 

अपनी अपनी जीवन शैली

 
अपनी अपनी जीवन शैली

कभी कभी जब धूप  निकलती,है यूरोप के शहरों में
तो अक्सर हमने देखा है ,इन उजली   दोपहरों   में
जोड़े जवां  धूप में बैठे ,मज़ा उठाते  छुट्टी  का
और बूढ़े भी घूमा करते , हाथ पकड़ कर बुड्डी का
उनके बेटे अपने घर है, पोते पोती अपने घर
ओल्ड एज होमो में एकाकी जीवन  कटता अक्सर
पर जब भी मौका मिलता है,ख़ुशी ख़ुशी वो जीते है
बैठ रेस्तरां ,बर्गर खाते,ठंडी बीयर    पीते  है
सबके अपने संस्कार है, अपनी अपनी शैली है
होती भिन्न भिन्न देशों की,परम्परा अलबेली  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 28 जुलाई 2013

एक होटल के रूम की आत्म गाथा

        एक होटल के रूम की  आत्म गाथा
   
 मै होटल का रूम ,भाग्य पर हूँ  मुस्काता  
मुझ मे  रहने रोज़  मुसाफिर नूतन  आता 
थके हुये और पस्त यात्री है जब   आते 
मुझे देख कर ,मन मे बड़ी शांति  पाते 
नर्म,गुदगुदे बिस्तर पर जब पड़ते आकर 
मै खुश होता,उनकी सारी थकन मिटा कर 
मेरा बाथरूम ,हर लेता ,उनकी पीड़ा 
जब वो टब मे बैठ किया करते जल क्रीडा 
मुझ मे आकर ,आ जाती है नई जवानी 
कितने ही अधेड़ जोड़े  होते  तूफानी 
अपनी किस्मत पर उस दिन इतराता थोड़ा 
हनीमून पर ,आता नया विवाहित जोड़ा 
रात रात भर ,वो जगते,मै भी जगता हूँ 
सुबह देखना,बिखरा,थका हुआ  लगता हूँ 
कभी कभी कुछ खूसट बूढ़े भी आजाते 
खाँस खाँस कर,खुद भी जगते,मुझे जगाते 
तरह तरह के लोग कई अपने,बेगाने 
आते है मेरे संग मे कुछ रात बिताने 
देश देश के लोग ,सभी की अपनी भाषा 
मै खुश होता ,उनको दे आराम  ,जरा सा 
बाकी तो सब ,ये दुनिया है  आनी,जानी   
मै होटल का रूम,मेरी है  यही कहानी 

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

वादियाँ यूरोप की

(21 दिन के पूर्वी यूरोप के प्रवास के बाद आज वापस आया हूँ.यूरोप की वादियों पर लिखी एक रचना प्रस्तुत है )
    
         
आँख को ठंडक मिलीऔर आगया दिल को सुकूँ ,
मुग्ध हो देखा किया मै, वादियाँ  यूरोप की 
कहीं बर्फीली चमकती,कहीं हरियाली भरी,
सर उठा सबको बुलाती,पहाड़ियाँ यूरोप   की  
गौरवर्णी,स्वर्णकेशी,अल्पवस्त्रा ,सुहानी,
हुस्न का जैसे खजाना ,लड़कियां यूरोप की 
प्रेमिका से प्यार करने ,नहीं कोना ,ढूंढते ,
प्रीत खुल्ले मे दिखाये ,जोड़ियाँ,यूरोप  की 
हरित भूतल,श्वेत अंबर ,और सुहाना सा है सफर ,
बड़ी दिलकश,गयी मन बस,फिजायें यूरोप की 
शांत सा वातावरण है,कोई कोलाहल नहीं,
बड़ी शीतल,खुशनुमा है ,हवाएँ यूरोप की 
है  खुला  उन्मुक्त जीवन ,कोई आडंबर नहीं,
बड़ी है मन को सुहाती,  मस्तियाँ यूरोप  की 
देखता रहता है दिन भर,अस्त होता देर से,
सूर्य को इतना लुभाती, शोखियाँ  यूरोप की 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  
 
  

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