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शनिवार, 30 अप्रैल 2022

नारी का श्रृंगार तो पति है

BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN: नारी का श्रृंगार तो पति है: नारी का श्रृंगार तो पति है पति पर जान लुटाए एक एक गुण देख सोचकर कली फूल सी खिलती जाए प्रेम ही बोती प्रेम उगाती नारी प्यारी रचती जाए *****
 नारी का श्रृंगार तो पति है
पति पर जान लुटाए
एक एक गुण देख सोचकर
कली फूल सी खिलती जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*****
प्रेम के वशीभूत है नारी
पति परमेश्वर पर वारी
व्रत संकल्प अडिग कष्टों से
सौ सौ जन्म ले शिव को पाए
कर सेवा पूजा श्रद्धा से
फूली नहीं समाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*******
चाहत से मुस्काए गजरा
बल पौरुष से केश सजे
नेह प्रेम पर माथ की बिंदिया
झूम झूम नव गीत रचे
नैनों से पति के बतिया के
हहर हहर लव चूमे जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
****
जहां समर्पण प्यार साथ है
नारी अद्भुत बलशाली
नही कठिन कुछ काज है जग में
सीता सावित्री या अपनी गौरी काली
मंगल सूत्र गले में धारे
मंगल लक्ष्मी करती जाये
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
निज बल अभिमान चूरकर
चरण वंदना में रत रहती
हो अथाह सागर भी घर में
त्याग _ प्रेम दिल लक्ष्मी रहती
विष्णु पालते जग को सारे
लक्ष्मी ममता ही बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
पति के प्रेम की रची मेंहदी
देख भाग्य मुस्काती मन में
वहीं अंगूठी संकल्पों की
रहे चेताती सात वचन की
दंभ द्वेष पाखण्ड व छल से
दूर खड़ी, अमृत बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
गौरी लक्ष्मी सीता पाए
सरस्वती का साथ निभाए
पुरुष भी क्यों ना देव कहाए??
क्यों ना वो जग पूजा जाए?
प्रकृति शक्ति की पूजा करके
निज गौरव नारी को माने
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*********
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत। 29.04.2022
3.33_4.33 पूर्वाह्न

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

तेरा प्यार 

मैंने सारे स्वाद भुलाए, जबसे तेरा प्यार चखा है 
अपने से भी ज्यादा तूने हरदम मेरा ख्याल रखा है

खुद से ज्यादा तुझको रहती हरदम औरों की है चिंता
नेह उमड़ता है नैनों से ,और बरसती रहती ममता 
परेशानियां सब सह लेगी ,मुंह पर कोई शिकन ना लाए 
लेकिन ख्याल रखेगी सबका ,कोई कुछ तकलीफ न पाए 
तेरे मुस्काते चेहरे ने, हृदय हमारा सदा ठगा है 
मैंने सारे स्वाद बुलाए जबसे तेरा प्यार चखा है

 नर्म हृदय तू ,सदा नम्रता तेरे उर में रहती बसती 
सारे काम किया करती है तू खुश होकर हंसती हंसती
 तुझ में अच्छे संस्कार हैं तू गृहणी व्यवहार कुशल है 
 सुख और चैन मेरे जीवन में, तेरे मधुर प्यार का फल है 
सद्भावों से भरी हुई तू, जीवनसंगिनी और सखा है 
मैंने सारे स्वाद बुलाए ,जब से तेरा प्यार चखा है

मदन मोहन बाहेती घोटू 
मेरी पत्नी बहुत मधुर है 

मेरी उमर हो गई अस्सी
मैं अब भी हूं मीठी लस्सी 
पिचहत्तर होने आई है 
पत्नी मेरी रसमलाई है 
हम दोनों का साथ अनूठा 
यह भी मीठी ,मैं भी मीठा 
सीधी सादी, सुंदर भोली 
 बहुत मधुर मीठी है बोली 
सब के संग व्यवहार मधुर है 
दिल से करती प्यार मधुर है 
कभी सुहाना गाजर हलवा 
कभी जलेबी जैसा जलवा 
कभी गुलाब जामुनो जैसी 
या कातिल काजू कतली सी 
रबड़ी है ये कलाकंद है 
हर एक रुप में यह पसंद है 
अधरम मधुरम वदनम मधुरम
 नयनम मधुरम चितवन मधुरम
 मनमोहक मुस्कान खान है 
 मिठाई की ये दुकान है 
 यह तो था सौभाग्य हमारा 
 जो पाया है साथ तुम्हारा 
 सहगामिनी पति की सच्ची 
 मेरी तारा सबसे अच्छी 
 जीवन में बहार बन आई 
 जन्मदिवस की तुम्हे बधाई

मदन मोहन बाहेती घोटू 
आज भी 

आज भी कातिल अदायें आपकी हैं ,
आज भी शातिर निगाहें आपकी हैं 
आज भी लावण्यमय सारा बदन है,
आज भी मरमरी बांहे आपकी है 
महकता है आज भी चंदन बदन है ,
आज भी है रूप कुंदन सा दमकता 
अधर अब भी है गुलाबी पखुड़ियों से,
और चेहरा चांद के जैसा चमकता 
बदन गदरा गया है मन को लुभाता,
कली थी तुम फूल बनकर अब खिली हो 
 भाग्यशाली मैं समझता हूं मै स्वयं को 
 बन के जीवनसंगिनी मुझको मिली हो 
 केश अब भी काले ,घुंघराले ,घनेरे 
 और अंग अंग प्यार से जैसे सना हो 
 हो गई होगी पिचत्तर की उमर पर ,
 मुझे अब भी लगती तुम नवयौवना हो

मदन मोहन बाहेती घोटू 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

गोपाल जी मनोरमा विवाह के 60 साल के अवसर पर 
1
साठ साल पहले मिले मनोरमा गोपाल 
एक दूजे का साथ पा, दोनों हुए निहाल 
दोनों हुए निहाल ,प्रेम की महकी क्यारी 
फूल खिले दो,एकअतुल एक ममता प्यारी 
जीवन बीता सत्कर्मों और परोपकार में 
सब से मिलकर रहे इकट्ठे परिवार में 

2
जब इनकी शादी हुई थे ये दसवीं पास 
विद्या पाने का मगर करते रहे प्रयास 
करते रहे प्रयास ,बने सी ए लड्ढाजी 
मनोरमा ने भी एम ए कर मारी बाजी 
चमकी महिला मंडल की मंत्राणी बनकर 
और गोपाल जी लायन क्लब के बने गवर्नर
3
सरस्वती मां ने दिया विद्या का वरदान 
और लक्ष्मी मां ने दिया प्रेम सहित धनधान्य
प्रेम सहित धन धान्य,लुटाया सबमें जी भर 
सत्कार्यों से ली इन ने अपनी झोली भर 
शीतल शांत स्वभाव ,पुण्य करते मन हरषे
 कृपा ईश्वर की ,दोनों पर हरदम बरसे 
 
4
मन में सेवा भावना और अच्छे संस्कार 
दोनों ने में लुटाया ,सब में अपना प्यार 
सब में अपना प्यार ,हमेशा रहे विजेता 
और समाज के रहे हमेशा बनकर नेता 
घोटू प्रभु से यही प्रार्थना है कर जोड़ी 
रहे स्वस्थ और दीर्घायु हो इनकी जोड़ी

मदन मोहन बाहेती घोटू 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

प्रतीक्षा 

प्रतीक्षा तुम करो पर वो समय के साथ ना पहुंचे

जहां पर आ रही खुजली, वहां तक हाथ ना पहुंचे

इधर के कान से सुनकर ,दूसरे से करे बाहर,

फायदा क्या कुछ कहने का ,जो उन तक बात ना पहुंचे

घोटू 
डॉगी 

हमको हर एक बात पर वो टोकने लगे 

हल्की सी भी आहट हुई तो चौकने लगे 

हमने जो उनके डॉगी को कुत्ता क्या कह दिया,

 कुत्ता तो चुप रहा मगर वो भौंकने लगे

घोटू 

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

फलाहारी नमकीन 

बरत में खाया जो जाए ,वह है नमकीन फलहारी

पड़ोसन से बहलता मन ,जब मैके जाए घरवाली

 पड़ोसन भी अगर ऐसे में ,जो मैके चली जाए,
 
 लगे गीला हुआ आटा,छा रही जब हो  कंगाली

घोटू 
पत्थर की मूरत 

करें तस्वीर क्या उनकी, बड़ी ही प्लेन सादा है

वो दूरी से,निगाहों से ,दिखाते प्यार ज्यादा है 

बड़े मायूस होकर दिल को समझाने को हम बोले,

 किसी पत्थर की मूरत से ,मोहब्बत का इरादा है

घोटू 
बुढ़ापे में 

बुढ़ापे में, भुलक्कड़पन की बीमारी से तुम बच लो 
जरा सा याद मैं रख लूं,जरा सा याद तुम रख लो 
भुलाना है ,भुला दे हम ,पुरानी कड़वी यादों को, 
बुढ़ापे में जवानी का नया सा,स्वाद तुम चख लो

घोटू 
धोबी का गधा

हमेशा ही लदा रहता है डाले पीठ पर बोझा ,
कोई भी ढंग से उसको खिलाता है नहीं चारा

बहुत गुस्सा हो जाता, लोटने धूल में लगता,
 रेंक कर दर्द दिल का वो, बयां करता है तब सारा
 
कोई कहता इधर जाओ ,कोई कहता उधर जाओ,
 बहुत चक्कर लगा करके, हमेशा वो थका हारा

अगर कंफ्यूजड हो मालिक,बड़ी ही मुश्किल होती है
 न घर ना घाट का रहता, गधा धोबी का बेचारा

घोटू
राधा का नाच

न आता नाच राधा को मगर नखरे दिखाएगी कभी तुम्हारे आंगन को बहुत टेढ़ा बताएगी 
कभी बोलेगी नाचेगी,मिलेगा तेल,जब नौ मन,
न नौ मन तेल ही होगा, न राधा नाच पाएगी

घोटू 

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

प्यार और मिठाई 
तुम्हारी ना को ना और हां को हां ही मानता हूं मैं 
तुम्हें खुश रखने के हथकंडे सब पहचानता हूं मैं 
गर्म गाजर का हलवा तुम हो प्यारा और मनभाता 
मिलेगा स्वाद चमचा बनके ही, यह जानता हूं मैं
भले ही टेढ़ी हो लेकिन रसीली और निराली हो 
जलेबी की तरह स्वादिष्ट हो तुम और प्यारी हो 
तुम्हारा सच्चा आशिक तुम्हें दिल से प्यार करता हूं 
मैं दीवाना तुम्हारा, प्रेमिका तुम ही हमारी हो
 तुम्हारा प्यार लच्छेदार है ,प्यारा सुहाना है 
 रसीला रस मलाई सा, हमें करता दीवाना है 
 मैं लच्छेदार रबड़ी से भरा जब देखता कुल्हड़,
 मेरा मन होताअल्हड़,करता जिद इसको ही खाना है

मदन मोहन बाहेती घोटू 

रविवार, 10 अप्रैल 2022

आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी

 रूपसी थी कभी चांद सी तू खिली

ओढ़े घूंघट में तू माथे सूरज लिए

नैन करुणा भरे ज्योति जीवन लिए

स्वर्ण आभा चमक चांदनी से सजी

गोल पृथ्वी झुलाती जहां नाथती

तेरे अधरों पे खुशियां रही नाचती

घोल मधु तू सरस बोल थी बोलती

नाचते मोर कलियां थी पर खोलती

फूल खिल जाते थे कूजते थे बिहग

माथ मेरे फिराती थी तू तेरा कर

लौट आता था सपनों से ए मां मेरी 

मिलती जन्नत खुशी तेरी आंखों भरी 

दौड़ आंचल तेरे जब मै छुप जाता था

क्या कहूं कितना सारा मै सुख पाता था

मोहिनी मूर्ति ममता की दिल आज भी

क्या कभी भूल सकता है संसार भी

गीत तू साज तू मेरा संगीत भी

शब्द वाणी मेरी पंख परवाज़ भी

नैन तू दृश्य तू शस्त्र भी ढाल भी

जिसने जीवन दिया पालती पोषती

नीर सी क्षीर सी अंग सारे बसी

 आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी


सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत।


सन्यास आश्रम 

हम सन्यास आश्रम की उम्र में है मगर संसार नहीं छूटता 
लाख कोशिश करते हैं मगर मोह का यह जाल नहीं टूटता 
हमारे बच्चे भी अब होने लग गए हैं सीनियर सिटीजन 
पर बांध कर रखा है हमने मोह माया का बंधन शरीर में दम नहीं है ,हाथ पैर पड़ गए है ढीले 
मगर दिल कहता है, थोड़ी जिंदगी और जी ले 
इच्छाओं का नहीं होता है कोई छोर
हमेशा ये दिल मांगता है मोर
जब तलक लालसाओं का अंत नहीं होता है 
सन्यासआश्रम में होने पर भी कोई संत नहीं होता है 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

कान 

चेहरे के दाएं या बाएं 
अगर आप नजर घुमाएं
तो दो अजीब आकृति के छिद्रयुक्त अंग नज़र आते हैं 
जो कान कहलाते हैं 
यह हमारी श्रवण शक्ति के मुख्य साधन है 
जिससे एक दूसरे की बात सुन पाते हम हैं 
यह कान भी अजीब अंग दिया इंसान में है 
हर जगह मौजूद रहते इस जहान में हैं 
वो आपके मकान में हैं 
उपस्थित दुकान में है 
काम करो तो थकान में है 
खुश रहो तो मुस्कान में हैं 
आदमी के ही नहीं दीवारों के भी कान होते हैं 
कोई कान के कच्चे श्रीमान होते हैं
हमें कानो कान खबर नहीं लगती और लोग हमारे विरुद्ध दूसरों के कान भरते हैं 
कोई कान कतरते है 
कोई कान में तेल डालकर बातों को अनसुना करते हैं 
जब हम सतर्क होते हैं हमारे कान खड़े हो जाते हैं कोई बकवास करके हमारे कान पकाते हैं 
कान सा कॉम्प्लिकेटेड आकार का शरीर का कोई अंग नहीं दिखता है
कहते हैं कान का हर पॉइंट शरीर के किसी अंग को कंट्रोल करता है 
कान का सही उपयोग सुनने के लिए होता है पर औरते जो कभी किसी की नहीं सुनती है 
अपने श्रृंगार के लिए कानों को चुनती हैं 
कभी कानों में बाली डालती है 
कभी झुमका लटकाती है 
कभी हीरे के टॉप्स से कानों को सजाती है 
कोरोना की बीमारी में भी कान बहुत काम आए हर कोई रहता था कान से मास्क लटकाए 
मंद दृष्टि वालो को दूरदृष्टि देने वाला चश्मा जिससे साफ दिखता है 
वह भी कानों के सहारे ही टिकता है 
कुछ बातों की किसी को नही होती
 कानोकान खबर है
 ये शरीर का एकमात्र अंग है 
 जिसके नाम पर बसा कानपुर नगर है 
 बचपन में जब स्कूल में पढ़ते थे 
मास्टर जी बहुत ज्ञान की बातें हमारे कानों में भरते थे 
पर हमारे कानों पर जूं नहीं रेंग पाती थी 
इस कान से सुनी बातें उस कान से निकल जाती थी 
और इसकी सजा में हमारे काम उमेंठे जाते थे कभी कान पकड़ कर उठक बैठक लगाते थे 
इस पर भी बात नहीं बनती तो कान पकड़कर मुर्गा बना दिए जाते थे 
तरह-तरह की सजाएं पाते थे 
तब तो हम खिसिया कर पल्लू झाड़ कर खड़े हो जाते थे 
क्योंकि हमारे कई सहपाठी अक्सर ऐसी सजा पाते थे 
पर एक प्रश्न दिमाग में जरूर मचाता था तूफान की सजा देते समय मास्टर जी क्यों मरोड़तें हैं हमेशा कान 
लेकिन इसका उत्तर अब समझ पाए हम है 
कान का मस्तिष्क की ज्ञान तंत्रिका से सीधा कनेक्शन है
कान मरोड़ने से ज्ञान तंत्रिका जागृत हो जाती है ऐसी सजा से अच्छी बुद्धि आती है 
कुछ भी हो अगर कान नहीं होते तो आपस में कम्युनिकेशन नहीं हो पाता 
न सत्संग हो पाता ,ना भजन हो पाता  
इसलिए श्रीमान 
मेरी बात सुनिए खोल कर कान
कान है महान 
गुणों की खान 
आपके चेहरे पर लाते है मुस्कान 
आपस में कानाफूंसी न कर 
ऐसी बातें बोलें
जो लोगों के कानो में मिश्री घोले

मदन मोहन बाहेती घोटू
कशमकश 

मेरा दिल और दिमाग 
कभी नहीं चले एक साथ 
बचपन से ले अब तक 
दोनों चलते रहे अलग-अलग 
दिल ने कुछ कहा,
 दिमाग नहीं माना  
दिमाग में कुछ विचार आए 
दिल नहीं माना 
दोनों कि हमेशा लड़ाई चलती ही रही 
और फिर एक दिन मेरी शादी हो गई 
अब मन और मस्तिष्क की कशमकश बंद है क्योंकि मुझे अब वही करना पड़ता है,
 जो मेरी पत्नी जी को पसंद है 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

सन्यास आश्रम 

हम सन्यास आश्रम की उम्र में है मगर संसार नहीं छूटता 
लाख कोशिश करते हैं मगर मोह का यह जाल नहीं टूटता 
हमारे बच्चे भी अब होने लग गए हैं सीनियर सिटीजन 
पर बांध कर रखा है हमने मोह माया का बंधन शरीर में दम नहीं है ,हाथ पैर पड़ गए है ढीले 
मगर दिल कहता है, थोड़ी जिंदगी और जी ले 
जब तलक लालसाओं का अंत नहीं होता है 
सन्यासआश्रम में होने पर भी कोई संत नहीं होता है 

मदन मोहन बाहेती घोटू 
ऑरेंज काउंटी के चुनाव में लड़ने वाले प्रत्याशियों से एक नम्र निवेदन 
1
 इसे ऑरेंज कहते हम मगर ताजा यह ऐपल है 
हमारी जिंदगी की यहां बसती खुशी पल-पल है 
तुम्हारी यह जवानी है ,हमारा यह बुढ़ापा है ,
 हमारे प्यारे बच्चों का सुनहरा यही तो कल है
 2
 हमारी जिंदगानी है ,हमारा प्यार है ओ सी 
 जवानी से बुढ़ापे तक का ये संसार है ओ सी 
 तुम्हें इसकी व्यवस्थायें, सभी हम सौंप तो देंगे 
करो वादा हमेशा ही ,रहे गुलजार ये ओ सी
 3
आपसी मन के भेदों को मिटाकर काम तुम करना 
भला सोसाइटी का ,इसका ऊंचा नाम तुम करना 
मोहब्बत ही मिलेगी ,जो मोहब्बत से रहोगे तुम, 
जरा से फायदे खातिर ,इसे बदनाम मत करना
 करो वादा अगर जीते ,नहीं तुम रंग बदलोगे मुस्कुरा कर के मिलने का नहीं तुम ढंग बदलोगे 
हमारा हाथ हरदम ही तुम्हारे साथ है लेकिन ,
 रहोगे साथ तुम मिलकर ,नहीं तुम संग बदलोगे

 मदन मोहन बाहेती घोटू 

बुधवार, 6 अप्रैल 2022

ढलता तन,चंचल मन

तन बूढ़ा हो गया आ गई ,अंग अंग में ढील है लेकिन मन का कोना कोना ,चंचल है गतिशील है

 हाथ पांव कृषकाय हुए पर मन अभी जोशीला है 
तन में फुर्ती नहीं रही पर अंतर मन फुर्तीला है 
 अब भी ख्याल जवानी वाले मस्तक में मंडराते हैं 
हालांकि थोड़ी सी मेहनत, करते तो थक जाते हैं 
चार कदम ना चलता तन ,मन चले सैकड़ों मील है 
लेकिन मन का कोना कोना ,चंचल है गतिशील है
 
तन तो अब ना युवा रहा पर मन यौवन से भरा हुआ 
तन बूढ़ा हो गया मगर मन,ना बूढ़ा है जरा हुआ 
इसका कारण मैं गांव में पला बढ़ा और रहता हूं 
नहीं संकुचित शहरों सा उन्मुक्त पवन सा बहता हूं 
हैआध्यात्म बसा नसनस में और संस्कार सुशीलहै 
 लेकिन मन का कोना कोना चंचल है गतिशील है

शुद्ध हवा में सांसे लेता और शीतल जल पीता हूं 
दूर बहुत दुनियादारी से, सादा जीवन जीता हूं
तन पर तो बस नहीं मगर मन पर तो है बस चल जाता 
जैसा हो परिवेश उस तरह ही है मानस ढल जाता 
बहुत नियंत्रित मेरा जीवन ,जरा न उसमें ढील है 
लेकिन मन का कोना कोना चंचल है गतिशील है

मदन मोहन बाहेती घोटू
बढ़ती महंगाई 

प्रवासी भारतवासी ,
जब विदेश से लौटकर 
वापस अपने घर आते हैं 
बढ़ी हुई महंगाई को
 अपने साथ ले आते हैं 
 
 जैसे मेरे देश का वड़ापाव 
 छोड़कर अपना गांव 
 जब गया विदेश ,
 तो लौटा नया रूप धर 
 वह बन गया था वड़ापाव से बर्गर 
 उसका नया हीरो वाला रूप,
  लोगों को सुहाया 
  दाम दस गुना हो गए ,
  फिर भी लोगों ने बड़े चाव से खाया 
  
  मेरे गांव के नाई चाचा की तेल मालिश ,
  जब विदेश गई 
  तो स्पा बन गई 
  नए रंग में सन गई
  बहुत महंगी हो गई 
  पर फैशन बन गई 
  
  दादी के हाथों के मैदे की सिवैयां
   आज भी बहुत याद आती हैं 
   जब से विदेश से लौटी है ,
   चाऊमीन कहलाती है 
    बड़ी मंहगी आती है
   
   और जब आलू का पराठा पहुंच गया विदेश
    देखकर उन्मुक्त परिवेश 
    दो परतों के बीच उसका दम घुटने लगा 
    और वह बाहर की और भगा 
    रोटी के ऊपर चढ़कर उसे आया मजा 
    और वह बन गया पिज़्ज़ा 
    विदेशी रंगत देख कर,
    लोगों में दीवानगी चढ़ गई 
    बस कीमत कई गुना बढ़ गई 
    
    कनखियों से ताक झांक कर के ,
    नैनो को लड़ाने वाला प्यार 
    विदेश में डेटिंग करके हो गया बेकरार 
    खुली छूट मिल गई कर लो पूरा दीदार 
    मगर खर्च होगया कई हजार
    
    विदेश जाकर बदले परिवेश में,
     गांव की चीजों पर आधुनिकता चढ़ा दी 
     पर मेरे देश की महंगाई बढ़ा दी

     मदन मोहन बाहेती घोटू 

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

बुढ़ापा होता है कैसा

बुढ़ापा होता है कैसा 
बुढ़ापा होता है ऐसा 

अभी जोशे जवानी है 
चमक चेहरे पर पानी है 
मटकती चाल बलखाती
जुल्फ काली है लहराती 
उमर जब बढ़ती जाएगी 
लुनाई घटती जाएगी 
कोई जब आंटी बोलेगा 
तुम्हारा खून खोलेगा 
भुगतनी पड़ती जिल्लत है 
उमर की यह हकीकत है 
सफेदी सर पे आती है,
 उमर देती है संदेशा 
 बुढ़ापा होता है ऐसा 
 बुढ़ापा होता है कैसा 
 
तुम्हारी अपनी संताने 
जो चलती उंगली को थामें 
बड़ी होने लगेगी जब 
ध्यान तुम पर न देगी तब 
तुम्हारी कुछ न मानेगी 
सिर्फ अपनी ही तानेगी 
कहेगी तुम हो सठियाये
रिटायर होने को आए 
रमाओ राम में निज मन 
छोड़ दो काम का बंधन 
नियंत्रण उनका धंधे पर ,
और उनके हाथ है पैसा 
बुढ़ापा होता है ऐसा 
बुढ़ापा होता है कैसा 

बदन थोड़ा सा कुम्हलाता
चिड़चिड़ापन है आ जाता 
बहुत कम खाते पीते हैं 
दवाई खा कर जीते हैं 
मिठाई खा नहीं सकते 
बहुत परहेज है रखते 
गुजारे वक्त ना कटता 
बड़ी आ जाती नीरसता 
नहीं लगता कहीं भी मन 
खटकता है निकम्मापन
न घर के घाट के रहते ,
हाल कुछ होता है ऐसा
 बुढ़ापा होता है कैसा 
 बुढ़ापा होता है ऐसा

मदन मोहन बाहेती घोटू