भावनाए मेरी भी समझा करो तुम
मै समझता हूँ तुम्हारी भावनाएं,
भावनाएं मेरी भी समझा करो तुम
चाहती हो तुम कि मै तुमको सराहूं
तुम्हारे सौन्दर्य में, मै डूब जाऊं
तुम्हारी तारीफ़ हरदम रहूँ करता,
प्रेम में रत,मै तुम्हारे गीत गाऊँ
मै समझता हूँ तुम्हारी कामनाएं,
कामनाएं मेरी भी समझ करो तुम
कर दिया है,जब सभी कुछ तुम्हे अर्पण
प्यार क्यों प्रतिकार में मांगे समर्पण
एक दूजे के बने हम परिपूरक,
एक दूजे कि प्रतिच्छवी ,बने दर्पण
मै महकता हूँ तुम्हारी सुगंधी से,
गंध से मेरी कभी महका करो तुम
मै उमड़ता भाव हूँ,तुम हो कविता
और शीतल चन्द्रमा तुम,मै सविता
कलकलाती बह रही ,आतुर मिलन को,
प्यार का मै हूँ समंदर,तुम सरिता
जिस तरह मै चहकता हूँ तुम्हे लख कर,
देख मुझको भी कभी चहका करो तुम
मै समझता हूँ तुम्हारी भावनाए,
भावनाएं मेरी भी समझा करो तुम
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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