दिल की हस्ती किसी को क्या दिखाएँ "दीप",
गुम हो सकूँ ऐसा कोई मंजर नहीं मिलता;
नदियां तो अक्सर मिल जाती हैं राहों में,
पर डूब सकूँ ऐसा कोई समंदर नहीं मिलता |
साथ उसके रह सकूँ वो जहां कहाँ ऐ "दीप",
जला सकूँ खुद को वो शमशान नहीं मिलता;
इश्क में तेरे डूब जाने को दिल करता तो है,
पर टूट सकूँ जिसमे वो चट्टान नहीं मिलता |
तैयार तो खड़े हैं हम यहाँ लुटने को ऐ "दीप",
पर चुरा सके जो मुझको वो चोर नहीं मिलता;
बह तो जाऊँ मैं बारिश में तेरे प्यार की मगर,
बरसात वो कभी मुझको घनघोर नहीं मिलता |
एक अलग-सी ही दुनिया बसा लूँ संग तेरे मैं,
साथ तेरे बैठ के देखूँ वो ख्वाब नहीं मिलता;
प्रश्न तो कितने ही उठते हैं मन में "दीप",
पर दे सकूँ जो तुझको वो जवाब नहीं मिलता |
प्रदीप जी निस्संग रूह को किसी का ज़वाब यहाँ मिलता कहाँ है ?बढ़िया गुजारिश है उच्छ्वास है .बधाई
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