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सोमवार, 10 जून 2013

         जब पसीना गुलाब था 
          
वो दिन भी क्या थे ,जब कि पसीना गुलाब था 
हम भी जवान थे और तुममे भी शबाब था 
तुम्हारा प्यार   मदभरा  जामे-शराब था 
उस उम्र का हर एक लम्हा ,लाजबाब  था 
             बेसब्रे थे और बावले ,मगरूर बहुत थे
            और जवानी के नशे में हम चूर  बहुत थे 
            पर जोशे-जिन्दगी से हम भरपूर बहुत थे 
            लोगों की नज़र में हम नामाकूल  बहुत थे
  जब इन तिलों में तेल था ,वो दिन नहीं रहे 
  अरमान दिल के हमारे आंसू में  सब   बहे 
  अपने ही गये  छोड़ कर ,अब किससे क्या कहे 
  टूटा है दिल, उम्मीद के ,सारे  किले  ढहे 
            हमने था जिन्दगी  को बड़े चाव से जिया 
             आबे-हयात उनके लबों से था जब पिया 
               बढ़ती हुई उम्र ने है ऐसा सितम किया 
             वो दिन गए जब मारते थे ,फ़ाक़्ता मियां 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जिन्दगी बस ऐसे ही चलती है

 जिन्दगी  बस ऐसे ही चलती है 

शुरू शुरू में बड़ा चाव होता है 
मन में एक नया उत्साह होता है 
जीवन में छा जाते है नए रंग 
नए नए सपने,नई नई  उमंग 
और फिर धीरे धीरे ,रोज का चक्कर 
कभी कभी सुहाता,कभी बड़ा दुःख कर 
ढलती है जवानी और उमर है बढ़  जाती 
 इसी तरह जीने की ,आदत  पड़  जाती 
कभी कच्ची रहती,कभी दाल गलती 
जिन्दगी सारी ,बस ऐसे  ही चलती 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पथ्य

      
          पथ्य 
लूखी रोटी,सब्जी पतली 
चांवल लाल,दाल भी पतली 
और सलाद,मूली का गट्टा 
और साथ में फीका  मट्ठा 
डाक्टर ने जो बतलाया था 
कल मैंने वो ही खाया  था 
या बस अपना पेट भरा था 
सच मुझको कितना अखरा था 
एक तरफ पकवान,मिठाई 
देख देख नज़रें ललचाई 
मगर बनायी इनसे दूरी 
बीमारी की थी मजबूरी 
कई बार ये आता  जी में 
इतना सब कुछ दिया विधी ने 
सब इन्जोय करो,कहता  मन 
तो फिर क्यों है इतना बंधन 
खाना  चाहें,खा न सके हम 
कब तक खुद को रोकेंगा मन 
हम सब है खाने को जीते 
या जीने को खाते,पीते 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

एक ही थैली के चट्टे बट्टे

           एक ही थैली के चट्टे  बट्टे 
        
खुद है गंदे ,और हमको   साफ़ करने आ गये 
देखो बगुले,भक्त बन कर,जाप करने आ गये 
कोर्ट में लंबित है जिनके ,गुनाहों का मामला ,
अब तो मुजरिम भी यहाँ,इन्साफ करने आ गये 
भले मंहगाई बढे और सारी जनता हो दुखी ,
भाड़ में सब जाये ,खुद का लाभ करने आ गये 
यूं ही सब बदहाल है ,टेक्सों के बढ़ते  बोझ से,
हमको फिर से नंगा ये चुपचाप करने  आ गये 
रोज बढ़ती कीमतों से,फट गया जो दूध  है,
उसके रसगुल्ले बना ये  साफ़ करने  आ गये 
एक ही थैली के चट्टे बट्टे,मतलब साधने ,
कौरवों से पांडव ,मिलाप करने  आ गये 
पाँव लटके कब्र में है,मगर सत्ता पर नज़र,
बरसों से  देखा ,वो पूरा ख्वाब करने आ गये 
बहुत हमको रुलाया,अब तो बकश दो तुम हमें,
सता करके फिर हमें ,क्यों पाप करने आ गये 
बहुत झेला हमने 'घोटू',वोट हमसे मांग कर ,
फिर से शर्मिन्दा हमें ,क्यों आप करने आ गये 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 9 जून 2013

प्रणय निवेदन-एक डाक्टरनी से


        प्रणय निवेदन-एक डाक्टरनी से 
    
     
दर पे तेरे आये है हम ,तुझसे कहने के लिये 
क्या तेरे दिल में जगह है ,मेरे रहने के लिये 
महबूबा डाक्टर थी,हंस के ये बोली डीयर 
मेरा दिल तो छोटा सा है,एक मुट्ठी बराबर 
और तुम तो छह फुटे हो,समा कैसे पाओगे 
तोड़ दोगे ,दिल मेरा, यदि उसमे बसने आओगे 
हमने बोल ठीक है,एहसान इतना कीजिये 
दिल नहीं तो कम से कम ,दिमाग में रख लीजिये 
'क्या मेरा दिमाग खाली'खफा हो उसने कहा 
डाक्टरी पढ़ ली तो फिर दिमाग क्या खाली रहा 
कहा हमने चाहते हम ,कहना दिल की बात है 
तुम मेरी  लख्ते -जिगर,ये प्यार के जज्बात है  
कहा उसने जिगर फिर तो तुम्हारा बेकार है 
टेस्ट लीवर का कराने की तुम्हे  दरकार है 
हमने बोल प्यार जतलाने का ये अंदाज है 
मेरी हर धड़कन में डीयर ,बस तुम्हारा वास है 
धडकता दिल,सांस से जब ,आती जाती है हवा 
मै हवा ना ,हकीकत हूँ,पलट कर उसने  कहा 
हमने बोला ,ये हमारे इश्क का  पैगाम  है 
मेरे खूं के हरेक कतरे में तुम्हारा  नाम है 
कहा उसने ,सीरियस ये बात है,कहते हो क्या 
टेस्ट ब्लड का कराना ,अब तो जरूरी हो गया 
हमने बोला  ,बस करो,मत झाड़ो अपनी डाक्टरी 
प्यार का इकरार करदो,झुका नज़रे मदभरी 
हंस वो बोली,बात दिल की,मेरे पापा से कहो 
हमारी शादी करादे ,साथ फिर मेरे   रहो 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

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