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बुधवार, 31 जुलाई 2013

अंदाजे इश्क

        
          अंदाजे  इश्क
न साडी, ना ढका आँचल ,न चेहरे पर कोई घूंघट
न गहनों से लदी  काया,न शर्मो लाज का नाटक
फटी सी जीन्स ,ढीला टॉप,और चंचलता निगाहों में
भरी मस्ती और बेफिक्री ,शरारत है   अदाओं   में
बड़ी बिंदास बन कर तुम,मेरे पहलू  में आती हो
बड़ी हो बेतकल्लुफ ,रात भर ,मुझको सताती हो
तुम्हारे प्यार का अंदाज ये ,मुझको   सुहाता  है
कि खुल कर खेलने में ही ,मज़ा उल्फत का आता है

 मदन मोहन बहेती'घोटू'


मंगलवार, 30 जुलाई 2013

ईमान- नेताओं मे

  
नेताओं मे खोजते  ईमान हो,
            कर रहे कोशिश क्यों बेकार मे 
कितना ही ढूंढो .नहीं मिल पाएंगे,
            तुम्हें मीठे करेले    बाज़ार  मे 
जो भी दिखता हकीकत होता नहीं,
             फर्क है तस्वीर मे और असल  मे,
राख़ की आती नज़र है परत पर,
             आग ही तुम पाओगे  अंगार मे 
बेईमानी से भरी इस रेत मे,
             हो गए गुम,चंद दाने  शकर के,
लाख छानो,तुम्हें मिल ना पाएंगे ,
             व्यर्थ कोशिश जाएगी ,हर बार मे 
हसीनों और नेता मे अंतर यही,
             नेता की 'हाँ 'का भरोसा कुछ नहीं,
और हसीनों की है ये प्यारी अदा,
             उनकी हामी,उनके है  इंकार मे 
हो समंदर चाहे कितना भी बड़ा,
              उसमे खारा पानी ही होता सदा,
तपिश से बादल बनाओगे तभी,
               बरसेगा वो,मीठा बन,बौछार मे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'        

सोमवार, 29 जुलाई 2013

नींद जब जाती उचट है ....

नींद जब जाती उचट है ...

नींद जब जाती उचट है रात को ,
                     जाने क्या क्या सोचता है आदमी
पंख सुनहरे लगा कर आस के ,
                      चाँद तक जा पहुंचता है  आदमी
दरिया में बीते दिनों की याद के ,
                       तैरता  है ,डुबकियाँ है मारता
गुजरे दिन के कितने ही किस्से हसीं,
                         कितनी ही आधी अधूरी दास्ताँ
ह्रदय पट पर खयालों  के चाक से,
                          लिखता है और पोंछता है आदमी
नींद जब जाती उचट है रात को,
                            जाने क्या क्या सोचता है आदमी
किसने क्या अच्छा किया और क्या बुरा ,
                              उभरती है सभी यादें   मन बसी
कौन सच्छा दोस्त ,दुश्मन कौन है,
                               किसने दिल तोडा और किसने दी खुशी
कितने ही अंजानो की इस भीड़ में,
                               कोई अपना   खोजता है आदमी
नींद जब जाती उचट है रात को,
                                 जाने क्या क्या सोचता है आदमी

मदन मोहन बाहेती' 

अपनी अपनी जीवन शैली

 
अपनी अपनी जीवन शैली

कभी कभी जब धूप  निकलती,है यूरोप के शहरों में
तो अक्सर हमने देखा है ,इन उजली   दोपहरों   में
जोड़े जवां  धूप में बैठे ,मज़ा उठाते  छुट्टी  का
और बूढ़े भी घूमा करते , हाथ पकड़ कर बुड्डी का
उनके बेटे अपने घर है, पोते पोती अपने घर
ओल्ड एज होमो में एकाकी जीवन  कटता अक्सर
पर जब भी मौका मिलता है,ख़ुशी ख़ुशी वो जीते है
बैठ रेस्तरां ,बर्गर खाते,ठंडी बीयर    पीते  है
सबके अपने संस्कार है, अपनी अपनी शैली है
होती भिन्न भिन्न देशों की,परम्परा अलबेली  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 28 जुलाई 2013

एक होटल के रूम की आत्म गाथा

        एक होटल के रूम की  आत्म गाथा
   
 मै होटल का रूम ,भाग्य पर हूँ  मुस्काता  
मुझ मे  रहने रोज़  मुसाफिर नूतन  आता 
थके हुये और पस्त यात्री है जब   आते 
मुझे देख कर ,मन मे बड़ी शांति  पाते 
नर्म,गुदगुदे बिस्तर पर जब पड़ते आकर 
मै खुश होता,उनकी सारी थकन मिटा कर 
मेरा बाथरूम ,हर लेता ,उनकी पीड़ा 
जब वो टब मे बैठ किया करते जल क्रीडा 
मुझ मे आकर ,आ जाती है नई जवानी 
कितने ही अधेड़ जोड़े  होते  तूफानी 
अपनी किस्मत पर उस दिन इतराता थोड़ा 
हनीमून पर ,आता नया विवाहित जोड़ा 
रात रात भर ,वो जगते,मै भी जगता हूँ 
सुबह देखना,बिखरा,थका हुआ  लगता हूँ 
कभी कभी कुछ खूसट बूढ़े भी आजाते 
खाँस खाँस कर,खुद भी जगते,मुझे जगाते 
तरह तरह के लोग कई अपने,बेगाने 
आते है मेरे संग मे कुछ रात बिताने 
देश देश के लोग ,सभी की अपनी भाषा 
मै खुश होता ,उनको दे आराम  ,जरा सा 
बाकी तो सब ,ये दुनिया है  आनी,जानी   
मै होटल का रूम,मेरी है  यही कहानी 

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

वादियाँ यूरोप की

(21 दिन के पूर्वी यूरोप के प्रवास के बाद आज वापस आया हूँ.यूरोप की वादियों पर लिखी एक रचना प्रस्तुत है )
    
         
आँख को ठंडक मिलीऔर आगया दिल को सुकूँ ,
मुग्ध हो देखा किया मै, वादियाँ  यूरोप की 
कहीं बर्फीली चमकती,कहीं हरियाली भरी,
सर उठा सबको बुलाती,पहाड़ियाँ यूरोप   की  
गौरवर्णी,स्वर्णकेशी,अल्पवस्त्रा ,सुहानी,
हुस्न का जैसे खजाना ,लड़कियां यूरोप की 
प्रेमिका से प्यार करने ,नहीं कोना ,ढूंढते ,
प्रीत खुल्ले मे दिखाये ,जोड़ियाँ,यूरोप  की 
हरित भूतल,श्वेत अंबर ,और सुहाना सा है सफर ,
बड़ी दिलकश,गयी मन बस,फिजायें यूरोप की 
शांत सा वातावरण है,कोई कोलाहल नहीं,
बड़ी शीतल,खुशनुमा है ,हवाएँ यूरोप की 
है  खुला  उन्मुक्त जीवन ,कोई आडंबर नहीं,
बड़ी है मन को सुहाती,  मस्तियाँ यूरोप  की 
देखता रहता है दिन भर,अस्त होता देर से,
सूर्य को इतना लुभाती, शोखियाँ  यूरोप की 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  
 
  

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

प्रियतमे कब आओगी


   प्रियतमे कब आओगी 
मेरे दिल को तोड़ कर 
यूं ही अकेला छोड़ कर 
जब से तुम मैके  गई 
चैन सब ले के   गयी 
इस कदर असहाय हूँ 
खुद ही बनाता चाय हूँ 
खाना क्या,क्या नाश्ता 
खाता  पीज़ा,  पास्ता
या फिर मेगी बनाता 
काम अपना चलाता 
रात भी अब ना कटे 
बदलता  हूँ करवटें 
अब तो गर्मी भी गयी 
बारिशें है आ गयी 
कब तलक तड़फाओगी 
प्रियतमे कब  आओगी ? 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

प्रियतमे कब आओगी


   प्रियतमे कब आओगी 
मेरे दिल को तोड़ कर 
यूं ही अकेला छोड़ कर 
जब से तुम मैके  गई 
चैन सब ले के   गयी 
इस कदर असहाय हूँ 
खुद ही बनाता चाय हूँ 
खाना क्या,क्या नाश्ता 
खाता  पीज़ा,  पास्ता
या फिर मेगी बनाता 
काम अपना चलाता 
रात भी अब ना कटे 
बदलता  हूँ करवटें 
अब तो गर्मी भी गयी 
बारिशें है आ गयी 
कब तलक तड़फाओगी 
प्रियतमे कब  आओगी ? 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

हाले-जुदाई

         
          हाले-जुदाई  
जुदाई मे जर्द चेहरा हो गया है,
             हिज्र की हर सांस भारी हो गयी है 
याद मे तेरी ये हालत बन गयी,
             लोग कहते है बीमारी हो गयी  है 
बदलते रहते है करवट रात भर हम ,
              इतनी ज्यादा बेकरारी  हो गयी है 
नींद हमको रात भर आती नहीं है ,
               इस कदर आदत तुम्हारी हो गयी है 
आजकल हम खुद से ही रहते खफा है,
               एसी  कुछ हालत हमारी   हो गयी है 
'घोटू'अब आ जाओ दिल लगता नहीं है,
                बड़ी लम्बी इंतजारी   हो गयी है 
मदन मोहन बाहेती'घोटू'       

जीभ और दाँत

  
       जीभ और दाँत 
जीभ हो या दाँत हो ,सब एक ही परिवार है 
बहुत भाईचारा इनमे,अपनापन और प्यार है 
जीभ है माँ सी मुलायम,दाँत बेटे  सख्त है 
चबा कर देते है खाना ,मातृ के वो भक्त  है 
काटता है जो कोई तो,कोई फिर है चबाता 
बड़ा हो छोटा हो पर कंधे से कंधा मिलाता 
काम करने का सभी का ,अपना अपना ढंग है 
एक घर मे ,ऊपर नीचे,सभी रहते संग है 
अगर दाँतो बीच मे जो ,कचरा कुछ भी जा फसे 
माँ सी हो बेचैन,बेकल ,ढूंढती  जिव्हा  उसे 
करती रहती कोशिशें,जब तक न वो जाये निकल
अच्छे अच्छों की उतारे ,कैंची सी जो जाये चल 
प्यार मे रसभरी है तो गुस्से मे  अंगार है 
जीभ हो या दाँत हो सब एक ही परिवार है 
मदन मोहन बाहेती'घोटू'               

सत्ता

           
             सत्ता 
सत्ता ,
वो खिला पुष्प है,
जो जब महकता है,
तो आसपास भँवरे गुंजन करते है 
 और तितलियाँ,मंडराया करती है 
पर सत्ताधारी मधुमख्खी,
उसका मधुपान कर,
सारा शहद ,अपने ही छत्ते मे भरती है
सत्ता,
वो दूध है जिसको पीने से,
आदमी मे बहुत ताक़त आ जाती है 
और जिसके पकने पर,
खोये की मिठाई बन जाती है 
और तो और,अगर दूध फट भी जाता है,
तो छेना बन,रसगुल्ले का स्वाद देता है 
जो जिंदगी भर याद रहता है 
सत्ता,
वो दावत है,
जहां जब कोई जीमने जाता है 
तो इतना खाता है 
कि उसका हाजमा बिगड़ जाता है 
और इलाज के लिए ,
वो स्वीजरलेंड या  खाड़ी देश जाता है 
सत्ता ,
वो पकवान है ,जो सबको ललचाते है 
और जिसको पकाने और खाने के लिए,
चमचे जुट जाते है 
सत्ता,
वो व्यसन है,
जिसका जब चस्का लग जाता है 
तो खाने से ही नहीं,
पाने से ही आदमी बौराता है 
सत्ता ,
वो तिलस्मी दरवाजा है,जिसमे से,
एक बार जो कोई गुजर जाता है,
सोने का हो जाता है 
सत्ता,
वो जादुई जाम है,
जिसमे भर कर सादा पानी भी पी लो,
तो एसा नशा चढ़ता है,
जो पाँच साल बाद ही उतरता है 
सत्ता ,
कब तक ,किसकी,
और कितने दिन रहेगी,
किसी को नहीं होता पता 
इसलिए सत्ता मे आते ही ,
जुट जाते है सब बनाने मे मालमत्ता 
पता नहीं,कब कट जाये पत्ता 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
     


इस सदी की त्रासदी

      
          इस सदी की त्रासदी 
किससे हम शिकवा करें,और करें अब किससे गिला
हमारी गुश्ताखियों का ,हमको  एसा  फल मिला 
खुदा ने नदियां बनाई ,हमने रोका बांध कर,
बारूदों से ब्लास्ट कर के ,दिये सब पर्वत हिला 
इस तरह पर्यावरण के संग मे की छेड़ छाड़ ,
हो गयी नाराज़ कुदरत ,और उसने तिलमिला 
नदी उफनी,फटे बादल,ढहे पर्वत इस कदर,
कहर टूटा खुदा का ज्यों आ गया हो जलजला 
हजारों घर बह गए और कितनी ही जाने गयी,
भक्ति,श्रद्धा ,आस्था को ,दिया सब की ही हिला 
देखते ही देखते बर्बाद सब कुछ हो गया ,
मिला हमको ,हमारी ही ,हरकतों का ये सिला 
होता व्यापारीकरण जब,आस्था विश्वास का,
शुरू हो जाता है फिर बरबादियों का सिलसिला 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'  

सोमवार, 1 जुलाई 2013

वादियाँ यूरोप की

    
           वादियाँ  यूरोप की 
आँख को ठंडक मिलीऔर आगया दिल को सुकूँ ,
मुग्ध हो देखा किया मै, वादियाँ  यूरोप की 
कहीं बर्फीली चमकती,कहीं हरियाली भरी,
सर उठा सबको बुलाती,वादियाँ यूरोप  की  
गौरवर्णी,स्वर्णकेशी,अल्पवस्त्रा ,सुहानी,
हुस्न का जैसे खजाना ,लड़कियां यूरोप की 
प्रेमिका से प्यार करने ,नहीं कोना ,ढूंढते ,
प्रीत खुल्ले मे दिखाये ,जोड़ियाँ,यूरोप  की 
हरित भूतल,श्वेत अंबर ,और सुहाना सा है सफर ,
बड़ी दिलकश,गयी मन बस,फिजायें यूरोप की 
शांत सा वातावरण है,कोई कोलाहल नहीं,
बड़ी शीतल,खुशनुमा है ,हवाएँ यूरोप की 
है  खुला  उन्मुक्त जीवन ,कोई आडंबर नहीं,
बड़ी है मन को सुहाती,  मस्तियाँ यूरोप  की 
देखता रहता है दिन भर,अस्त होता देर से,
सूर्य को इतना लुभाती, शोखियाँ  यूरोप की 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  
 
  

पुराने दिनो की याद

                   पुराने दिनो की याद 
                 
     दिन मस्ताने,शाम सुहानी,रात दीवानी होती थी 
     हमे याद आते वो दिन ,जब,हममे जवानी होती थी 
तेरी हुस्न,अदा ,जलवों पर,तब हम इतना मरते थे 
जैसे होती सुबह,रात का,   इंतजार हम करते थे  
       छेड़छाड़ चलती थी दिन भर, यही कहानी होती  थी 
       हमे याद आते वो दिन ,जब हममे  जवानी होती थी 
शर्माती थी तो गुलाब से ,गाल तुम्हारे हो जाते 
लाल रंग के होठ लरजते,मधु के प्याले हो जाते 
       और तुम्हारी,शोख अदाएं ,भी मरजानी  होती थी 
       हमे याद आते वो दिन जब ,हममे  जवानी होती थी 
रिमझिम बारिश की फुहारों मे हम भीगा करते थे 
तुम्हें पता है,मुझे पता है,फिर हम क्या क्या करते थे 
        बेकल राजा की बाहों मे,पागल रानी होती थी 
        हमे याद आते वो दिन ,जब हममे जवानी होती थी 
रात चाँदनी मे जब छत पर ,हम तुम सोया करते थे 
मधुर मिलन की धुन मे बेसुध होकर  खोया करते थे 
          चाँद देखता ,तुम शर्मा कर,पानी पानी  होती थी 
          हमे याद आते वो दिन ,जब हममे जवानी होती थी 
पर अब ना वो मधु,मधुशाला ,ना मतवाला साकी है 
उस मयखाने,की रौनक की ,केवल यादें बाकी है 
           जब मदिरा से ज्यादा मादक,तू मस्तानी होती थी 
           हमे याद आते वो दिन जब ,हममे जवानी होती थी 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

कहर के बाद

          
          कहर के बाद 
मै तुम्हें मंद मंद मंथर गति से ,
बहने वाली मंदाकिनी कहता था 
तुम्हारे शिखरों की तारीफ करता रहता था 
तुम्हारी जुल्फों को कहता था काली घटायें
और लगती थी बिजली गिराती हुई ,
मुझे तुम्हारी सारी अदायें
पर जब से ,
मन्दाकिनी ने उमड़ कर ,
बादलों ने फट कर ,
पहाड़ों के शिखरों ने ढह कर,
बिजलियों ने कडक कर ,
उत्तराखंड मे ढाया है कहर 
खंड खंड हो गयी है मेरी उपमायें
और मैंने बंद कर दिया है,
तुम्हारी तारीफ मे ये सब कहना 
मुझको तो तुम,
जैसी हो ,वैसी ही अच्छी लगती हो,
और हरदम ,एसी ही रहना 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'   ,