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मंगलवार, 3 जुलाई 2012

चार दिन की चांदनी

         चार दिन की चांदनी

कौन कहता है कि होती चांदनी है चार दिन,

                         और उसके बाद फिर होती अँधेरी रात है
आसमां की तरफ को सर उठा ,देखो तो सही,
                         अमावास को छोड़ कर ,हर रात आता चाँद है
सर्दियों के बाद में चलती है बासंती हवा,
                       और  तपती गर्मियों के    बाद में  बरसात है
वो ही दिख पाता है तुमको,जैसा होता नजरिया,
                      सोच  जो आशा भरा है,  तो सफलता  साथ  है
  देख कर हालात को ,झुकना,  बदलना  गलत है,
                     आदमी वो है कि जो खुद ,बदलता    हालात है
 सच्चे मन से चाह है,कोशिश करो,मिल जाएगा,
                      उस के दर पर ,पूरी होती ,सभी की  फ़रियाद  है
      
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

तेरी रहमत चाहिये

      तेरी रहमत चाहिये

कोई नक़्शे को इमारत में बदलने के लिये,

                     थोड़ी ईंटें,थोडा गारा, थोड़ी मेहनत   चाहिये
चाँद को पाने की मन में हो  कशिश तो मिलेगा,
                     हो बुलंदी हौंसले में,  सच्ची चाहत    चाहिये
खूब सपने देखिये,अच्छा है सपने देखना,
                     सपने पूरे करने को ,करनी कवायत   चाहिये
जिंदगी के इस सफ़र में,आयेंगे रोड़े कई,
                     मन में मंजिल पाने का जज्बा और हिम्मत चाहिये
हँसते हँसते ,जिंदगी ,कट जाएगी आराम से,
                      एक सच्चे हमसफ़र  का संग,सोहबत    चाहिये
जन्म देकर ,पाला पोसा और लायक बनाया,
                     साया हो माँ बाप का सर पर,न जन्नत  चाहिये
खुदा ने बोला कि बन्दे,मांग  ले जो मांगना,
                      मैंने  बोला मिल गया तू, तेरी रहमत    चाहिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सोमवार, 2 जुलाई 2012

तैरना

          तैरना

ये दुनिया,

पानी भरा  तालाब है
इसमें तुम जब उतरते  हो
डूबने लगते हो
पानी में हाथ पैर मारोगे,
तो बदले में पानी भी,
तुम्हे ऊपर की तरफ उछालेगा
और तुम्हारा ये हाथ पैर मारना ही,
तुम्हे डूबने से बचा  लेगा
डर को भगाओगे
तो अपने आप तैरना सीख जाओगे
क्योंकि मुझे,आपको सबको पता है
की मार के आगे भूत भी भागता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

लज्जत

             लज्जत

जो मज़ा शादी के पहले,शादी के पश्चात् क्या
लुत्फ़ भूखे पेट का वो खाना खाने बाद क्या
सौ गुना बेहतर है सन्डे से सटरडे ईवनिग,
जल्दी उठने की फिकर में,सोवो वो भी रात क्या
देती है राहत जो आती, गर्मियों के बाद में,
झड़ी लग करती परेशां, ऐसी भी बरसात क्या
गोलगप्पे का मज़ा,पानी भरो और गटक लो,
देर की और गल गये  तो बचा उनमे  स्वाद क्या
समंदर के सीने से पैदा हो सीधे   भागती,
किनारे पर लहरों का देखा मिलन उन्माद क्या
कभी आइसक्रीम,कुल्फी,दही,रसगुल्ला कभी,
मज़ा दे हर रूप में जो,दूध की  है बात क्या
खाने की लज्जत है असली,लोग कहते उँगलियाँ,
मुंह में घुलता ही न जो रह जाये  फिर वो स्वाद क्या
पकड़ ऊँगली,सीखा चलना,अब दिखाते उँगलियाँ,
साथ में बढती उमर के,  बदलते हालात  क्या

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रविवार, 1 जुलाई 2012

दूरियाँ

दूरियां हमेशा दर्द ही नहीं देती, 
कभी कभी खुशनुमा एहसास भी कराती है ये दूरियां; 
दूरियां हमेशा रिश्तों को नहीं तोडती, 
अक्सर टूटते रिश्तों को भी मजबूत कराती है ये दूरियां | 

दूरियाँ हमेशा नफरत ही नहीं फैलाती, 
कभी कभी अनुपम प्रेम की अनुभूति भी कराती है ये दूरियाँ; 
दूरियाँ हमेशा फासले ही नहीं बढ़ाती, 
कभी कभी दूर हुए दो दिलों को नजदीक भी लाती है ये दूरियाँ | 

दूरियाँ सिर्फ ओझल ही नहीं करती, 
कभी कभी दिल ही दिल मे दीदार भी करती है ये दूरियाँ; 
दूरियों का मतलब सिर्फ जुदाई नहीं "दीप", 
कभी कभी एक अनोखा मिलन भी कराती है ये दूरियाँ | 

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